ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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दृष्टिसे यह बात समझमें नहीं आती कि वे इसमें किस प्रकार व्याप्त हैं और किस प्रकार इसके कारण हैं। परंतु जो उस परब्रह्मकी अचिन्त्य अद्भुत शक्तिके रहस्यको समझते हैं, उनको ये प्रत्यक्षवत् सर्वत्र परिपूर्ण और सबके एकमात्र कारण प्रतीत होते हैं। उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको जानकर ही मनुष्य इस मृत्युरूप संसार-समुद्रसे पार हो सकता है—सदाके लिये जन्म-मरणसे सर्वथा छूट सकता है। उनके दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। अतः हमें उन परमात्माका जिज्ञासु होकर उन्हें जाननेकी चेष्टामें लग जाना चाहिये ॥ १५ ॥
सम्बन्ध— जिनको जाननेसे जन्म-मरणसे छूटनेकी बात कही गयी है, वे परमेश्वर कैसे हैं—इस जिज्ञासापर उनके स्वरूपका वर्णन किया जाता है—
स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनि-
र्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद् यः।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः
सः सारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः
॥ १६ ॥
सः=वह; ज्ञः=ज्ञानस्वरूप परमात्मा; विश्वकृद्=सर्वस्रष्टा; विश्वविद्=सर्वज्ञ; आत्मयोनिः= स्वयं ही अपने प्राकट्यका हेतु; कालकालः= कालका भी महाकाल; गुणी= सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न; (और) सर्वविद्= सबको जाननेवाला है; यः= जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपतिः= प्रकृति और जीवात्माका स्वामी; गुणेशः= समस्त गुणोंका शासक; (तथा) संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः= जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ॥ १६ ॥
व्याख्या— जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं। उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्माका