ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] केनोपनिषद् ५७
हूँ, परमेश्वर मेरे ज्ञेय हैं, वह वस्तुतः सर्वथा भ्रममें है; क्योंकि ब्रह्म इस प्रकार ज्ञानका विषय नहीं है। जितने भी ज्ञानके साधन हैं, उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं जो ब्रह्मतक पहुँच सके। अतएव इस प्रकारके जाननेवालोंके लिये परमात्मा सदा अज्ञात हैं; जबतक जाननेका अभिमान रहता है, तबतक परमेश्वरका साक्षात्कार नहीं होता। परमेश्वरका साक्षात्कार उन्हीं भाग्यवान् महापुरुषोंको होता है, जिनमें जाननेका अभिमान किञ्चित् भी नहीं रह गया है॥ ३ ॥
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥ ४॥
प्रतिबोधविदितम्=उपर्युक्त प्रतिबोध (संकेत) से उत्पन्न ज्ञान ही; मतम्=वास्तविक ज्ञान है; हि=क्योंकि (इससे); अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप परमात्माको; विन्दते=(मनुष्य) प्राप्त करता है; आत्मना=अन्तर्यामी परमात्मासे; वीर्यम्=परमात्माको जाननेकी शक्ति (ज्ञान); विन्दते=प्राप्त करता है; (और उस) विद्यया=विद्या—ज्ञानसे; अमृतम्=अमृतरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; विन्दते=प्राप्त होता है॥ ४॥
व्याख्या—उपर्युक्त वर्णनमें परमात्माके जिस स्वरूपका लक्ष्य कराया गया था उसको भलीभाँति समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। परमात्माका ज्ञान करानेकी यह जो ज्ञानरूपी शक्ति है, यह मनुष्यको अन्तर्यामी परमात्मासे ही मिलती है। मन्त्रमें विद्यासे अमृतरूप परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यह इसीलिये कहा गया है कि जिससे मनुष्यमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये रुचि और उत्साहकी वृद्धि हो॥ ४॥
सम्बन्ध—अब उस ब्रह्मतत्त्वको इसी जन्ममें जान लेना अत्यन्त आवश्यक है—यह बतलाकर इस प्रकरणका उपसंहार किया जाता है—
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥ ५॥
चेत्=यदि; इह=इस मनुष्य-शरीरमें; अवेदीत्=(परब्रह्मको) जान लिया;