भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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वल्ली १ ] कठोपनिषद् ७७


सन्तम्=होनेपर भी; तम् ह=उस (नचिकेता) में; श्रद्धा=श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि) का; आविवेश=आवेश हो गया (और); सः=(उन जराजीर्ण गायोंको देखकर) वह; अमन्यत=विचार करने लगा॥ २॥

व्याख्या—उस समय गो-धन ही प्रधान धन था और वाजश्रवस उद्दालकके घरमें इस धनकी प्रचुरता थी। होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा और उद्गाता—ये चार प्रधान ऋत्विज होते हैं; ऐसा माना गया है कि इनको सबसे अधिक गौएँ दी जाती हैं। प्रशास्ता, प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं, उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्तःकरणमें श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २॥

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥ ३॥

पीतोदकाः=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणाः=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहाः=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रियाः=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ताः=ऐसी (निरर्थक, मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; सः=वह दाता (तो); ते लोकाः=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दाः=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अतः पिताजीको सावधान करना चाहिये) ॥ ३॥

व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं! अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक