भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ८९

संतानान्तरम् इति। अत्रोच्यते—इह अनुमातुः व्याहाराभासो द्विधा भवति—व्याप्तिग्रहण- कालेऽविच्छेदप्राणोऽहं व्याहरामि इत्येवंरूपः। अनुमानावसरे च ‘व्याहरति अयम्’ इति विच्छेद- जीवित इति अन्यस्य व्याप्तिः गृहीता, अन्यश्च आभासः कथम् इदानीं हेतुः स्यात्, व्याहरति इति आभासस्य च हेतुः अविदित एव इति कथं ततो हेतोः समीहा अनुमीयेत, किं च ‘व्याहरति अयम्’ इति यः प्रमात्रन्तरेऽनुमातृसंमते विच्छिन्नतया अवभासः सोऽनुमेयसंमतायाः परसमीहायाः कथं कार्यः स्यात्। तस्या हि व्याहरामीत्याभासः कार्यो योऽसौ अविच्छेदजीवितः। न च अविच्छेदमयस्य विच्छेदमयः कार्यम् इति युक्तम्—तथाभूतकार्यकारणभावग्रहणोपायाभावनाव्, नहि स्वात्मनि योऽयम् अविच्छिन्नाभासः, स परत्र विच्छिन्नं ‘व्याहरति अयम्’ इत्येवंरूपम् आभासं जनयति, इति केनचित् प्रमाणेन सिद्धम्—परसिद्धिपूर्वकत्वात् अस्य अर्थस्य, परप्रमातृसिद्धेश्च। एवंभूतार्थसिद्धयधीनत्वेन इतरेतराश्रयात्। न च अवश्यम् अविच्छिन्नात् विच्छिन्नेन भाव्यम् इति नियमोऽस्ति व्यभिचारात्। न च विच्छिन्नोऽपि आभास उत्पद्यताम्, इति तदनुसन्धानात् तदुत्पत्तिः नियता—तत्सद्भावेऽपि अनुत्पत्तेः तदभावे च उत्पत्तेः, विच्छिन्न आभासः परत्र उत्पद्यताम् इति या समीहा तया सह परत्र उत्पन्नस्य विच्छिन्नाभासस्य कार्यकारणभावग्रहणमेव परासिद्धौ न युक्तम्

परकाय चैतन्य है अर्थात् दूसरा सन्तान है। [ अब सौत्रान्तिक लोग दूसरे सन्तान अनुमान के विषय में कहते हैं ] यहाँ पर अनुमान करनेवाले का व्याहाराभास दो प्रकार का है [ दूसरे का व्याहार ही समीहापूर्वक हो सकता है, हमारे व्याहार की तरह ] व्याप्ति ग्रहण काल में भिन्न काल न होता हुआ अविच्छेदरूप से मैं बोलता हूँ—ऐसा ही यह होगा और अनुमान काल में ‘व्याहरति अयम्’ भेद मूलक अन्य की व्याप्ति गृहीत होती है और विच्छेद प्राणवाला आभास कैसे दूसरों की समीहा का गमक [ बतानेवाला ] होगा, ‘बोलता है’ इस आभास का इच्छारूप हेतु अविदित ही है कैसे उसकी इच्छा अनुमान करेगी और भी ‘व्याहरति अयम्’ यह दूसरे प्रमाता में अनुमातृरूप से माना गया भेदपूर्वक अवभास अनुमेयरूप से मानी गयी दूसरे की इच्छा का कैसे कार्य हो सकता है। ‘मैं कहता हूँ’ यह आभास अपना स्वात्म अविच्छेदरूप से प्राणित है और अविच्छेदरूप [ व्याहरामि इत्येवं रूपाभासस्य ] का विच्छेदरूप [ व्याहरति अयम् ] से कार्य होना उचित नहीं है, उसी प्रकार होनेवाले कार्य-कारणभाव ग्रहण करने के लिए कोई उपाय नहीं है, अपने में होनेवाला जो ‘व्याहरामि’ अविच्छेद आभास है वह [ अनुमेय ] दूसरी जगह में विच्छिन्न होकर ‘व्याहरति अयम्’ इस रूप में आभास पैदा करता है, किस प्रमाण से सिद्ध होगा, क्योंकि ये अर्थ दूसरे के सिद्ध होने पर ही सिद्ध होते हैं [ अविच्छिन्नाभास के रहने पर विच्छिन्नाभास उत्पन्न होता है ] इस प्रकार से तो अन्योन्याश्रय दोष आ जायेगा। अविच्छिन्न आभास से कहीं विच्छिन्नाभास होता है अर्थात् ‘व्याहरामि’ की जगह ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा क्या बोला जा सकता है ? नहीं, यह नहीं हो सकता है और ऐसा कोई नियम भी नहीं है जो अविच्छन्ना- भास से विच्छिन्नाभास होता हो, यदि मानते हो, तो इसका व्यभिचार होगा। विच्छिन्नाभास ‘व्याहरति अयम्’ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न नहीं हो सकता है। अविच्छिन्नाभास के अनुसन्धान से ही विच्छिन्नाभास की उत्पत्ति सम्भव है—अविच्छेद के अभाव में उत्पन्न नहीं हो सकता और अविच्छेद के रहने पर उत्पन्न होगा, परप्रमाता में ‘व्याहरति अयम्’ ऐसा उत्पन्न हो, उसके साथ दूसरे प्रमाता में उत्पन्न विच्छिदाभास परप्रमाता के सिद्ध न होने से कार्य-कारणभावादि का १२