भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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९० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ इति व्याप्तेरेवासिद्धिः। प्रमात्रन्तराणि च यदि भिन्नानि तदा तन्निष्ठानाम् अवभासानां भेद एव, 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' इति न्यायात्। ततश्च एकाभासनिष्ठत्वाभावात् एकाभासविश्रान्तः सम्भूय प्रमातृणां व्यवहारो न स्यात्—इति अन्योन्यानुपरक्तं भूतग्रस्तप्रकृतिप्रायं जगत् आपद्येत। अनुमीय- मानमपि च बोधान्तरम् अनुमातृसम्मतात् बोधात् यदि भिन्नम्, तत् अस्ति तावत् सम्भवः —यत् प्रमेयं बोधात् भिन्नम् अस्ति इति। सहोपलम्भनियमादेः अनैकान्तिकत्वात् नीलपीतादिनापि प्रमेयराशिना किम् अपकृतम्, येन अस्य स्वरूपविश्रान्तिः न सह्यते, तस्मात् प्रमात्रन्तराणामपि असिद्धिरेव, सिद्धौ वा सर्वप्रमात्रन्तर्गता आभासा एकैकत्र परत्र आभासवैचित्र्यहेतुं वासनोद्- बोधवैचित्र्यं जनयेयुः —नियमे हेत्वन्तराभावात् इति, तथापि न नीलादिवैचित्र्यसिद्धिः। एवं वासनानां तदुद्बोधहेतूनां च विचित्राणाम् अनुपपत्तिरेव। ततश्च स्थितमेतत्, अभिन्नो बोधः तस्य आकस्मिकाभासभेदहेतुत्वानुपपत्तेः बाह्योऽर्थोऽनुमेयः सम्भाव्यते—इति यदि बाह्यार्थवादिना उच्यते, इति श्लोकद्वयार्थः। चेच्छब्दः श्लोकद्वयवाक्यार्थशङ्काद्योतकः ॥ ४-५ ॥ एवम् आशङ्क्यमानत्वेन परसम्भावना दृढा दर्शिता, अधुना तु एनां सम्भावनां शिथिलयितुं तावदाह— स्यादेतदवभासेषु तेष्वेवावसिते सति। व्यवहारे किमन्येन बाह्येनानुपपत्तिना ॥ ६ ॥ ग्रहण नहीं होगा—यह व्याप्ति ही नहीं बनेगी और यदि अन्य जीव भिन्न हैं तो अन्य प्रमाओं में रहनेवाले आभास का भेद ही रहेगा, [ 'ज्ञानाद्व्यतिरिक्तं च' ज्ञान से अभिन्न अर्थान्तर कैसे होगा, यह आचार्य धर्मकीर्ति का कथन है।] इसी कारण एक वस्तु में न रहने के कारण एकाभास में रहकर मिले हुए प्रमाताओं का 'शिविका' पालकी के समान व्यवहार नहीं होगा। इस तरह आपस में न मिलने से भूत से ग्रस्त हो जाने के समान मूर्च्छित ही प्रायः जगत् का व्यवहार हो जायेगा। अनुमान किया जानेवाला दूसरा ज्ञान अनुमाता के सम्मत ज्ञान से यदि भिन्न है, तब तो वह प्रमेय ज्ञान से भिन्न है, यही सम्भव हो सकता है, कर्ता और कर्म का तादात्म्य नहीं होने से। एक ही साथ ज्ञान और ज्ञेय का बोध हो सकता है, यह कोई निश्चित नहीं है या हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है, तो फिर नील-पीतादि समूह ने क्या अपकार किया है, जिस अपकार से प्रमेय के स्वरूप में विश्रान्ति होना तुम विज्ञानवादियों द्वारा नहीं सहन होता है, इससे अन्य प्रमाताओं की असिद्धि ही होगी, सिद्धि मानने पर भी प्रमाताओं के भीतर रहनेवाला आभास ज्ञान प्रत्येक स्थान में आभास की विचित्रता के हेतु वासना में उद्बोध वैचित्र्य पैदा कर देंगे; क्योंकि नियम में कोई हेतु नहीं है, ऐसा यत्न करने पर भी नीलादिकों की विचित्रता में विचित्रताओं की अनुपपत्ति ही होगी। इससे यह बात रह गयी, अभिन्न चिन्मात्र ज्ञान आकस्मिका- भास भेद का हेतु नहीं बन सकता है इसीलिए बाह्यार्थ अनुमेय है यह बात सम्भव है और यही बाह्यार्थवादी का कहना है दोनों श्लोकों का यही अर्थ है। 'चेत्' शब्द दोनों श्लोकों के वाक्यार्थ की शङ्का का द्योतक है ॥ ४-५ ॥ बाह्यार्थवादी द्वारा को हुई आशङ्का को दृढता पूर्वक बतलाया, किन्तु अब उस सम्भावना को शिथिल करने के लिए [इसके बाद में ईश्वर अद्वैतवादी] कहेंगे—