ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५ का.-६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९१ स्यादेतत्—इति पूर्वोक्तसम्भावनाभ्युपगमे यदा व्याख्यायते तदा किं तु इति वाक्यशेषेण तच्छैथिल्यविषयं सम्भावनान्तरं शेषश्लोकेन दर्श्यत इति व्याख्येयम् । यदि तु अध्याहारो न सह्यते तदा स्यादेतदिति इदमपि सम्भावनान्तरं स्यात्, यदनेन श्लोकेन उच्यते इति एकवाक्य- तया योज्यम्, अनयापि कष्टकल्पनया बाह्यान् अर्थान् प्रसाधयता भवता तैः न किंचित् कर्तव्यम्, आभासैरेव तैः भवता अभ्युपगतैः व्यवहारसिद्धेः, न हि नित्यानुमेयेन कश्चित् व्यवहार इति किं बाह्येन, यत्र साधकं च नास्ति प्रमाणम्, बाधकं च प्रकाशात् भेदे अनुमेयतयापि प्रकाशना- भाव इति तावत् मुख्यम् । अभ्युच्चयबाधकास्तु अवयविनो वृत्त्यनुपपत्तिः, समवायासिद्धिः, कम्पाकम्पावरणानावरणरक्तारक्तदिग्भागभेदादिविरुद्धधर्मयोगः । अणुसंचयबाह्यवादेऽपि संचयस्य यह सम्भव हो सकता है उन आभासों की समाप्ति होने पर जिसकी उपपत्ति न बैठती हो । ऐसे व्यवहार में अन्य बाह्य-पदार्थ से क्या क्षति आयेगी ॥ ६ ॥ हो सकता है—पूर्वोक्त सम्भावना को मान लेने पर जब व्याख्यान करोगे तब तो इस वाक्य शेष से उसके शैथिल्य विषय की दूसरी सम्भावना को शेष श्लोक से बताते हैं—ऐसी व्याख्या करना ठीक है । यदि अध्याहार-समुच्चारण सह्य नहीं होता हो, तब तो यह भी दूसरी सम्भावना हो सकती है, जब कि इसी श्लोक से यह कहा जाता है—ऐसी एक वाक्यता जोड़नी चाहिए वाक्य भेद करना समुचित नहीं होता, [ अब दोनों के पक्षों में समान अर्थ हो गया । ] इस कष्टदायी कल्पना से भी बाह्य-अर्थों की सिद्धि करोगे तभी भी उन बाह्य-अर्थों से प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि जिन आभासों को आपने मान लिया है उन आभासों से ही व्यवहार की सिद्धि हो जायेगी, नित्य अनुमेय से कोई भी व्यवहार नहीं होगा, अप्रकाशमान होने के कारण बाह्यार्थ से क्या उपस्थित है । जहाँ पर साधक कोई प्रमाण नहीं है, और बाधक प्रमाण प्रयोजन है, क्योंकि प्रकाश से भेद होने पर अनुमेय से भी प्रकाशन का अभाव मुख्य रहता है । प्रकाश से भिन्न अप्रकाश होता है तो यही अधिक बाधक प्रमाण हो गया; इस इस विषय में जैसा भी सोचो, किन्तु जब प्रकाश से भिन्न मानोगे तब तो वह अप्रकाश हो ही जायेगा । इसका प्रकाशित न होना ही एकमात्र निष्कर्ष निकलता है अवयवों में अवयवी रहता है तथा अवयवी का अवयवों में नहीं रहना ही अभ्युच्चय बाधक कहलाता है, अर्थात् जब १. पूर्व में तो प्रमाण के व्याज से प्रवृत्त हुए बाधक को कह दिया किन्तु अब अपने आप भी प्रमेय के अपने निरूपण में प्रवृत्त हुए प्रवृत्ति द्वारा प्रवृत्त प्रमेय के स्वरूप का उन्मूलन कर देना ही इसका अधिक बाधकत्व है । २. हाथ चलता है इसमें केवल हाथ का ही चलन हो रहा है, सारे शरीर का नहीं होता है, तभी अवयव और अवयवी की युतसिद्धि हो जाती है । न्यायकन्दली में इसका प्रतिपादन किया हुआ है । हाथ के कम्पन होने पर हाथ के आश्रयभूत शरीर का कम्पन होता हुआ नहीं देखा जाता अथवा पैर का कम्पन होने पर तद्गत शरीर कम्पित होता नहीं देखा जाता, यही इसमें विरुद्धधर्मता मिलती है । उसी प्रकार एक अवयव के ढक जाने पर उसमें समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी का ग्रहण नहीं