भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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९२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-६ अन्यस्य अभावे अणव एव, ते च यदि संयुज्यन्ते निरन्तरतया तत् अवश्यं दिग्भागभेदः, देवनाक्षे षट्सु दिक्षु संचीयमानेषु षट्सु अणुषु मध्यमस्य परमाणोः यत्रैव धाम्नि एको लग्नः तत्रैव यदि अपरः तत् एकपरमाणुमात्रता । अथ अन्यत्र एकः अन्यत्र अपरः तत् अवश्यं भागभेदापत्तिः, इति भाग एव परमार्थसन्, तस्यापि एषैव सरणिः इति न किंचित् अवशिष्यते बाह्यं तत्त्वतः । न चैतत् वाच्यम् — मूर्तानाम् एकदेशत्वायोगात्, संयोगे भिन्नदेशत्वाव्यावृत्तेः तन्निष्ठं द्व्यणुकं नाम कार्यद्रव्यम् अणुपरिमाणम्, तेभ्यः त्रिभ्यो महत्कार्यम् इति । अवयविवादो हि अयम्, स च पूर्वमेव अपबाधितः । यच्च अव्याप्यवृत्तित्वं संयोगस्य उच्यते तन्निरंशे कथं संगच्छताम् । स्वाश्रये हि यदि असौ समवैति किम् अन्यत् अस्य अवशिष्टम् यत् न व्याप्नुयात् इति, अभ्युच्चयबाधकं च इदम्, इति न अत्र अस्माभिः भरः¹ कृतः । विस्तरेण च प्रज्ञालङ्कारे दर्शितम् आचार्यशंकर- नन्दनेन ॥ ६ ॥ अवयवी वस्तु ही नहीं है तो अवयव किसमें रहेगा, यही वृत्ति की अनुपपत्ति है, समवाय की भी तो असिद्धि हो जाती है, क्योंकि अवयव अवयवी की सत्ता में ही समवाय की सत्ता रहती है, कम्पन-अकम्पन [ स्थैर्य ] आवरण-अनावरण, रक्त-अरक्तादि दिशाओं का भेद विरुद्ध धर्मों के संयोग मूर्त में बाध माना जाता है। अणु समुदायवाद में भी अणु समुदाय दूसरे परमाणु विलक्षण के अभाव में अणु ही रह जाते हैं और वे यदि निरन्तर संयुक्त होकर मिले रहते हैं तब तो अवश्य ही दिशाओं से उपलक्षित होनेवाले भाग का भेद हैं, ऐसी स्थिति में तो दिशाओं में भी भेद मानना पड़ेगा, षट् कोणवाली दिशाओं का ही भेद होता है, परमाणुओं का संयोग- वियोग भी बन सकता है इसो प्रकार वहाँ पर भी मान लो, इसीलिए यथार्थता में बाह्य कोई पदार्थ नहीं है और वह एक परमाणु मात्र का समर्थन भी नहीं कर सकता है मूर्तों के एक स्थान में रहना असम्भव होने से, संयोग हो जाने पर भिन्न देश में रहना नहीं बनेगा उसमें रहनेवाले दो परमाणु कार्य द्रव्य अणुपरिणाम ही रहेगा तीन परमाणु से महत् कार्य होता है। इस अवयवि- वाद का तो हमने पूर्व में ही खण्डन कर दिया है। अव्याप्यवृत्ति संयोग अक्षपाद के मत की आशङ्का कर कहते हैं ‘यच्चेति’—संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व निरंश में कैसे हो सकेगा। यदि यह कहो कि अपने आश्रय में संयोग रहता है तो कौन वस्तु ऐसी है जहाँ पर संयोग व्याप्त नहीं होता है और यह बाधकों की भरमार है इसलिए हमने कोई जोर नहीं दिया है और इसका सविस्तार प्रतिपादन श्रीआचार्य शङ्करनन्दन ने प्रज्ञालङ्कार में किया भी है ॥ ६ ॥ होगा, आवरण हट जाने से तो ग्रहण होता है, इस प्रकार एक साथ भी ग्रहण होता है। अब कहो कि अवयवी का सम्बन्ध एक-एक अवयवी के साथ रहता है अथवा सम्पूर्णतया रहता है, एक देश से [ वृत्ति का ] रहना बन नहीं सकता है; अवयव से भिन्न एक देश का अभाव होने से, अथवा सम्पूर्णतया रहता है यह कहो तो भी दूसरे अवयव में वृत्ति नहीं रहती है; क्योंकि एक अवयव के संसर्गावच्छिन्नरूप में दूसरे अवयवों का स्थान न रहने से, उस स्वरूप से अतिरिक्त इसका दूसरा स्वरूप नहीं होने से भी यह बात है । १. भरः—शब्द अतिशय प्रयत्न—अर्थ में है ।