भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

अ.-१, आ.-५, का.-७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९३ ननु बाधकं नाम प्रमाणसिद्धे वस्तुनि न किंचित् कर्तुं समर्थम्—तेनैव दृढेन प्रमाणेन बाधकाभिमतस्य बाधितस्य अप्रमाणत्वसम्पादनात् । दर्शितं च इह साधकं प्रमाणं कार्यहेतुः 'तत्तदाकस्मिकाभास' इति कारिकया इत्याशङ्क्य आह— चिदात्मैव हि देवोऽन्तःस्थितमिच्छावशाद्बहिः । योगोव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥ ७ ॥ इह तावत् स्वप्न-स्मरण-मनोराज्य-संकल्पादिषु नीलाद्याभासवैचित्र्यं बाह्यसमर्पकहेतु- व्यतिरेकेणैव निर्भासते इति यद्यपि अस्ति सम्भवः, तथापि तदाभासवैचित्र्यम् अस्थैर्यात् सर्वप्रमात्रासाधारण्यात् पूर्वानुभवसंस्कारजत्वसम्भावनात् अवस्तु इति शङ्क्येत । यत् पुनरिदं योगिनाम् इच्छामात्रेण पुरसेनादिवैचित्र्यनिर्माणं दृष्टम्, तत्र उपादानं प्रसिद्धमृत्काष्ठ-शुक्र- शोणितादिवैचित्र्यमयं न सम्भवत्येव, न हि एवं वक्तुं शक्यम्—सर्वगताः परमाणवो योगीच्छया झटिति संघटिताः कार्यम् आरप्स्यन्ते इति । यत एतत् लोकप्रसिद्धकारणभावानतिक्रमसिद्धये अब प्रश्न करते हैं कि प्रमाण से सिद्ध वस्तु में बाधक प्रमाण कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि उस दृढ प्रमाण से जिसको बाधक माने हुए हो उसमें अप्रमाणत्व सम्पादित हो जाता है और इसमें साधक प्रमाण तो कार्य का हेतु है इसे 'तत्तदाकस्मिकाभासः' इस कारिका में दिखा दिया है; इस प्रकार आशङ्का कर कहते हैं— चिदात्मा देव ही अपने भीतर स्थित अर्थसमूह को इच्छाबल से बाहर की ओर प्रकाशित करते हैं जैसे योगी उपादान कारणादि के बिना भी अर्थसमूह को प्रकाशित करते हैं ॥ ७ ॥ स्वप्न, स्मरण, मनोराज्य, संकल्पादि में बाहरी कारणों के बिना भी नीलादि पदार्थ चित्र- विचित्र रूपों से भासित होते हैं, यह सब संभव है, उसी प्रकार आभास की विचित्रता अस्थिर होने से सभी प्रमाताओं में असाध्य होने के कारण पूर्वकाल के संस्कार से ही उत्पन्न होती है इसलिए अवस्तु ही है । जो कि यह योगी लोगों की इच्छा मात्र से पुर, सेना, गढ़-किला आदि का विचित्र-चित्र निर्माण देखा जाता है उसमें प्रसिद्ध उपादन [ कार्य से अभिन्न रहता है जैसे घट के प्रति मिट्टी उपादान कारण होती है ] मिट्टी, काष्ठ, शुक्र, शोणितादि वैचित्र्यमय कारणों की तो संभावना भी नहीं देखी जाती है, ऐसा नहीं कह सकते हो—योगी की इच्छामात्र से सब जगह रहनेवाले व्यापक परमाणु आपस में एक दूसरे से मिलकर शीघ्र ही कार्य संपादन कर देते हैं । जब कि यह लोक प्रसिद्ध कार्य-कारणभाव अनतिक्रम सिद्धि के लिए निरूपण करते हैं । यह प्रसिद्ध १. जिन लोगों ने अपना परम संविद्रूप स्वातन्त्र्य नहीं जाना है उन्हें सदैव संशय-विपर्यय बने ही रहते हैं । जिन्होंने संविद्रूप स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लिया है उन्हें तो कभी-कभी दूसरे कारण को खोजने के लिए अन्वेषण नहीं करना पड़ता है । इस विषय में "भट्टदिवाकरवत्स" ने कहा है 'न दृश्यते त्वत्प्रतिभास- शक्तेः स्वप्नेऽर्थवैचित्र्यनिमित्तमन्यत् । तद्दृष्टसामर्थ्यतया सदैव विश्वप्रपञ्चप्रथनेकहेतुः ॥ हे प्रभो ! आपकी प्रतिभा-शक्ति से भिन्न कोई निमित्त अर्थवैचित्र्य के लिए स्वप्न काल में भी नहीं दिखते हैं । विश्वप्रपञ्च का विस्तार करने में एक मात्र कारण संविद्रूप का सामर्थ्य ही है । २. घटरूप कार्य से अभिन्न रहनेवाला उपादान कारण कहलाता है जैसे कि घट के प्रति मिट्टी ।