ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-७ निरूप्यते । न च एतत् प्रसिद्धम्—परमाणुभ्य एव स्थूलं घटादि जायते इति, किं तु कपालादि- व्यवधानेन, तत्रापि नियंतसहकारिसमवलम्बनम् करचरणादिव्यापारो विशिष्टदेशकालधर्माधि- पत्ययोगः शिक्षाभ्यासप्रकर्ष इति, इयति च आश्रीयमाणे योगी कुम्भं निर्मिमाणः कुम्भकार- प्रसिद्धसमस्तसामग्रीसमर्जनपुरःसरं घटं घटयन् कुम्भकार एव स्यात्, तस्मात् प्रसिद्धकार- णोल्लङ्घने किम् असंचेत्यमानपरमाण्वाद्युपादानकारणान्तरचिन्तया इति । तत्र योगिसंविद एव सा तादृशी शक्तिः—यत् आभासवैचित्र्यरूपम् अर्थजातं प्रकाशयति इति । तत् अस्ति सम्भवः— यत् संवित् एव अभ्युपगतस्वातन्त्र्या अप्रतीघातलक्षणात् इच्छाविशेषवशात् संविदोऽनधिकात्म- ताया अनपायात् अन्तःस्थितमेव सत् भावजातम् इदमित्येवं प्राणबुद्धिदेहादेः वितीर्णकियन्मात्र- संविद्रूपात् बाह्यत्वेन आभासयति इति, तत् इह विश्वरूपाभासवैचित्र्ये चिदात्मन एव स्वातन्त्र्यं किं न अभ्युपगम्यते स्वसंवेदनसिद्धम्, किमिति हेत्वन्तरपर्येषणप्रयासेन खिद्यते । एवकारेण इदमाह—सर्वेण तावत् वादिना विषयव्यवस्थापनं संविद्रूपम् अनपह्नवनीयम् आदिसिद्धं हि तत् इति उक्तम् । तस्य च स्वातन्त्र्यमेव देवशब्दनिर्दिष्टं चिद्रूपत्वम्, इति किम् अपकारणान्वेषण- व्यसनितया । हि यस्मात् एवं प्रकाशयति देव इति सम्भाव्यते, तस्मात् किं बाह्येन अनुपप- त्तिना, इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ७ ॥ नहीं है कि परमाणुओं से ही घटादि की उत्पत्ति होती हो । किन्तु दो कपाल आपस में जब मिलते हैं तभी घट तैयार होता है, उसमें भी नियत सहकारी कारणों [घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहने- वाले जैसे चक्र, दण्ड, चीवरादि सहकारी कारण कहलाते हैं] का अवलम्बन करना, हाथ, पैर आदि के व्यापार विशिष्ट देश-काल धर्म का योग होना अपेक्षित है । घट निर्माण के लिए घट सम्बन्धी शिक्षा, ज्ञान एवं अभ्यास का होना आवश्यक होता है । इतनी वस्तु-सामग्री के रहने पर योगी घट बनावे तो कुम्भकार ही सिद्ध हो जायेगा, इसलिए प्रसिद्ध कारण के उल्लंघन करने में जो संभव नहीं है उस परमाणु से भिन्न कारण की चिन्ता करना व्यर्थ है । उसमें तो योगी के ज्ञान की ही वह वैसी शक्ति है—जो आभास वैचित्र्यरूप से अर्थसमूह को प्रकाशित करती है । इसलिए संभव हो सकता है जो कि संवित् ही अपनी मिली हुई स्वतंत्रता से, निर्बाधरूप से, इच्छा विशेष से, अधिक न होनेवाली संवित् का नाश न होने से, भीतर रहनेवाले पदार्थ समूह को ही बाहर में प्राण, बुद्धि, देहादि रूप से, कुछ फैली हुई संविद्रूप से, बाहर में आभासित करती है, इसलिए बाहर के भावपदार्थों की विचित्र-चित्ररूपता में चिदात्मा का ही स्वातन्त्र्य क्यों नहीं मान लेते हो जोकि वह स्वयं संवेदन ज्ञान से सिद्ध है, क्यों दूसरे-दूसरे हेतु के खोजने के परिश्रम से खिन्न होते हो । 'एवकार' शब्द से यह कहते हैं कि सब वादी से विषय की व्यवस्था संविद्रूप मानो जाती है जो कि आदि सिद्ध है उसे हमने पहले ही कह दिया है और उसके स्वातन्त्र्य को 'देव' शब्द से व्यक्त किया है, क्यों दूसरे कारण को खोजने में व्यसनी बनते हो, 'हि' जिससे ऐसा यह देव प्रकाशित होता है, ऐसी संभावना करना संभव हो सकता है । इसलिए बाह्य कारण की क्या आवश्यकता है जबकि बन नहीं सकता ॥ ७ ॥ १. 'इति' शब्द वाक्य की समाप्ति अर्थ में दिया गया है । २. घटरूप कार्य से भिन्न देश में रहनेवाले का नाम सहकारी कारण है । जैसे घट के प्रति दण्ड-चक्रादि ।