ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-८-९ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९५ ननु एवम् उभयथापि सम्भावनानुमानम् उन्मिषति, तत्र किं मुकुरप्रतिबिम्बितघटादि- दृष्टान्तेन ज्ञानप्रतिबिम्बिताभासबैचित्र्ये विज्ञानदर्पणातिरिक्तं तत एव बाह्याभिमतं हेतुं कल्पयेम ? किं वा योगिदृष्टान्तेन संवित्स्वातन्त्र्यमेव हेतुभावेन ब्रूयाम ? तदिदं सांशयिकं वर्तते इति आशङ्क्य बाह्यार्थानुमानसम्भावनां सूत्रद्वयेन अपाकर्तुमाह— अनुमानमनाभातपूर्वे नैवेष्टमिन्द्रियम् । आभासमेव बीजादेराभासाद्वेतुवस्तुनः ॥ ८ ॥ आभासः पुनराभासाद्बाह्यस्यासीत्कथंचन । अर्थस्य नैव तेनास्य सिद्धिर्नाप्यनुमानतः ॥ ९ ॥ न केवलम् अनन्तरश्लोकनिर्दिष्टाभिः युक्तिभिः प्रत्यक्षेण बाह्योऽर्थो न आभासते, इयदेव हि प्रत्यक्षं—यत् नीलं भाति इति स्वप्रकाशसंविद्रूपं, नाधिकं किञ्चित् इति, यावत् अनुमानेनापि न अस्य बाह्यस्य सिद्धिः इति अपिशब्दः । तत्र अनुमानम् अत्र नैव प्रवर्तितुम् उत्सहते । प्रवृत्त- मपि न प्रकृतसिद्धम् आदध्यात् इति अनेन सूत्रद्वयेन दर्श्यते । तत्र अनुमानं—विकल्पः, सर्वश्च अयं विकल्पोऽनुभवमूल इति प्रसिद्धम् । तेन यत् सर्वथा अनाभातपूर्वम्—अननुभूतचरं तत्र अब शंका करते हैं कि आगे कही जानेवाली दोनों तरह की संभावना से अनुमान निकलता है, [ सर्वथा ही दूसरे में रहनेवाले अनुमान को सिद्ध करना होगा और उस सम्भावनारूप अनुमान से तो दोनों समान ही विकसित होंगे अतः इसमें फिर किसका त्याग किया जाय और किसका ग्रहण किया जाय । ] घटादि का दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान अथवा ज्ञान में जो प्रतिबिम्बता का आभास है उसकी विचित्रता में विज्ञान दर्पण से भिन्न और उसीसे बाहर माने हुए [ अपने सदृश दूसरे भाव-पदार्थ का संक्रमण होना ] हेतु की क्या कल्पना करोगे ? अथवा योगी के दृष्टान्त से ज्ञान की ही स्वतन्त्रता को हेतुभाव से क्या हम कहेंगे ? यही बात सन्देह में पड़ी हुई है ऐसी आशंका कर बाह्यार्थ के अनुमान की सम्भावना को दूर करने के लिए दो श्लोकों से कहते हैं— पूर्व में जिसका आभास नहीं हुआ है उसका अनुमान नहीं होता, हेतु देने योग्य जो बीजादि वस्तु है उस आभास से इन्द्रियाँ आभासित ही होती हैं ॥ ८ ॥ बाहर के आभास से किसी भी तरह उसका आभास था इसलिए बाहर का अनुमान नहीं हो सकता है, हेतु से अर्थ की सिद्धि नहीं हो सकती और अनुमान से भी नहीं हो सकती ॥ ९ ॥ इसके पूर्व में दिखाये गये श्लोक की युक्तियों से भी नहीं अपितु प्रत्यक्षरूप से भी बाह्य अर्थ नहीं आभासित होता है, इतना ही प्रत्यक्ष है जो नील आभासित होता है—इसे पूर्व में ही कह दिया है, अब कुछ भी अधिक कहना शेष नहीं रह जाता है। 'अपि' शब्द का अर्थ है कि अनुमान से भी इसकी सिद्धि नहीं होगी। अनुमान की भी इसमें प्रवृत्ति नहीं होती है। प्रवृत्त हो भी जाय तो भी बाह्यार्थ की सिद्धि नहीं कर सकता, यह बात दोनों सूत्रों से बतलायी जाती है। अनुमान-विकल्प करना, और समस्त विकल्प अनुभव मूलक ही रहता है यह सर्वजन विदित ही