ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-८-९ अनुमानम् अनुमितिव्यापारो विकल्पात्मा नैव केनचित् वादिना इष्यते । ननु भवतु प्रत्यक्षतो दृष्टेऽनुमाने संकथा इयम्, सामान्यतो दृष्टे तु किं वक्ष्यसि यथा अर्थोपलब्धया इन्द्रियानुमाने ?, उच्यते—तत्रापि विकल्पेन यथा सोऽर्थः स्पृश्यते तथा अनुमेय इति स्थितः । विकल्पश्च न इन्द्रियादिकम् अर्थं केनचित् संनिवेशविशेषात्मना स्पृशति, अपि तु किंचिदुपलब्धेः कारणम् इति अमुना स्वभावेन, स च स्वभावः कारणतालक्षणः प्रत्यक्षगृहीत एव । तथा च बीजात् अङ्कुरः तन्तुभ्यः पट इत्यादौ कार्यकारणभावः प्रत्यक्षानुपलम्भबलेन तावत् निश्चेयः । तत्र च प्रत्यक्षं प्रत्याभासं प्रामाण्यं भजते, विमर्शलक्षणस्य प्रमितिव्यापारस्य एकैकशब्दवाच्येऽर्थे विश्रान्तेः, तदनुसारित्वाच्च प्रमाणस्य इति वक्ष्यते । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता ।' इति । आभासमात्रं च सामान्यम् इति निर्णेष्यते । अनुपलम्भोऽपि अन्योपलम्भरूप आभासमात्रविश्रान्त एव—इति कारणाभासो विशेषशून्यः परिगृहीत एव बीजात् अङ्कुर इति प्रतीतो यत् यं-यं नियमम् अनुविधत्ते अव्यतिरिक्तम् तत् तस्य कार्यम्, इति प्रतिघटं मृत्तिकादिरूपस्य हेतुतद्धन्मा- त्रस्य आभासात्, साभासात् बाह्यः पुनरनाभासरूपः, स च आभासते इति विप्रतिषिद्धम् । अनाभाते च नास्ति विकल्परूपस्य अनुमानस्य व्यापारः । ग्रामगृहादेस्तु यत् बाह्यं तत् अग्रामादिरूपं न उच्यते—प्रत्येकं वाटातूपकुड्यतुलादेः बाह्यत्वप्रसङ्गात् अपि तु तत्संनिकृष्टम्, तस्मात् ग्रामबाह्यम् आभासबाह्यम् इति च शब्दसाम्यमात्रम् एतत् न वस्तुसाम्यम् । एवं ये है। इसलिए जिसका पूर्व में आभास नहीं हुआ है उसमें अनुमान जो अनुमिति का व्यापार है उसका विकल्परूप किसी भी वादी को इष्ट नहीं है, भले ही प्रत्यक्ष से दृष्ट अनुमान के रहने पर हो, किन्तु सामान्यतो दृष्ट में क्या कहोगे, जैसा कि अर्थ उपलब्धि से इन्द्रियों के अनुमान में ? उत्तर देते हैं—सविकल्प और निर्विकल्प का प्रत्यक्ष में भी विकल्प से जैसा अर्थ आभासित होता है वैसा ही अनुमेय भी होता है और विकल्प किसी संनिवेश विशेष से इन्द्रियादि पदार्थ को नहीं स्पर्श [ प्रकाशित ] करता है, अपि तु किंचित् उपलब्धि के कारण इन्द्रियाँ हैं इसी कारण से, और वह स्वभाव प्रत्यक्ष से ही गृहीत होता है । वैसा ही बीज से अंकुर और तन्तु से पट इत्यादि में कार्य- कारणभाव प्रत्यक्ष और अनुपलब्भ से निश्चय होता है । और प्रत्यक्ष तो सभी आभास में प्रमाण होता है, विमर्शरूप जो प्रमा का व्यापार है उसके अभिधेय अर्थ में भासित होता है, और तदनुसार प्रमाण कहेंगे । 'एकाभिधानविषये मितिर्वस्तुन्यबाधिता' और आभास मात्र को सामान्य रूप से निर्णय करेंगे । अनुपलब्भ को भी अन्य उपलम्भरूप आभासमात्र में ही विश्रान्त रहेगा, जिसके रहने पर जो नियम से होता है वही उसका कार्य माना जाता है जैसा कि मिट्टी से घट और बीज से अंकुररूप, प्रत्येक घट में मिट्टी का आभास रहता है उसी का हेतुरूप से आभास होता है, जब आभास सहित होने के कारण बाह्य अनाभास रूप है और भासित होता है यह तो परस्पर विरुद्ध है । जब अनाभास होनेसे विकल्परूप अनुमान का व्यापार नहीं बन सकता । ग्राम, गृहादि से जो वस्तु बाह्य है उसे अग्राम, गृहादिरूप नहीं कहा जाता है यदि बाह्यरूप माना जाय, तो फिर प्रत्येक देश में रहनेवाले भित्तिका अर्थात् दीवाल, तुलादि को भी बाह्य रखना होगा । अपितु उसके भीतर की ही बात कही जाती है ग्राम के बाहर होने पर भी ग्राम की ही ये वस्तुएँ हैं ओर यह व्यवहार देखा भी जाता है, इसलिए ग्राम से बाह्य और आभास बाह्य मात्र एक कथन ही है वस्तु साम्य नहीं है अर्थात् इसमें दूसरा कोई अभिप्राय नहीं है । एवं विकल्प में वस्तु