ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९७ विकल्पे वस्तु न आभाति इति मन्यन्ते तेषामपि तावत् अनुमानविकल्पो न बाह्ये उपपन्नः । अस्माभिस्तु उपपादितम्—अध्यवसायस्यापि आभासमानविषयत्वम् 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' इति सूत्रे । तेन अनुमानविकल्पात्मनापि प्रकाशेन यदि अनाविष्टो नीलादिः अर्थः तत् न अनुमित एव स्यात् । अथ आविष्ट एव, तर्हि 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति न्यायेन प्रकाशमात्रस्वभाव एव, न बाह्यः । तेन बाह्ये साध्ये यत् किंचित् प्रमाणम् आनीयते, तदबाह्यतामेव प्रत्युत प्रसाधयति इति विरुद्धमेव, अत एव आह 'कथंचन' इति, केनापि प्रकारेण प्रत्यक्षात्मना अनु- मेयात्मना वा आभासनम् आभासो बाह्यस्य अनाभासस्य न कदाचित् अभूत् इति, तस्मात् सिद्धम् 'चिदात्मैव हि देव' इति ॥ ८-९ ॥ ननु अन्तःस्थितं बहिः प्रकाशयेदित्युकतं तत् अन्तःस्थितत्वम् उपपादनीयम् इति आशङ्क्य आह— स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् । अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥ १० ॥ आभासित नहीं होती है ऐसा जो बौद्ध मानते हैं, उनका भी अनुमान विकल्प बाह्य में नहीं हो सकता । किन्तु हमने तो इसका 'भ्रान्तित्वे चावसायस्य' सूत्र में प्रतिपादन कर दिया है [ 'भ्रान्तित्वे' यह उपलक्षण है, इसलिए 'भासयेच्च स्वकालेऽर्थात्' इत्यादि से कहा है और 'केवलं भिन्नसंवेद्यः' इत्यादि में कहेंगे ] इसलिए अनुमान विकल्परूप प्रकाश से यदि नीलादि अर्थ आविष्ट नहीं है तो उसका अनुमान नहीं बनेगा; यदि कहो कि आविष्ट है तो 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इस युक्ति से प्रकाशमात्र स्वभाव ही होगा, बाह्य नहीं है । बाह्य साध्य में जो कुछ प्रमाण ले आयेंगे वह तो अबाह्यत्व को ही सिद्ध करेगा इसमें तो आपको विरुद्ध ही दिखायी पड़ेगा, इसलिए कहते हैं 'कथंचन' किसी प्रकार भी प्रत्यक्षरूप से, अनुमेयरूप से आभासन वा आभास का अनाभास कभी भी नहीं हुआ, इसलिए 'चिदात्मैव हि देवः' चिदात्मा ही देव है—यह सिद्ध हुआ ॥ ८-९ ॥ अब इस पर प्रश्न करते हैं कि अन्तःकरण में अवस्थित रहे हुए का ही बाहर में प्रकाश होता है ऐसा जो कहा गया है उसे ही सिद्ध करना है [ यदि चिदात्मा देव में रहनेवाली पदार्थ राशि है तो फिर क्यों नहीं भासित होती है इसे युक्ति द्वारा साधते हैं ] इस तरह आशंका कर कहते हैं— चिदात्मा देव में रहनेवाले ही अर्थ-समूह भासित होते हैं । इसलिए उनमें अर्थराशि तो रहतो है किन्तु इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता है ॥ १० ॥ १. संवेदन ज्ञान के भीतर बाह्य अर्थ का प्रतिबिम्ब रहता है प्रतिबिम्बरूप आभास का उत्थापक है अर्थात् अन्तःकरण में ज्ञान का आभास तभी रहता है जब बाहर में पदार्थ विद्यमान रहता है इसमें कोई प्रमाण नहीं है इससे सिद्ध होता है कि चिदात्मा देव ही सब कुछ है बाह्यरूप कुछ भी नहीं है । २. बाहर में अवभासित होनेवाले पदार्थ समूह का अवभासन केवल इदन्तारूप से ही होना यह सकल लोक में प्रसिद्ध नहीं है जब कि भगवान् महेश्वर में अन्तःस्थितरूप से भी अवभासन रहता ही है, और बाहर में इदन्ता का उल्लास न होने कारण अहन्तारूप से अन्तर में नहीं है यह भी बात नहीं है अपितु अन्तर में सदैव आभास बना ही रहता है । ३. इसका यह आशय है कि चिदात्मा ईश्वर का जैसे अभेद में आभास होता है वैसे ही समस्त अर्थों में १३