ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१० बहीरूपतयापि आभासने अन्तरूपता न त्रुट्यति 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' इति हि वक्ष्यते, तच्च सदैव प्रकाशस्य प्रमातृत्वात्, तदात्मतया च विना प्रकाशमानस्य अवस्तुत्वात्, किं तु तत्र अहम् इति उचिते परामर्शे योऽयम् इदन्तापरामर्शः सैव बाह्यता, तच्च इह अन्तःस्थितत्वम् अह मित्येतावता चित्समुचितेनैव वपुषा परामर्शनम्, तच्च इह नीलादीनामस्त्येव, न तु नास्तिइति, यदि हि न स्यात् कुम्भकृतो 'घटं करवाणि' इति य उत्तरक्रियापेक्षया इच्छाशब्दवाच्यः परामर्शः एषणीयात्मना, स परामृश्येन अनियन्त्रितः चेत् ततः पटेच्छापि सा न कस्माद्इति संकीर्येरन् व्यवहाराः । अथ तत्रापि च एषणीयः तदानीमेव निर्मितः सम् तथा जातः, तर्हि तन्निर्माणं चिदा- त्मनि विनेच्छया नोपपन्नम् इति । 'तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता ।' इत्यत्र वर्णयिष्यते । ततश्च इच्छान्तरमपि विषयनियन्त्रितं ? न वा ? इति विकल्पेनानवस्था । विषयनियन्त्रितं चेत् स्यात् आत्मतैव जाता, न चेत् घटे पटेच्छा स्यात् । अथ तत्रापि तदानीमेव इति कृत्वा अनवस्था, तस्मात् सर्वोऽयं भावराशिः चिदात्मनि अहम् इत्येव वपुषा सततावभासुरवपुः ऐश्वर्यरूपाच्च स्वातन्त्र्य- लक्षणात् स्वामिभावात् विचित्रेण वपुषा क्रमाक्रमाविना संवित् एनं बहिष्करोति प्रमातृभेदप्रथन- पदार्थराशि बाहर रूप से प्रकाशित होने पर भी उसका भीतर रहना बना रहता है खण्डित नहीं होता है 'प्रमात्रैकात्म्यमान्तर्यम्' क्योंकि ऐसा आगे कहा जायेगा और वह भीतरी प्रकाश सदैव बाहर में भी प्रकाशित होता रहता है प्रमातारूप होने के कारण और उसके बिना प्रकाशमान न होने से अवस्तु हो जायेगी किन्तु 'अहं' इस समुचित परामर्श में जो यह इदन्ता परामर्श है उसी का नाम बाह्यरूपता है और यहाँ पर भीतर रहनेवाले 'अहम्' इस शब्द से समुचितरूप में परामर्श करना इतना ही माना जाता है वह नीलादि भाव-पदार्थों में रहता ही है, नहीं रहता है, ऐसी बात नहीं है, यदि वह न रहे तो कुम्भकार 'घटं करवाणि' द्वारा घट का निर्माण होना, मैं आज घट बनाऊँगा ऐसी आगे की क्रिया को लेकर इच्छा शब्द से कहे जानेवाला परामृश्यमान जो घट है उससे नियन्त्रित नहीं होगा, तब तो अन्तर में स्थित परामर्श को पट इच्छा क्यों न मानी जाय ? इस प्रकार सारा व्यवहार संकीर्ण होकर आपस में मिल जायेगा । अब कहो कि उस समय जो इच्छा का विषय है वह उसी समय उत्पन्न होगा, तब तो चिदात्मा में बिना इच्छा से कोई वस्तु-पदार्थ का निर्माण ही सिद्ध नहीं हो सकेगा 'तिष्ठासोरेवमिच्छेव हेतुता ।' इसका वर्णन किया जायेगा और इससे दूसरी इच्छा भी परामृश्यविषय से नियन्त्रित रहेगी ? या नहीं रहेगी ? ऐसा विकल्प करते करते अनवस्था हो जायेगी । यदि विषय से सम्बद्धता रखती है तो आत्मस्वरूप ही हो गया, यदि घट में पट इच्छा न हो तो दूसरी इच्छा में भी इसी ढङ्ग से अनवस्था हो जायेगी, इसलिए समस्त पदार्थराशि अहँरूप चिदात्मा में निरन्तर भासित होते रहना उसका स्वरूप नहीं है और ऐश्वर्यरूप से, स्वातन्त्र्यरूप से, स्वामी होने से, चित्र विचित्ररूप कार्य-कारणभाव के क्रम से अथवा अक्रम से संवित् ज्ञान ही इस पदार्थ राशि को बाहर की ओर प्रकाशित करता है, प्रमातृभेद के विस्तार के साथ, उसमें भी कहीं पर आभास में प्रमातृवर्ग को एक कर देता है । जैसे नृत्य करनेवाली नर्तकी अपनी भावभङ्गी से भी अभेद पूर्वक ही आभास होता है—अर्थात् अपने स्वरूप में पदार्थों का भी अभिन्नरूप से ही प्रकाश है, नहीं तो भासमान होनेवाले अर्थरूपी विषय प्रमाता का इच्छारूप विमर्श नहीं हो सकता है ।