भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९९ पूर्वकम्, तत्रापि केचित् आभासे प्रमातॄन् एकीकरोति नितम्बिनीनृत्त इव प्रेक्षकान् । तावति हि तेषाम् आभासे ऐक्यम् । शरीरप्राणबुद्धिसुखाद्याभासांशेषु तु भेदस्य अविगलनात् न सर्वथा ऐक्यम् । अत एव प्रतिक्षणं प्रमातृसंयोजनावियोजनावैचित्र्येण परमेश्वरो विश्वं सृष्टिसंहारादिना प्रपञ्चयति । तदुक्तमाचार्येण—‘सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहार- तृप्ताय भवते नमः ॥’ इत्यादि । श्रीभट्टनारायणेनापि—‘मुहुर्मुहुरविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ इति । तस्मात् स्थितम् अन्तःस्थितं भावजातं— तेन विना तद्विषयस्य परामर्शस्य अयोगात् इति ॥ १० ॥ प्रेक्षकवर्ग की दृष्टि को अपनी ओर एक सी कर देती है । उतने अंश में ही उनके आभास में ऐक्य रहता है । शरीर, प्राण, बुद्धि और सुखादि का आभास के भागों में भेद न टूटने से सर्वथा ऐक्य नहीं होता है । इसलिए परमेश्वर प्रतिक्षण प्रतिपल प्रमाताओं के संयोजन [मलप्रेक्षादि में ] वियोजन [ अन्यत्र ] की विचित्रता से सारे विश्वको सृष्टि, स्थिति, संहार-प्रलयादि द्वारा प्रपञ्चित किया करते हैं । आचार्यपाद ने भी कहा है—‘सदा-सर्वदा विनोदरूपी सृष्टिकारनेवाले सदा सुखार्थ स्थितिरखनेवाले उसे अपने में लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे आपको नमस्कार हो ।’ इस प्रकार श्री भट्टनारायण ने भी कहा है—‘सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की बारम्बार कल्पना करते हुए भी विश्रान्ति लेनेवाले कोई एक निर्विकल्प अज की जय हो ।’ इसलिए मानना पड़ेगा कि चिदात्मा के भीतर पदार्थ समूह रहता है उनकी इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता ॥ १० ॥

१. आशय यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न शिवत्व का विभाग अवस्था में भी वैसा ही स्वरूप रहता है जैसा कि नर्तकी का नृत्याभास प्रेक्षकगण की दृष्टि को एक ही साथ अपने अभिमुख एकत्रित कर लेने में होता है । श्रीसोमानन्दपादने शिवदृष्टि शास्त्र में सर्वत्र शक्ति पञ्चक स्वभाव का उपसंहार करते हुए कहा है— ‘एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना । शक्त्या निर्वृतचित्तस्य तद्भागाविभागयोः ॥’ तथा च स्फुटमेव तेनैव प्रत्यभिज्ञापितम्, यथा । ‘यदा तु तस्य चिद्धर्मप्रभावामोदजृम्भया ॥ विचित्ररचना नानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने । भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा तुटिः ॥’ इत्यस्य प्रस्तावे सा च दृष्ट्या हृदुद्देशे कार्यस्मरणकालतः । प्रहर्षवेगसमये दरसन्दर्शनक्षणे ॥ अनालोचनतो दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे । विसर्गोक्ति प्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥ एतेष्वेवप्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता । इति ।