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ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

अ.-१, आ.-५, का.-१० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ९९ पूर्वकम्, तत्रापि केचित् आभासे प्रमातॄन् एकीकरोति नितम्बिनीनृत्त इव प्रेक्षकान् । तावति हि तेषाम् आभासे ऐक्यम् । शरीरप्राणबुद्धिसुखाद्याभासांशेषु तु भेदस्य अविगलनात् न सर्वथा ऐक्यम् । अत एव प्रतिक्षणं प्रमातृसंयोजनावियोजनावैचित्र्येण परमेश्वरो विश्वं सृष्टिसंहारादिना प्रपञ्चयति । तदुक्तमाचार्येण—‘सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहार- तृप्ताय भवते नमः ॥’ इत्यादि । श्रीभट्टनारायणेनापि—‘मुहुर्मुहुरविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥’ इति । तस्मात् स्थितम् अन्तःस्थितं भावजातं— तेन विना तद्विषयस्य परामर्शस्य अयोगात् इति ॥ १० ॥ प्रेक्षकवर्ग की दृष्टि को अपनी ओर एक सी कर देती है । उतने अंश में ही उनके आभास में ऐक्य रहता है । शरीर, प्राण, बुद्धि और सुखादि का आभास के भागों में भेद न टूटने से सर्वथा ऐक्य नहीं होता है । इसलिए परमेश्वर प्रतिक्षण प्रतिपल प्रमाताओं के संयोजन [मलप्रेक्षादि में ] वियोजन [ अन्यत्र ] की विचित्रता से सारे विश्वको सृष्टि, स्थिति, संहार-प्रलयादि द्वारा प्रपञ्चित किया करते हैं । आचार्यपाद ने भी कहा है—‘सदा-सर्वदा विनोदरूपी सृष्टिकारनेवाले सदा सुखार्थ स्थितिरखनेवाले उसे अपने में लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे आपको नमस्कार हो ।’ इस प्रकार श्री भट्टनारायण ने भी कहा है—‘सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की बारम्बार कल्पना करते हुए भी विश्रान्ति लेनेवाले कोई एक निर्विकल्प अज की जय हो ।’ इसलिए मानना पड़ेगा कि चिदात्मा के भीतर पदार्थ समूह रहता है उनकी इच्छा के बिना परामर्श नहीं हो सकता ॥ १० ॥

१. आशय यह है कि सर्वशक्तिसम्पन्न शिवत्व का विभाग अवस्था में भी वैसा ही स्वरूप रहता है जैसा कि नर्तकी का नृत्याभास प्रेक्षकगण की दृष्टि को एक ही साथ अपने अभिमुख एकत्रित कर लेने में होता है । श्रीसोमानन्दपादने शिवदृष्टि शास्त्र में सर्वत्र शक्ति पञ्चक स्वभाव का उपसंहार करते हुए कहा है— ‘एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना । शक्त्या निर्वृतचित्तस्य तद्भागाविभागयोः ॥’ तथा च स्फुटमेव तेनैव प्रत्यभिज्ञापितम्, यथा । ‘यदा तु तस्य चिद्धर्मप्रभावामोदजृम्भया ॥ विचित्ररचना नानाकार्यसृष्टिप्रवर्तने । भवत्युन्मुखिता चित्ता सेच्छायाः प्रथमा तुटिः ॥’ इत्यस्य प्रस्तावे सा च दृष्ट्या हृदुद्देशे कार्यस्मरणकालतः । प्रहर्षवेगसमये दरसन्दर्शनक्षणे ॥ अनालोचनतो दृष्टे विसर्गप्रसरास्पदे । विसर्गोक्ति प्रसङ्गे च वाचने धावने तथा ॥ एतेष्वेवप्रसङ्गेषु सर्वशक्तिविलोलता । इति ।

१०० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-११ ननु परामर्शो नाम विकल्पः, स च अविकल्पशुद्धसंविद्वपुषि भगवति कथं स्यात् इत्याश- ङ्क्याह— स्वभावमवभासस्य विमर्शं¹ विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि² स्फटिकादिजडोपमः ॥ ११ ॥ 'एकोऽहं बहुस्याम्' भीतर रहता है तभी इच्छा होती है अन्यथा इच्छा ही नहीं होगी । इस पर कहते हैं कि परामर्श का नाम इच्छा है और वह इच्छा वेद्य की अपेक्षा रखती है । उस विशुद्ध, अविकल्प, संवित्स्वरूप भगवान् में कैसे होगी—ऐसी आशङ्का उठाकर उत्तर में कहते हैं— इस प्रकार इच्छा, ज्ञान और क्रियारूप शक्ति से जिसका कभी भी वियोग नहीं होता, चिद्रूप की स्थिति अन्तर में एवं बाहर में एक सी ही रहती है । विभाग में जैसी शक्तिपञ्चक की स्थिति रहती है वैसा ही कहना चाहिए—इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं— शुद्ध बोधरूप शिवतत्त्व में शक्तिपञ्चक के ऐक्यभाव का समर्थन कर देने पर और उस प्रसङ्ग के माध्यम से अपर अवस्था में भी चिद्रूप की वैसी ही चिदानन्दमय स्थिति अवस्थित रहती है । शक्तिरूप अवस्था जो परा-अपरा हैं उसमें भी इच्छादि पाँच निहित ही हैं यहाँ इससे द्योतित हो रहा है । चिद्रूप शिवभट्टारक का जो धर्म-स्वभाव है वही तो पञ्चविधकृत्य विभव है जो कि सृष्टि, स्थिति, प्रलय अनुग्रहादि करते रहते हैं । आमोद-प्रमोदरूप तथा स्वरूप परामर्शरूप से चिद्रूप का विकास होता है । अनेक प्रकार की सृष्टिकार्य की रचना में निरन्तर चिद्रूप की ही तो उन्मुखता झलकती है तब वह त्रुटि सूक्ष्म काल से परिच्छिन्न होनेवाली इच्छा-शक्ति की प्रथम अवस्था कही जाती है । वह सूक्ष्म उन्मुख-शक्ति हृदयस्थल में, कार्य के स्मरणकाल में तथा हर्ष के हेतुभूत पुत्रादि के जन्म समय में, भय के प्रथम क्षण में, अकस्मात् किसी को देख लेने पर, धातु के विसर्ग अवस्था के अन्त में तथा विसर्जनीय भाषण के प्रसङ्ग में, त्वरित गति से ग्रन्थ के पठन काल में और दौड़ने में इन्हीं प्रसङ्गों में पूर्वोक्त क्रम से भी शक्तियों की विलोलता अतिसूक्ष्म भावरूपता देखने में आती है स्पन्दन शास्त्र में भी कहा है— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ इति । अत्यधिक क्रोध को चरम अवस्था पर पहुँचा हुआ अथवा प्रहर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ [ अकस्मात् किसी कारण से मैं क्या करूँ ? ] इस किं कर्तव्य विमूढता की स्थिति में पड़ा हुआ व्यक्ति जिस भी अवस्था में प्रविष्ट होता है उसी में स्पन्दता की झलक देखता है । १. जिन्होंने अपने स्वभाव परामर्श को प्राप्त कर लिया है वे ही विमर्श को अच्छी तरह जानते हैं । विमर्श 'अहम्' ऐसा असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्ति स्वभाववाला है, वेदवेत्ता लोग इन मन्त्रशरीर, श्रीमातृका, श्रीमालिनीयादि तत्त्व को मानते हैं । २. प्रकाश का मुख्य रूप प्रत्यवमर्श है, उसके बिना अर्थभेद मात्र स्वच्छ ही रहता है किन्तु चेतनता नहीं रहती, क्योंकि चमत्कार का अभाव उसमें होता है ।

अ.-१, आ.-५, का.-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०१ इह अवभासस्य प्रकाशस्य, अनवभासस्य च प्रकाशस्य घटादेः परस्परपरिहारेण द्वयोः स्वात्मनि चेत् व्यवस्थानं, तत् घटपटयोः इव इदमजडम् इदं जडम् इति दुरुपपादं वैलक्षण्यम् । अथ अवभासो यतोऽर्थस्य सम्बन्धी, ततो नाजडः, र्तार्ह सम्बन्धमात्रेण मृत् अपि घटस्य इति अजडा स्यात् । अथ न स्वसम्बन्धमात्रम् अपि तु अवभासोऽर्थस्य प्रकाशः, र्तार्ह अर्थात्मना स प्रकाश इति समापतितम् । न च अन्यात्मना अन्यस्य प्रकाश उपपन्नः । अथ अन्यस्वभावोऽपि घटोऽवभासस्य कारणम्, र्तार्ह अवभासोऽपि घटस्य कारणम् इति घटोऽपि अजडः स्यात् । अथ अन्येनापि सता घटेन यतोऽवभासस्य प्रतिबिम्बरूपा च्छाया दत्ता, ताम् असौ अवभासो बिभ्रत् घटस्य इति उच्यते, ततश्च अजडः, र्तार्ह स्फटिकसलिलमुकुरादिः अपि एवंभूत एव, इति अजड एव स्यात् । अथ तथा- भूतर्माप आत्मानं तं च घटादिकं स्फटिकादिः न पराम्रष्टुं समर्थ इति जडः, तथा परामर्शनमेव अजाड्यजीवितम् अन्तर्बहिष्करणस्वातन्त्र्यस्वरूपं स्वाभाविकम् अवभासस्य स्वात्मविश्रान्ति- लक्षणम् अनन्यमुखप्रेक्षितवं नाम । 'अहमेवं प्रकाशात्मा प्रकाशे' इति हि विमर्शोदये स्वसंविदेव प्रमातृप्रमेयप्रमाणादि चरितार्थम् अभिमन्यते न तु अतिरिक्तं काङ्क्षति, स्फटिकादि हि गृहीतप्रति- बिम्बमपि तथाभावेन सिद्धौ प्रमात्रन्तरम् अपेक्षते, इति निर्विमर्शत्वात् जडम् । सर्वं तु वस्तुतो अवभास का स्वभाव ही विमर्श है । स्वरूप परामर्श करनेवाले ही इसको जानते हैं और तत्त्ववेत्तालोग विमर्श को अहम्, असांकेतिक, स्वातन्त्र्यरूप, आत्मविश्रान्तिरूप, ज्ञाता, कहते हैं । अन्यथा अर्थ से उपरक्त रहने पर भी विमर्श से शून्य प्रकाश स्फटिकादि के तुल्य जड हो जायेगा ॥ ११ ॥ अवभासरूप प्रकाश का और अनवभासरूप अप्रकाश घटादि का परस्पर परिहार हो जाने से [ प्रकाश और घट ] इन दोनों का अपने में परिनिष्ठित स्वरूप मानोगे तो यह जड है एवं यह अजड-चेतन है इस प्रकार चेतन और जड के भेद का पता ही नहीं चलेगा । अब यदि दूसरे पक्ष में कहो कि अवभास पदार्थ सम्बन्धी है और सम्बन्धी होने के कारण जड उसे नहीं मानोगे, तब तो मिट्टी भी घट का सम्बन्धी होने से जड नहीं होगी । इसलिए यह कहना पड़ेगा कि केवल सम्बन्ध मात्र नहीं है अपितु अर्थ के प्रकाश का नाम अवभास है, तब तो फिर वही बात आ गयी जो अर्थरूप से प्रकाश होता है और घट का अन्यरूप से प्रकाश उपपन्न नहीं हुआ । प्रकाश से भिन्न स्वभाववाला भी घट अवभास का कारण होता है, तब तो अवभास भी घट का कारण हुआ इस तरह घट भी अजड चेतनरूप हो जायेगा और प्रकाश का सम्बन्धी होने के कारण अजड- चेतनरूप हो हो जाये, अब कहो कि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करनेवाला स्फटिकादि अपने को' परामर्श करने में समर्थ नहीं हो सकता है इसलिए वह चेतन नहीं है, इससे यह सिद्ध होता है कि परामर्शन ही चेतनता का जीवन है, भीतर में और बाहर में स्वतन्त्र स्वाभाविक, अवभास का स्वात्म- विश्रान्तिरूप किसी अन्य की अपेक्षा न रखनेवाला है इसी को स्वात्मपरामर्श कहा जाता है । 'अहमेव प्रकाशात्मा प्रकाशे' मैं ही प्रकाशरूप में प्रकाशित हो रहा हूँ इस विमर्श के उदय होने पर अपना संवित् ही प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि को ठीक-ठीक मानते हैं उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहते हैं और स्फटिकादि तो प्रतिबिम्ब ग्रहण करने पर भी वैसा अपने को सिद्ध करने में अन्य प्रमाता की अपेक्षा रखता है, अतः विमर्श से रहित होना जड ही है, वस्तुतः यह सब

१०२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१२ विमर्शात्मकप्रमातृस्वभावतादात्म्याहंपरामर्शविश्रान्तेः अजडमेव पूर्वापरकोट्योः । यदुक्तम्— 'इदमित्यस्य विच्छिन्नविमर्शस्य कृतार्थता । या स्वस्वरूपे विश्रान्तिविमर्शः सोऽहमित्ययम् ॥' इति । मध्यावस्थैव तु इदन्ताविमृश्यमानपूर्वापरकोटिः, विमूढानां मायापदं संसारः, इति विमर्श एव प्रधानं भगवत इति स्थितम् ॥ ११ ॥ न केवलं संवित्तत्त्वस्य अस्माभिः एव विमर्शप्राधान्यम् उक्तम् यावत् आगमान्तरैरपि इति दर्शयति— आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चित्कर्तृता । तात्पर्येणोदितस्तेन जडात्स हि विलक्षणः ॥ १२ ॥ यतो विमर्श एव प्रधानम् आत्मनो रूपम् अमुमेव हेतुं प्रयोजनरूपम् उद्दिश्य आत्मा धर्मि- स्वभावो द्रव्यभूतोऽपि, चैतन्यम् इति धर्मवाचिना शब्देन सामानाधिकरण्यम् आश्रित्य उदितः कथितः, भगवता शिवसूत्रेषु 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) इति पठितम्, चैतन्यम् इति हि धर्मवाच- कुछ विमर्शरूप प्रमाता है उसका तादात्म्यरूप अहंपरामर्श में विश्रान्त हो जाने के कारण वह तो आगे या पीछे सर्वदा अजड-चेतनरूप ही रहता है । इस विषय में कहा भी है— इदम् यह परिच्छिन्न-भिन्न विमर्श को सफलता तभी होती है जबकि अपने स्वरूप में अहं इस रूप से विमर्श करता हुआ विश्राम लेता हो । वही मायीयरूप में जब आता है तभी इदन्ता के आगे-पीछे कोटिवाला विमूढा को माया पद में रहनेवाले संसारी कहा जाता है, इसलिए विमर्श ही भगवान् का प्रधानरूप है यह सिद्ध हुआ ॥ ११ ॥ केवल हम लोगों ने ही संवित्तत्त्व ज्ञान को विमर्शमय नहीं माना है अपितु हमारे साथ- साथ आगम शास्त्रों [ पातंजलन्यायादि ] ने भी माना है, इसे दिखाते हैं— इसलिए आत्मा चैतन्य है चित्तत्त्व क्रिया भी चेतन कर्तावाली होती है । इसी कारण जड से वह चेतन आत्मा एक विलक्षण पदार्थ है ॥ १२ ॥ क्योंकि आत्मा चेतन का प्रधानरूप तो विमर्श ही है इसी को हेतु मानकर आत्मा को धर्मी स्वरूप, द्रव्यरूप, चैतन्य माना जाता है, आत्मा के साथ चैतन्य का सामानाधिकरण्य रूप से उपादान किया है, शिवसूत्र में भगवान् सदाशिव ने भी 'चैतन्यमात्मा' ( १-१ ) चैतन्य को १. पूर्व-अपर कोटि में तो एक विशुद्ध शिवरूपता ही सभी के लिए रहती है इसी का श्रीसोमानन्दपाद ने भी निर्देश किया है— न परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता । यावत्समप्रज्ञानाग्र ज्ञातृस्पर्शदशास्वपि ॥ स्थितेव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले । इति । वह व्यवस्था उस परमशिवरूप अवस्था में व्यवस्थित होकर रहती है कि उसमें दूसरा कोई नहीं रहता, जैसे सभी ज्ञानों का प्रारम्भ से लेकर वैसा ही फल की परिसमाप्ति तक उसी में विश्रान्त होकर रहता है, उसकी विश्रान्ति के बिना अर्थ का बोध ही नहीं होता, अनेक प्रकार से ज्ञानों की समग्रता मध्य अवस्था में प्रत्यगात्मा के कारण ही लक्षित होती है ।

अ.-१, आ.-५, का.-१२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०३ कोपलक्षणम्, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' '……तद्दृशेः कैवल्यम्।' ( यो० सू० २-२५ ) 'द्रष्टा दृशि- मात्रः………' (यो० सू० २-२०) इत्यादौ अपि हि धर्मशब्देन सामानाधिकरण्यम् आत्मनो दर्शितं गुरुणा अनन्तेन । द्रव्यं हि तत् उच्यते—यद्विश्रान्तः पदार्थवर्गः सर्वो भाति च अर्थ्यते च अर्थ- क्रियायै, तत् यदि न कुप्यते तत् सकलोऽयं तत्त्वभूतभावभुवनसंभारः संविदि विश्रान्तः तथा भवति इति । स एव गुणकर्मादिधर्माश्रयभूतपदार्थान्तरस्वभावः तामेव मुख्यद्रव्यरूपाम् आश्रयते इति सैव द्रव्यम्, तत् अनन्तधर्मराशिविश्रमभित्तिभूतायाः तस्याः स एव धर्मः चैतन्यम् इति कर्तृकृदन्तात् उत्पन्नेन भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधायिनापि प्राधान्येन दर्शितः, तथाहि सम्बन्धस्य सम्बन्धि- विश्रान्तस्य प्रतीतेः, द्रव्यरूपस्य च सम्बन्धिनः प्रकृत्या उक्तत्वात् चितिक्रियारूपं धर्मं सम्बद्धम् अवगमयता ष्यञा निष्कृष्ट एव अंशः प्रत्यायितो भवति । चितिक्रिया च चितो कर्तृता, स्वातन्त्र्यं संयोजनवियोजनानुसंधानादिरूपम् आत्ममात्रतायामेव जडवत् अविश्रान्तत्वम् अपरिच्छिन्नप्रकाश- सारत्वम् अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् इति, तदेव अनात्मरूपात् जडात् संयोजनवियोजनादिस्वातन्त्र्य- विकलात् बैलक्षण्यादायि इति, तदेव परत्वेन प्रधानतया अभिसन्धाय, आत्मा चेतन इति वक्तव्ये धर्मान्तराधरीकरणाय विमर्शधर्मोद्धुरीकरणाय च 'आत्मा चैतन्यम्' इत्युक्तम् । चितिक्रिया चिति- आत्मतत्त्व कहा हुआ है, क्योंकि चैतन्य धर्मवाचक का उपलक्षण है, 'चितिशक्तिरपरिणामिनी' एक रूप में ही चिति-शक्ति रहती है। पातञ्जलयोग सूत्र भी ' …'तद्दृशेः कैवल्यम्'। ( २-२५ ) वही द्रष्टा का कैवल्य है और द्रष्टा ज्ञानरूप है 'द्रष्टा दृशिमात्रः……' ( २-२०) महर्षि श्री पतञ्जलि ने भी धर्म शब्द से आत्मा का सामानाधिकरण्य दिखलाया है। वही द्रव्य कहा जाता है जो सभी सिद्ध पदार्थ अर्थक्रिया करने के लिए ही भासित होता है और चाहा जाता है, यदि वह विश्रान्त नहीं होता हो तो ये जो कुछ भावपदार्थ हैं वे सम्पूर्ण जाकर उसी प्रकार संवित् ज्ञान में ही आश्रय पाते हैं। वही तत्त्वादि गुण कर्मादि का आश्रयभूत जितने अन्यपदार्थ हैं वे सभी मुख्य द्रव्यरूप संवित् ज्ञान में ही आश्रय लेते हैं, इसीलिए संवित् ही द्रव्य है, अनन्तधर्मराशि का आश्रय बनी हुई—संवित् ज्ञान का ही धर्म चैतन्य है, 'चेतनस्य भावः चैतन्यम्' चेतन शब्द कर्तारूप कृदन्त है उससे भाव अर्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय करके सम्बन्ध बताने- वाला चैतन्य बन जाता है, क्योंकि सम्बन्ध का सम्बन्धी में 'चित्क्रिया चेतनस्य' विश्रान्तिरूप से प्रतीति होती है और द्रव्यरूप सम्बन्धी चेतन की प्रकृति से कहा गया, चिति क्रियारूपधर्म चेतन में सम्बद्ध है यही 'ष्यञ्' प्रत्यय से ज्ञापित होता है और चितिक्रिया चेतन की कर्तृता है, संयोजन- वियोजन अनुसन्धानरूप स्वातन्त्र्य से रहित है, स्वातन्त्र्य कर्तृता-शक्ति से शून्य अन्य की अपेक्षा रखनेवाला जड होता है, 'यथा स्वात्मभाग-निष्ठः संयोजन-वियोजनादि स्वातन्त्र्य रहितः नैवमात्मा इत्यर्थः' अपने में सीमित मात्र रहनेवाला होने के कारण आत्मा नहीं है, आत्मा तो अनात्मरूप जड से विलक्षण होता है, चेतन को प्रधान मान करके 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा जहाँ पर बोलना चाहिए वहाँ पर धर्मान्तर नित्यत्वादि को दबा करके विमर्शरूप धर्म का उद्धार करने के लिए 'आत्मा चैतन्यम्' ऐसा कहा गया है। चेतन की क्रिया में चेतन आत्मा कर्ता रहता है इसी कारण १. इस प्रकार परम संवित् क स्वातन्त्र्य-शक्ति से युक्त होकर ही यह विधि ठीक बैठती है। इसकी बहुत सो शक्तियाँ भी उस संवित्-शक्ति से अवियुक्त होकर प्रकाश करती हैं।

१०४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१३ कर्तृता तात्पर्य्येण इति समासः अर्धयुक्त पादविश्रान्तिः इति हि काव्ये समयः, न शास्त्रे । यदि वा चित् क्रिया आत्मा उदितः, चितिकर्तृता च, इति पृथगेव । एवं तु न क्वचित् पठितम् ॥ १२ ॥ ननु यथा प्रकाशोऽप्रकाशश्च इति उभयमपि स्वात्मनि, ततश्च प्रकाश इति उक्ते जडात् न वैलक्षण्यम् उदितं स्यात्, तद्वत् विमर्शोऽपि अविमर्शोऽपि च स्वात्मनि, इति तेनापि कथं वैलक्षण्यं जड/जडयोः इत्याशङ्क्याह— चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक्स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥ १३ ॥ चेतयति इत्यत्र या चितिः चितिक्रिया तस्याः प्रत्यवमर्शः स्वात्मचमत्कारलक्षण आत्मा स्वभावः, तथाहि—घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते स्वात्मा न परामृश्यते न स्वात्मनि तेन प्रका- श्यते न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेतयत इति उच्यते । चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते, स्वात्मा परामृश्यते स्वात्मन्येव प्रकाश्यते, इवमिति यः परिच्छेद एतावद्रूपतया तद्विलक्षणोभावेन नील-पीत-सुख-दुःख-तच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन इसकी आधे पाद में ही पाद की विश्रान्ति की हुई है काव्यशास्त्र में तो यह नियम चलता भी है किन्तु आगमशास्त्रादि में ऐसा नियम नहीं है एवं ऐसा होना भी चाहिए । अथवा चित् क्रिया को ही आत्मा कहा हो और चिति का कर्तृत्व भी आत्मा में रख दिया हो यह तो कहीं पर भी नहीं पढ़ा गया है । भिन्न रूप से भी जहाँ पर पढ़ा है वहाँ पर 'आत्मा चैतन्यम्' और चिति कर्तृता इसी रूप में पढ़ा गया है ॥ १२ ॥ 'ननु' कहकर शंका करते हैं। यदि प्रकाश और अप्रकाश ये दोनों भी आत्मा में ही रहते हैं और आत्मा में रहने के कारण प्रकाश ऐसा मात्र कहने पर जड से विलक्षण कुछ भी नहीं उदित होता है, उसी प्रकार विमर्श और अविमर्श भी तो आत्मा में ही रहते हैं, तब फिर जड ओर चेतन अजड की विलक्षणता कैसे मालूम पड़ेगी । इस प्रकार आशंका कर उत्तर में कहते हैं— चिति-चेतन जो प्रत्यवमर्शरूप है—'अहम् अस्मि' यही इसका पारमार्थिक स्वरूप है । अपने ही रस में देदीप्यमान परावाणी के रूप से रहता है । उस परमात्मा का वही मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य है ॥ १३ ॥ 'चेतयति' इस क्रिया में, जो चिति (जानने अर्थ में क्रिया) है उसका परामर्श स्मरणरूप से करना यही इसका अपना चमत्काररूप स्वभाव है, क्योंकि घट अपने आपको प्रकाशित नहीं कर सकता अर्थात् अपरिच्छिन्नरूप में नहीं भासता है, इसी कारण घट स्वयं जानता है—ऐसे कोई नहीं बोलते हैं । चैत्र तो अपने में सर्वदा ज्ञानमय होने के कारण चमत्कृत ही रहता है, एवं अपने में ही प्रकाशित रहता है और सारे विश्व को अपने में किये रहता है । नील-पीत, सुख-दुःखादि से युक्त होकर रहना एवं कभी न रहना ये सारी बातें उसमें होती रहती हैं, १. यह परावाग्रूपता आद्य-शक्ति अभिन्नरूप से रहती है नित्य संवित् स्वरूप होने के कारण, आदि और अन्त अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से रहित है । दूसरे परतन्त्रभाव की अपेक्षा नहीं रखनेवाली, स्वातन्त्र्य, ऐश्वर्य से परिपूर्ण रहती है ।

अ.-१, आ.-५, का.-१३ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०५ आभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यते इति उच्यते । एवं च विमर्शः स्वात्मनि अविमर्शाऽपि स्वात्मनि इत्यसिद्धमेतत् । विमर्शी हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवं-स्वभावः । प्रत्यवमर्शश्च अन्तरभिलापात्मकशब्दन- स्वभावः, तच्च शब्दनं संकेतनिरपेक्षमेव अविच्छिन्नचमत्कारात्मकम् अन्तर्मुखशिरोनिर्देशप्रख्यम् अकारादिमायीयसांकेतिकशब्दजीवितभूतं, नीलम् इदं, चैत्रोऽहम् इत्यादिप्रत्यवमर्शान्तरभित्ति- भूतत्वात्, पूर्णत्वात् परा, वक्ति विश्वम् अपलपति प्रत्यवमर्शेन इति च वाक्, अत एव सा स्वरसेन चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव पर- इसलिए चैत्र जानता है—ऐसा बोला जाता है। इस प्रकार इदन्ता आभास के विमर्श में अपना विमर्श और अविमर्श नहीं हो सकता है—यह बात असिद्ध है। विमर्श तो सब कुछ सहनेवाला होता है इदन्ता को भी अपना बना लेता है और अपने आप को भी देहादिरूप इदन्ता कर लेता है तथा दोनों को सदाशिव भूमि में एक भी कर लेता है एवं एक किये हुए को दो भागों में विभक्त कर देता है। एक को जाग्रत् अवस्था में बढ़ा देता है एवं दूसरे को शून्य अवस्था में दबा देता है—ऐसा स्वभाववाला है। प्रत्यवमर्श उसीको कहते हैं—जो भीतर ही भीतर जानना, और उसमें किसी का संकेत भी नहीं रहता, मैं स्वयं इन नीलादिरूप का भोक्ता हूँ— यही चमत्कार रहता है बिना बोले हुए स्वीकार कर लेने के बराबर 'अ० आ० क० ख० ग०' इत्यादि सांकेतिक शब्दों का जीवन है, यह नील है, मैं चैत्र हूँ—इत्यादि सभी परामर्शों के आश्रय होने से, और पूर्ण होने से परावाणी परामर्शरूप द्वारा सारे विश्व को देखती है, इसीलिए परावाणी कही जाती है, वह अपने आपमें स्वात्मविश्रान्तिरूप चिद्रूप से निरन्तर उदित होती रहती है। 'अहं' इस परामर्शरूप में सदैव स्फुरित रहती है। यही परमात्मा का १. “पृ पालनपूरणयोः” पालन एवं पोषण अर्थ में पढ़ी गयी “पृ” धातु से 'परा' शब्द व्युत्पन्न हुआ है। २. अनस्तमिता का अर्थ है जिसका सदा उदय है। जिसका जगत् में उदय होता देखा जाता है उसका अस्त होना निश्चित है किन्तु जिसका सदा उदय है वह कभी-भी अस्त होता ही नहीं, इसलिए सदोदित कहा जाता है। 'सदोदित' सदा उगी हुई चित्ति-शक्ति है जिसमें निरन्तर क्रिया शीलता और स्पन्द रूपता रहती है। ३. कुछ लोगों का कहना यह है कि पश्यन्ती अवस्था ही मुख्य आनन्दरूप है परा अवस्था नहीं होती, क्योंकि वह तो पररूप रहने के कारण नहीं होती है, इसी को 'एवकार' शब्द से लक्षित करता है, श्री सोमानन्दपाद ने भी इस विषय में कहा है—'विमर्श अनुभव के द्वारा यह वाग्रूपता अनुगत होती है। इस प्रकार यहाँ से प्रारम्भ कर 'ऐसी भले ही चर्चा करते रहो; जैसे पश्यन्ती अवस्था ही उपयुक्त है।' 'यो हि पश्यति पश्यन्तीं स देवः परमः शिवः ।' इत्यादि तक । 'जो लोग पश्यन्ती अवस्था को ही देखते हैं, वही देव परम शिव है। इत्यादि से भगवान् का स्वरूप शब्दरूप है—ऐसा कहा गया है। इसका भट्टनारायण ने भी उल्लेख किया है— सुगिरा चित्तहारिण्या पश्यन्त्या दृश्यमानया । जयत्युल्लासितानन्दमहिमा परमेश्वरः ॥ चित्त को आकर्षित करनेवाली दृश्यमान पश्यन्तीरूप वाग्रूपता से आनन्दकन्द महिमावाले परमेश्वर का उत्कर्ष उल्लसित होता है। १४

[१०६ ] ईश्‍वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ मात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम् ऐश्वर्यम् ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षितवम् उच्यते । परापरं तु इदंभावरूपस्य प्रत्यवमर्शस्य अख्यातिप्राणस्य—उद्बोधमात्रेऽपि अहंभाव एव विश्रान्तेः श्रीसदाशिवादिभूमौ पश्यन्तीदशायाम् । अपरं तु इदंभावस्यैव निरूढौ मायागर्भाधिकृतानामेव विष्णुविरिश्चेन्द्रादीनाम्, तत्तु एषां परमेश्वरप्रसादजमेव इति । अन्यानिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः, ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं, चैतन्यं च । तस्मात् युक्तमुक्तम्—‘········तेन जडात्स हि विलक्षणः ।' इति ॥ १३ ॥ प्रधानागमे ऽपि एतत् प्रदर्शितमेव इति निरूपयति— सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥ इह घटः कस्मात् अस्ति, खपुष्पं च कस्मात् नास्ति, इति उक्ते वक्तारो भवन्ति, घटो हि मुख्य स्वातन्त्र्यरूप ऐश्वर्य एवं स्वामीपन है, जिसमें किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती है। अपने में रहना सुख-संपन्नता है और दूसरों के आधीन रहना ही दुःख-दीनता है। अपना स्वरूप नहीं भासित होना ही इदंभाव का परामर्श कहलाता है। केवल उद्बोध हो जाने पर भी सदाशिव भूमिरूप पश्यन्तीदशा में अहंभाव की विश्रान्ति हो जाती है। जब इदंभाव की अभिवृद्धि होती है तो मायागर्भ में रहनेवाले ब्रह्मा, बिष्णु आदि तथा सभी लोकपालों का प्रभाव-प्रताप तो सब का सब महेश्वर के प्रसाद से ही होता है। किसी की अपेक्षा न रखना यही परमार्थतः आनन्द ऐश्वर्य और स्वातन्त्र्य है। इसलिए युक्तियुक्त ही कहा है—'तेन जडात् स हि विलक्षणः ।' क्योंकि वह जड से विलक्षण ही है ॥ १३ ॥ [ रहस्य आगमों में तथा परमेश्वर भाषितवेदान्तादि में प्रकाश की ही प्रधानता है ] इस प्रकार समस्त आगमशास्त्रों में भी विमर्शरूप प्रकाश की ही प्रधानता मानी जाती है। इसका निरूपण करते हैं— वह देदीप्यमान महा सत्ता है जिसमें देश-काल का ‘विच्छेद' स्पर्श नहीं होता, वह परमेश्वर की सारतत्त्ववाली चिति-शक्ति को हृदय अर्थात् प्रतिष्ठा स्थान कहा गया है ॥ १४ ॥ यहाँ पर घट रहता है और आकाशकुसुम नहीं रहता है, इस बात को बोलनेवाले कहते हैं, क्योंकि घट को मैं प्रत्यक्षरूप से देखता हूँ, आकाशकुसुम तो प्रत्यक्ष स्फुरित नहीं होता है, यदि घटत्व ही स्फुरित होता है तो वह प्रत्येक व्यक्ति को स्फुरित होगा। नहीं होता है, तो किसी आनन्दघन परम स्वातन्त्र्यरूप परमेश्वर का उल्लास परम-महा पश्यन्ती अवस्थाके कारण ही उल्लसित होता रहता है। वह परावाग्रूपता ही भगवान् की शक्ति है—ऐसा दिखला दिया है। आपस में एक-दूसरे से प्रेम प्राप्त करना ही रतिक्रीडा का आनन्द उल्लास है—इस प्रकार लौकिक दृष्टान्त से भी आनन्द ही प्रकट हुआ झलकता है। १. जबकि मुनि ने कहा है—'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्' पराधीनता में ही दुःख है और अपने में रहना सुख है । २. ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रादि देव मायागर्भ के अधिकारी होने के कारण, इनमें अपना कुछ भी करने का सामर्थ्य नहीं होता।

अ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [ १०७

स्फुरति मम, न तु इतरत् इति, तत् एतत् घटत्वमेव यदि स्फुरत्त्वं स्फुरणसम्बन्धः, तत् सर्वस्य स्फुरेत् न कस्यचिद्वा, तस्मात् मम स्फुरति इति कोऽर्थः, मदीयं स्फुरणं स्पन्दनम्, एषैव च कञ्चिद्रूपता—यत् अचलमपि चलम् आभासते इति, प्रकाशस्वरूपं हि मनागपि नातिरिच्यते, अतिरिच्यते इव इति अचलमेव आभासभेदयुक्तमेव च भाति इति । तत उक्तम्— 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्वपुः । अनिरुद्धेच्छाप्रसारः प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः ॥' इति तथा— 'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् । धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रति- ष्ठितः ॥' (स्प० २२) इति । '...........स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।' (स्प० २१) इति । 'गुणादिस्पन्द- निःष्यन्दाः.............।' (स्प० १९) इति च । लोकेऽपि विविधवैचित्र्ययोगेऽपि स्वरूपात् अचलन् जनो गम्भीरः स्पन्दवान् इति उच्यते । सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति इति महती, देशकालौ नीलादिवत् सैव सृजति ताभ्यां विशेषणीया न को भी नहीं होना चाहिए, इसलिए मुझे होता है इसका क्या तात्पर्य है, मेरा ही स्फुरण उसमें लगा हुआ है और स्पन्दन का अर्थ यह है कि कुछ चलनात्मक प्रवृत्ति का होना, एवं यही किञ्चित् झलकना है जो स्वयं अचल रहता हुआ भो द्रष्टा के यहाँ स्फुरित होता है, क्योंकि प्रकाशरूप द्रष्टा से वह थोड़ा सा भी अधिक नहीं होता है, [स्वतः ] अपने आप अधिक होने के समान, वह अचल रहता हुआ ही आभास भेद से मिला हुआ ही झलकता है । इसी कारण कहा है— सभी भावों में विज्ञानरूप शरीरवाला आत्मा ही अपनी इच्छा की वृद्धि को न रोककर दृष्टि क्रिया को फैलाता हुआ विश्वरूप ही रहता है और भी सुनो— अतिक्रोधी अथवा प्रहृष्ट-प्रसन्न रहनेवाला या किंकर्तव्यविमूढ रहनेवाला या दौड़ता हुआ जिस अवस्था में स्थित रहता—वही प्रतिष्ठित स्पन्द कहलाता है । (२२) स्प० अतः जो कोई अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है, वह तो जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव-परमानन्दमय तत्त्व की अनुभूति थोड़े ही काल में प्राप्त कर लेता है ॥ २१ ॥ सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के रूप में बहनेवाले जो प्रवाह हैं वे सामान्य स्पन्द का ही आश्रय लेकर फैलता हुआ भी उस योगी के लिए प्रतिद्वन्द्वी-बाधक नहीं होता है । स्व-स्वभाव का आच्छादक नहीं हो पाता है ॥ १९ ॥ संसार में विविध प्रकार की विचित्रता के रहते हुए भी अपने स्वरूप से पदच्युत न होने- वाले पुरुष को महान् सत्ता भवन कर्तृरूप होने के कारण समस्त क्रियाओं को सम्पादन करने में सर्वतोभावेन स्वतन्त्र रखती है और वह महान् भवन कर्तृता होने के कारण आकाशकुसुमादिकों में भी व्याप्त होकर रहती है, नीलादि की तरह देश-काल का भी वही सृजन करती है देश-काल उसके विशेषण नहीं होते हैं अपितु नीलादि देश-काल के साथ सम्बन्ध रखता है, जो जिसके साथ १. सन्नेव हृदयप्रकाशो भवनक्रियाया भवति क्रिया । सैव क्रियाविमर्शः स्वस्था क्षुभिता च विश्वविस्तारः ॥ इति— भवन क्रिया का कर्ता विद्यमानरूप में हृदय प्रकाश ही होता है । वही क्रियाविमर्श अपने में स्थित होता हुआ क्षुभित होकर विश्व भर में विस्तीर्ण हो जाता है ।

१०८] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-५, का.-१४ भवति, यत् किल येन तुल्यकक्ष्यतया भाति तत् तस्य विशेषणं—कटक इव चैत्रस्य । न च देश- कालौ विमर्शेन तुल्यकक्ष्यौ भातः—तयोः इदन्तया तस्य च अहन्तया प्रकाशे तुल्यकक्ष्यत्वानुपपत्तेः । एवं देशकालास्पर्शात् विभुत्वं नित्यत्वं च—सकैलदेशकालस्पर्शोऽपि तन्निर्माणयोगात् इति, ततोऽपि व्यापकत्वनित्यत्वे । तदुक्तम्—'महासत्ता महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ।' इति । सारम् इति यत् अतुच्छं रूपं तत् इयमेव विमर्शशक्तिः, ग्राह्यग्राहकाणां यत् प्रकाशात्मकं रूपं तस्यापि अप्रकाशवै- लक्षण्याक्षेपिका इयमेव इति, श्रीसारशास्त्रेऽपि निरूपितम्—'यत्सारमस्य जगतः सा शक्तिर्मालिनी परा ।' इति । सैषा, इति शक्तिप्रत्यभिज्ञानं दर्शितम् । हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनं, तस्यापि प्रकाशात्मकत्वं, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे बराबर भासता है वही उसका विशेषण होता है जैसे—चैत्र का कुण्डल अर्थात् कुण्डलवाला चैत्र है और विमर्श के साथ देश-काल बराबर रहकर भासित नहीं होते, देश और काल इन दोनों का इदन्ता के साथ सम्बन्ध रहता है और उसकी अहन्तरूप से प्रकाश तुल्यकक्षत्व नहीं बैठता; इस प्रकार देश-काल के स्पर्श से विभुत्व और नित्यत्व सिद्ध होता है—उसी तरह सकल देश- काल से स्पर्श भी हो सकता है, उसमें भी देश-काल के निर्माण का योग होने से; इसी से भी नित्यत्व और व्यापकत्व सिद्ध हो जाता है, इस विषय में कहा गया है—महासत्ता और महादेवी के रूप में यह सारा का सारा जड-चेतन विचित्र ढङ्ग से भासित होता है उसी का यह सारतत्त्व है—ऐसा कहा जाता है। वही वस्तु सारतत्त्ववाली होती है जो अतुच्छ अविनाशी हो और उसी को विमर्श-शक्ति कहा जाता है । जो ग्राह्य और ग्राहक के प्रकाशात्मक रूप हैं उनकी भी अप्रकाश रूप में विलक्षणता ले आनेवाली यही शक्ति है, श्रीसारतन्त्र में इसका निरूपण किया है—'इस संसार का जो सारतत्त्व है वह परम मालिनी-शक्ति है।' वही, यह शक्ति प्रत्यभिज्ञान को बताती है और उसोका नाम हृदय है जिसको प्रतिष्ठानरूप से कहा जाता है और वह स्थान "तथाहि जडभूतानाम्" कहे हुए नियम से जड एवं चेतन का है, उसकी भी प्रकाशात्मकता है, उसकी भी १. जो जिसके साथ जीता है वही उसका व्यवच्छेदक होता है । २. दिक्कालादिलक्षणेन व्यापकत्वं विहन्यते । अवश्यं व्यापको यो हि सर्वदिक्षु स वर्तते ॥ इति शिवदृष्टौ— दिशा-कालादिको लेकर उसका व्यापकत्व बन नहीं पाता है, विशेषण के लग जाने से परि- च्छिन्न बन जाता है जो सर्वत्र सभी दिशाओं और कालादि में समानरूप से व्यापक रहता है वही व्यापक है अर्थात् देश-कालादि से अनवच्छिन्न स्वभाववाला ही व्यापक माना जाता है । ३. इसका विवेचन अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार में किया है— अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद्विचित्ररचना मकुरान्तराले । बोधः परं निजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मकुरस्तथा तु ॥ जैसे दर्पण तल पर पदार्थ चित्र-विचित्र ढंग से भासित होते हैं, वैसे ही परम संविद्रूप में यह सारा का सारा संसार आभासित है । परम संविद्रूप को विमर्श-शक्ति के सामर्थ्य द्वारा उसका बोध रहता है किन्तु दर्पण को उसी प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का बोध नहीं रहता । ४. 'सैषा' क्योंकि तद् और एतद् ये दोनों शब्द परोक्ष और अपरोक्ष के वाचक होकर प्रत्यभिज्ञा सूचित करते हैं ।

अ.-१, आ.-५, का.-१४] विमर्शिनीटीकोपेता [१०९ तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं तत्र तत्र अभिधीयते। सर्वस्य हि मन्त्र एव हृदयम्, मन्त्रश्च विमर्शनात्मा, विमर्शनं च परावाक्शक्तिमयम् । तत एवोक्तम्—'न तैर्विना भवेच्छब्दो नार्थो नापि चितेर्गतिः ।' इति । 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावम्.........।' इत्यादि च, विमर्श-शक्ति विश्व के परमपद में विश्रान्ति स्थानरूप है और यही विमर्शरूप स्वतन्त्रात्मक है उसे ही तत्-तत् स्थलों में कहा गया है। क्योंकि सब का मन्त्र ही प्रतिष्ठा-स्थान माना जाता है, एवं मन्त्र ही विमर्शात्मा है और विमर्श-शक्ति हो परावाणीरूपी शक्ति से युक्त है। इसी कारण कहा गया है— उन मन्त्रों के बिना न तो शब्द और अर्थविषयक ज्ञान ही होगा तथा चिति की गति का होना भी असम्भव ही है। अकार से लेकर क्षकार पर्यन्त जितने भी वर्ण हैं उन्हें 'शब्दराशि' से पुकारा जाता है। शास्त्रों में इसको मातृका कहा जाता है। सारी की सारी भेदवाली वाचक-वाच्यरूप स्थूल शब्द- राशि को अपने भीतर अभेदरूप में धारण करनेवाली परा-शक्ति ही मातृका-शक्ति है जैसा कि 'सा हि भगवती अशेषवाच्य-वाचकात्मकजगद्भेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.........।' [ स्व० तन्त्र० ] 'स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा।' इसकी पूर्णता अहन्तारूप स्वातन्त्र्य-शक्ति से भिन्न और कुछ भी नहीं है। अपनी स्वतन्त्र सत्ता के बल से ही यह अपने आप अकार से लेकर क्षकार तक के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह के रूप में फैलकर बहुत प्रकार के वाच्यों और वाचकों से विश्व को आभासित कर लेती है यह सारा विश्व प्रमाता के रूप में ही इस से सिद्ध होता है। किन्तु इसकी पहचान ज्ञानी-सिद्धजनों के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं होती। इसलिए कहा है कि 'अज्ञाता माता मातृका विश्व जननी।' जिसको जानकारी न होने से माता ही 'मातृका' कही जाती है। इसका दूसरा अर्थ भी करते हैं—'एतदेव च ब्राह्मादि- मातृणां मातृत्वं तत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न जननी वाचकः' । इसी दर्शन में दिखाया गया है कि 'अ' से लेकर 'क्ष' तक की शब्दराशि चिद्रूप का ही बाहर में फैलाव है। भेद-दृष्टि में परिणत हो जाने पर यह शब्दराशि आठ भागों में विभक्त हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का परिवार भी पशु भूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चिच्छक्ति को चारों ओर से घेर लेती है जिससे कि पशु-जीवों को इसका बोध नहीं हो पाता है इसलिए आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं। प्रकाशरूप शिव और विमर्श-शक्ति इन दोनों की एक रसता ही सारे विश्व की आधारता है। 'अहं विमर्श' ही इसका स्वरूप है, जो कि वह महामन्त्र रूप है 'अ' अनुत्तर-तत्त्व एवं 'ह' अनाहत-शक्ति तत्त्व की प्रत्याहारदशा ही 'अहन्ता' है। सारी शब्दराशि उसके भीतर 'मयूर के अण्डरस' न्याय से अभेदपूर्वक रहती है। परावाणी भी कुछ लोग इसको कहते हैं। १. ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ (गी० १४-२७) हे अर्जुन ! उस अविनाशी पूर्ण ब्रह्म का और अमृत अमरणधर्म का एवं नित्यधर्म का और अखण्ड आनन्द का मैं ही एकमात्र आश्रय हूँ अर्थात् ये सबके सब मेरे ही ऐश्वर्य हैं। इसलिए इन सब का मैं परम आश्रय हूँ।

११० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१४ इत्यागमेषु। तत्रभवद्भर्तृहरिणापि— ‘न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन गम्यते ॥ वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवोधस्य शाश्वती । न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी ॥’ इति ‘सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । यदुत्क्रान्तौ विसंज्ञोऽयं दृश्यते काष्ठकुड्यवत् ॥’ स्थूल वाच्य-वाचकमय विश्व को विस्फुरित करने के लिए यह इच्छा-शक्ति बन जाती है । पश्चात् ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति के रूपों में अङ्कुरित हो जाती है, फिर मायापदवी पर आरूढ होकर विचित्र रूपों में प्रसृत हो जाती है। बाहर की ओर फैलनेवाली प्रक्रिया में यह मातृका शक्ति दो, नव और पचास रूपों में बँट जाती है। बीज और योनि के रूप से दो भेद हो जाते हैं स्वर समूह का नाम तो बीज है और व्यञ्जन समूह का नाम योनि है। १. अवर्ग 'अ' से अः पर्यन्त 'अमा', २. कवर्ग से 'कामा', ३. चवर्ग से 'चार्षङ्गी', ४. टवर्ग से 'टङ्कधारिणी', ५. तवर्ग से 'तारा', ६. पवर्ग से पार्वती', ७. यवर्ग से 'यक्षिणी', ८. शवर्ग से 'शारिका', ९. क्षवर्ग अनूत्तर और अनाहत के संघ को विस्तृत करनेवाली कूटबीज है। इस प्रकार इसका नव भेद हुए। शब्द समूह के प्रत्येक वर्ण-अक्षर को भिन्न-भिन्न शक्तिवाला है—ऐसा मानकर सोलह स्वरों एवं चौंतीस व्यञ्जनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की जाती है। इत्यादि, आगमों में उल्लेख मिलता है। श्रीभर्तृहरि ने भी अपनी 'वाक्यपदीयम्' में उल्लेख किया है— प्रत्यय अथवा ज्ञान दो प्रकार का होता है। हमारा वाग् व्यवहार जागृत् दशा का तो शब्दभावना से हो जाता है। भावना का साथ न होने पर अनुभूति में आनेवाले अनेकतथ्य हैं, जिन्हें शब्द से व्यक्त नहीं करते हैं, यद्यपि उन्हीं के साथ अनुभूत अन्य सत्यों को हम शब्द के द्वारा अभिव्यक्त भी करते हैं। सुप्तकाल में भी हम सत्यों अथवा स्वप्नों का अनुभव किये रहते हैं। शब्दों के साथ उनका वर्णन इसलिए नहीं करते हैं कि सूक्ष्मरूप से शब्दभावना के बीज उस काल में ग्रहण हो गये रहते हैं। तामसी अवस्था में पड़े रहने के कारण तमोरूपा दशा ही उसे कहना पड़ता है। किंतु जागृति दशा और सुषुप्ति दशा का जो ज्ञान है वह शब्द भावना के बिना कभी भी स्थिर नहीं हो सकेगा और न तो उसके स्वरूप का ही ठीक-ठीक बोध हो पायेगा। वाक् या शब्द से ही समस्त व्यवहार का बोध होता है और वही आत्माभिव्यक्ति एवं स्मृति अवस्था में भी कारण रहता है। ज्ञान की समस्त आभास शब्द या वाक् के रूप में ही अवस्थिति रहती है। उसीके माध्यम से सब प्रकार का विचार-विमर्श हो सकता है वह फिर किसी भी रूप में रहे, व्यक्त अथवा अव्यक्त । वाक् के न रहने पर तो प्रकाश ही प्रकाशित न हो पायेगा; क्योंकि समस्त व्यवहार ठप हो जायेगा। सा सर्वविद्याशिल्पनां कलां चोपबंधनी । तद्भादादभिनिष्पन्नं सर्वं वस्तु विभज्यते ॥ व्यावहारिक जगत् की समस्त वस्तुओं से वाक्-शब्द का सम्बन्ध निहित रहता है जैसा कि सभी को विद्या, शिल्प और कला आदि से सम्बन्ध प्रतिदिन रहता देखा भी जाता है, इसके द्वारा ही प्रत्येक निर्मित की गयी वस्तु के विषय में प्रयोज्य-प्रयोजक आदि की कल्पना भी की

अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १११ इत्यादि च । तत् एतेन विदुः इत्येतत् निर्वाहितम् । बौद्धैरपि अध्यवसायापेक्षं प्रकाशस्य प्रामाण्यं वदद्भिः उपगतप्राय एव अयम् अर्थः—अभिलापात्मकत्वात् अध्यवसायस्य इति ॥ १४ ॥ ननु असंख्यशक्तिश्रेणीशोभितवपुषि परमशिवे विमर्शशक्तिरेव इयम् इत्थंकारम् अभिषिच्यते कस्मात् ?, इत्याशङ्क्याह— आत्मानमत एवायं ज्ञेयीकुर्यात्पृथक्स्थिति । ज्ञेयं न तु तदौन्मुख्यात्खण्ड्येतास्य स्वतन्त्रता ॥ १५ ॥ स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः । प्रभुरीशादिसंकल्पैर्निर्माय व्यवहारयेत् ॥ १६ ॥ सर्वाः शक्तीः कर्तृत्वशक्तिः ऐश्वर्यात्मा समाक्षिपति । सा च विमर्शरूपा इति युक्तम् अस्या एव प्राधान्यम् इति तात्पर्येण उत्तरमुक्तम् । शब्दार्थस्तु अयं—प्रकाशात्मा परमेश्वरः स्वात्मानं ज्ञात्रेकरूपत्वात् अज्ञेयमपि ज्ञेयीकरोति इति यत् सम्भाव्यते—कारणान्तरस्य अनुपपत्तेः दर्शितत्वात् जाती है । इस प्रकार आगे भी कहते हैं कि— समस्त विद्याकलादि से सम्बन्धित रहनेवाली ही यह देखी जाती है एवं यह संसारी जीवों की चेतनता के समान है। बाह्य जगत् में तो देहधारियों का व्यवहार इसके बिना होना असम्भव सा है, अपने अन्तर में रहनेवाले का भी सहारा किसी न किसी रूप से इस से होता ही है। जैसे चेतन के न रहने पर प्राणी 'विसंज्ञ' ही हो जाता है वैसे वाक्, या शब्द के बिना भी उसकी स्थिति अचेतन के समान ही हो जाती है। वृक्ष-पाषाणादि को वाग्रूपता की आवश्यकता नहीं होती है। वाग्रूपता से ग्रहण किया हुआ चैतन्य ही सब प्रकार की सब सार्थक प्रवृत्तियों को प्रवृत्त करता है। यदि यह न रहे, तो प्राणी काठ को तरह निर्जीव ही रह जायेंगे । 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुः' अवभास के स्वभाव को विमर्श कहते हैं यह बात भी यहाँ पर आ गयी । अध्यवसाय को अपेक्षा रखनेवाले प्रकाश को विश्रान्ति होती है—ऐसा कहनेवाले बौद्धलोग भी प्रायः इसे स्वीकार करते हैं जो कि अध्यवसाय का अभिलाप स्वरूप है ॥ १४ ॥ 'ननु' कहकर अब शंका करते हैं कि असंख्य-शक्ति-सम्पन्न शिव में विमर्श-शक्ति ही क्यों इतना महत्त्व पाती है ? इस आशंका का उत्तर देते हैं— इसी कारण अपने आपको ही यह परमेश्वर अलग करके ज्ञेयरूप बना देता है । नहीं तो, उसकी ओर उन्मुख रहने से शिव की जो स्वतन्त्रता है वह खण्डित हो जाती ॥ १५ ॥ अद्वैतरूप अपनी स्वतन्त्रता से युक्त होकर अपने आप की ईशादि संकल्पों से निर्मित करके प्रभु व्यवहार कराता है ॥ १६ ॥ सारी शक्तियाँ कर्ता की ही शक्ति हैं ऐश्वर्यरूप में वही विमर्श हैं—यह कहना चाहिए । उसकी प्रधानता भी है, इसी तात्पर्य से ये सारी की सारी बातें कही गयी हैं। अब शब्दार्थ बताते हैं—यह प्रकाशरूप परमेश्वर अपने आपको ज्ञाता होने के कारण अज्ञेय होता हुआ भी ज्ञेय कर देता है इसकी जो सम्भावना है—इसमें दूसरा कोई कारण न मिलने से दृढ सम्भावना को

११२] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ दृढेन सम्भावनानुमानेन, तत एव विमर्शशक्तिलक्षणात् कर्तृत्वात् हेतोः भवति, यतो हि अयम् आत्मानं परामृशति ततो विश्वनिर्भरत्वात् तथा नीलादित्वेन चकास्ति । ननु एषैव कुतः सम्भा- वना आत्मानं ज्ञेयीकरोति ?, इति आह पृथक् प्रकाशात् बहिर्भूता स्थितिः यस्य तादृक् ज्ञेयं नैव भवति । तुः अवधारणे । तत्र च उक्ता युक्तयः । अभ्युच्चययुक्तिमपि आह-यदि व्यतिरिक्तं ज्ञेयं स्यात् तत् ज्ञातृरूपस्य आत्मनो यत् एतत् ज्ञेयविषयम् औन्मुख्यं स्वसंवेदनसिद्धं दृश्यते तत् न अस्य स्यात्, तेन व्यतिरिक्तविषयौन्मुख्येन अन्याधीनत्वं नाम पारतन्त्र्यम् अस्य आनीयते । पारतन्त्र्यं च स्वातन्त्र्यस्य विरुद्धम् । स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वलक्षणम् आत्मनः स्वरूपम्, इति व्यतिरिक्तोन्मुख आत्मा अनात्मैव स्यात् । अनात्मा च जडो ज्ञेयं प्रति न उन्मुखीभवति इति प्रसङ्गः । ततः प्रसङ्गविपर्ययात् इदमायातम्—अव्यतिरिक्तोन्मुखः स्वतन्त्रः सन् आत्मानमेव ज्ञेयीकरोति इति । न च केवलं नीलादिरूपमेव ज्ञेयं, यावत् अत्यक्तकर्तृस्वभावं स्वातन्त्र्येण अपरित्यक्तमेव सन्तम् आत्मानं निर्माय व्यवहारेण ध्यानोपासनार्चनोपदेशादिना योजयति इति यत् सम्भाव्यते तदपि अत एव इति सम्बन्धः । ननु स्वातन्त्र्ययुक्तं च निर्मायते च इति विरुद्धम् इदम् ?, तत्राह—अद्वयात्मनः संविदेकरूपस्य स्वातन्त्र्यात् हेतोः इदं न न युज्यते, यत् किल अनुमान के द्वारा दिखाया है, इसी कारण विमर्श-शक्तिरूप कर्तृत्व ही इसमें हेतु होता है, क्योंकि यह अपने आप का परामर्श करता है इसलिए परिपूर्ण होने के कारण ठीक वैसा ही नीलत्व पीतत्वादिकों के रूपों में प्रकाशित होता है । अब शङ्का होती है कि सम्भावना अपने को क्यों ज्ञेय बनाती है ?, उत्तर देते हैं—कि प्रकाश से बाहर होकर उसकी स्थिति नहीं होती है वैसा ज्ञेय पदार्थ नहीं रहता है । 'तु' शब्द निश्चित अर्थ के रूप में है । इस प्रकार वहाँ पर युक्तियों को भी कह दिया गया है । और भी अधिक युक्ति देते हैं—यदि ज्ञेय अलग रहता है तो ज्ञातृरूप आत्मा की जो यह ज्ञेयविषयक उन्मुखता है जो कि अपने संवेदन ज्ञान से सिद्ध दिखाई देती है—वह इसकी उन्मुखता नहीं है, इसी कारण कर्ता से विषय भिन्न होने से पारतन्त्र्य उसमें आ जाता है और वह परतन्त्रता तो स्वतन्त्रता से विरुद्ध स्वभाववाली होती है । इस प्रकार स्वातन्त्र्य को किसी अन्य की अपेक्षा नहीं होती जबकि यही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है भिन्न वस्तु की ओर उन्मुखता होने से आत्मा अनात्मारूप ही हो जायेगा जबकि यह अभीष्ट नहीं है । और अनात्मारूप होने के कारण जड हुआ वह ज्ञेय के प्रति उन्मुख नहीं होता । प्रसङ्ग से विपरीत होने के कारण यह सिद्ध हुआ कि—स्वयं उन्मुख स्वतन्त्र होकर अपने को ही ज्ञेय बनाता है और केवल नीलादिरूप को ही ज्ञेय नहीं बनाता है अपितु अपने को भी बनाता है, अपनी स्वतन्त्रता से कर्तृत्व स्वभाव को न छोड़ता हुआ ज्ञेयरूप में अपने को निर्माण करके ध्यान, उपासना, अर्चना और उपदेशादि से जोड़ता है यह जो सम्भव है वह भी 'अत एव का सम्बन्ध है।' अब शङ्का करते हैं कि स्वातन्त्र्य से युक्त भी है और निर्माण भी करता है यह तो परस्पर विरुद्ध दिखाई पड़ता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि अद्वैतरूप संवित् मात्र स्वातन्त्र्य हेतु से ऐसा नहीं हो सकता है, यह बात नहीं है अपितु सम्भव हो सकता है, मायामय जगत् में जो अति १. अतिदुर्घटकारित्वमस्यनुत्तरमेव यत् ।

अ.-१, आ.-५, का.-१५-१६ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११३ मायापदे अतिदुर्घटं प्रतिभाति, तत्सम्पादने यत् अप्रतिहतं स्वातन्त्र्यं तदेव पुनः स्वातन्त्र्यशब्देन दर्शितम् । अत एव इत्यनेन तु विमर्शशक्तिरूपम् इति अपुनरुक्तम् । अथ वा अत एव स्वातन्त्र्यात् इति सामानाधिकरण्येन श्लोकद्वयेन सम्बन्धनीयम् । उदाहरणम् अत्र अर्थे दर्शयति—नीलादि- निर्माणवत् अस्य स्वतन्त्ररूपनिर्माणस्य अप्रसिद्धत्वात् ईश्वरो-भगवान्-आत्मा-नित्यो-विभुः- स्वतन्त्रः इत्येवमादौ हि प्रमातुः, पूजयितुः, ध्यातुः वा पृथग्भूतं तत् प्रमेयम्, पूज्यं, ध्येयं च भाति इति तत् तावत् निर्मितम्, न च अनीश्वररूपम् । एवं हि ईश्वर इति, अनीश्वर इति संकल्प- ध्यानादेः तुल्यत्वं स्यात्, न च एवम्—फलभेदस्य उपलब्धेः इति, तस्मात् स्वातन्त्र्यशून्यता- भासनेन स्वातन्त्र्ययुक्तताभासनेन च यत् इदम् उभयं ज्ञेयम् आत्मरूपमेव परमेश्वरो भासयति तत् विमर्शशक्तिबलात् एव, इति सैव प्रधानम् इति ॥ १५-१६ ॥ ननु प्रकाशबलात् भावव्यवस्था, स च प्रकाशो विमर्शसार इति विमर्शभेदे तदेव तत् इति वक्तुं युक्तम्, ईश्वर आत्मा इत्यादिसंकल्पेषु च निर्मितस्य इदन्तया परामर्शः, स्वातन्त्र्यं तु दुर्घटता दिखाई देती है, इसे सम्पादन करने में अप्रतिहत—जो कभी नहीं रुकनेवाला स्वातन्त्र्य है उसको स्वतन्त्र शब्द से बताया है । 'अत एव' शब्द श्लोक में दिया है इससे विमर्श-शक्ति का स्वरूप दिखलाया गया है अथवा इसका दूसरा भी अर्थ करते हैं कि 'अत एव' स्वातन्त्र्य होने के कारण सामानाधिकरण्यरूप से दोनों श्लोकों के साथ सम्बन्ध करना चाहिए । [ ईशादिसंकल्पैः ] ईश्वरादि के संकल्पों द्वारा उदाहरण अर्थ में बताया जाता है—नीलादि पदार्थों में स्वतन्त्ररूप से निर्माण करने का अभाव होने से स्वयं भगवान् परमेश्वर आत्मा, नित्य, विभु स्वतन्त्र है, इस प्रकार आदि में प्रमाता का, पूजन करनेवाले का, ध्यान करनेवाले का, अलग हुआ वह प्रमेय, पूज्य और ध्येय भासता है यह सब मान लेना है वह ईश्वर का ही रूप है, अनीश्वर का नहीं है । यह ईश्वर है और यह अनीश्वर है इसके संकल्प, ध्यानादि में तो फिर एकता हो जायेगी; ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों के फलों में भेद होता है, इसलिए स्वातन्त्र्यशून्यता का आभास नीलादि में और स्वातन्त्र्य युक्तता का आभास ईश्वरादि में इन दोनों को अपने रूप में परमेश्वर ही भासित करता है और वह भासन विमर्श-शक्ति के कारण ही होता है, इसीसे विमर्श-शक्ति प्रधान है ॥ १५-१६ ॥ अब शङ्का करते हैं कि प्रकाश के सामर्थ्य से भाव-पदार्थों की व्यवस्था होती है और वह प्रकाश का विमर्श ही साररूप है, विमर्श से अभेद होने पर भासन भी विमर्श है ऐसा कहना चाहिये, ईश्वर आत्मा है इसमें जो कुछ निर्मित होगा उसका इदन्तारूप से परामर्श होगा और स्वातन्त्र्य का तो अहं परामर्शरूप से होगा, इदन्ता से निर्मित हुए का अहंतारूप एतदेव स्वतन्त्रत्वमैश्वर्यं बोधरूपता ॥ 'जो परमेश्वर की लोकोत्तर, अति दुर्घट कार्य करने की सामर्थ्य-शक्ति है इसी को स्वतन्त्रत्व, ऐश्वर्य एवं बोधरूपता कहा जाता है ।' १. श्री सोमानन्दपाद ने इसका विवेचन शिवदृष्टि शास्त्र में किया है । 'गच्छतो निस्तरङ्गस्य जलस्यातितरङ्गिताम् । आरम्भे दृष्टिमापात्य तदौन्मुख्यं हि गम्यते ॥' इति यथा— १५

११४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१७ अहंपरामर्शरूपम्, इति निर्मितस्य तद्रूपत्वाभावे कथं स्वातन्त्र्यान्मुक्तत्वम् इति ?, तत् एतत् परिहर्तुमाह— नाहन्तादिपरामर्शभेदादस्याप्यन्यतात्मनः । अहंदृश्यतयैवास्य सृष्टेस्तिङ्वाच्यकर्मवत् ॥ १७ ॥ स्वरूपे भावप्रत्ययः, आदिग्रहणात् आत्मेश्वरादिपरामर्शः, तिङ्ग्रहणं प्रत्ययोपलक्षणम्, कर्मग्रहणं क्रियावाचिसदसत्त्वभूतशक्तिरूपोपलक्षणम् । तत् अयम् अर्थः—अहम् इत्येवंरूपो यः परामर्शः, यच्च ईश्वरः प्रमाता आत्मा शिव इत्यादिः अनन्तप्रकारः परामर्शः, तस्य यद्यपि भेदोऽन्यान्यरूपता, तथापि तद्भेदात् हेतोः अस्य आत्मनो निर्मातृरूपस्य अहंपरामर्शमयस्य निर्मेयरूपस्य च ईश्वरादिपरामर्शास्पदस्य यो भेदः शङ्कितः, स न युक्तः, यत ईश्वर इत्यपि यः परामर्श में अभाव रहने पर कैसे वह स्वातन्त्र्य से युक्त हुआ ? इस शङ्का को दूर करने के लिए अब कहते हैं— अहन्ता और इदन्तादि परामर्श के भेद से इस आत्मा में भेद नहीं होता है। जैसे अहं परामर्श से ही सृष्टि में 'तिङ्' वाच्य का कर्म होता है ॥ १७ ॥ अहं इस अभिन्न प्रकाशरूप अव्यय में भाव प्रत्यय 'तल्' करके अहन्तारूप बनता है वही प्रकाश का अपना निजी लक्षण है, 'आदि' शब्द जो श्लोक में लिया गया है इससे आत्मा ईश्वरादि का परामर्श ग्रहण करना चाहिए, 'तिङ्' शब्द प्रत्यय का उपलक्षण करता है, कर्म के ग्रहण से क्रियावाची सद्रूप और असद्रूप शक्ति का उपलक्षण है। सब का सारांश यह है कि अहं ऐसा जो परामर्श है और जो ईश्वर प्रमाता है एवं आत्मा शिव है इत्यादि अनन्त प्रकार के जितने भी परामर्श हैं और उन अनन्त परामर्श के जितने भी भिन्न-भिन्नरूपों में भेद प्रतीत होते हैं, इन परामर्शों में भेद हेतु से अहंपरामर्शमय निर्माता की अपेक्षा से निर्मेयरूप ईश्वरादि परामर्श के आश्रयभूत परामर्श के जिस भेद की शङ्का की है—वह ठीक नहीं है, क्योंकि मैं 'बोधस्य स्वात्मनिष्ठस्य रचनां प्रति निर्वृत्तिः । तदास्थाप्रविकासो यस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते ॥' इति । तथा लोकव्यवहारोऽपि । 'गोस्तनात्पातः क्षीरे विकासस्तत एव हि । न च न क्षीरमित्येष व्यपदेशोऽस्ति तत्क्षणम् ॥' [ अहं परामर्श ही स्वातन्त्र्य है इदंभाव का परामर्श निर्मित रचना है। निर्मित परामर्श का तो अहं परामर्श में अभाव रहने के कारण परम स्वातन्त्र्य 'इदं' परामर्श कैसे बनेगा ? इसके समाधानमें उत्तर यह है ] कि अकुत्सित [ गर्हितता से रहित ] विषय को हो उन्मुखता मानी है उसे दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं। जैसे निस्तरंग जल का अतितरंग में परिणत हो जाने पर जलगत तरंग में सर्वप्रथम सूक्ष्म कल्पना उठती है वही उन्मुखता है, और हाथ की मुट्ठी बाँधने से पूर्व सुसूक्ष्म खिंचाव-नसोंका देखा जाता है उसी प्रकार अपने स्वरूप में स्थित बोधरूप की विश्व रचना के लिए जो सर्व प्रथम विकास प्रवृत्ति का प्रारम्भ होना, वही उन्मुखता कही जाती है । गौ के स्तन से निकला हुआ दूध विकार को ही प्राप्त हो जाता है और उस समय यह दुग्ध है—ऐसा क्या बोध नहीं होता है ? जब परामर्श ऐक्य होता है तब सर्वदा ऐक्य हो ही जाता है।

अ.-१, आ.-५, का-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११५ परामर्शः, स ईशनशीले ज्ञातृत्वकर्तृत्वतत्त्वे विश्राम्यति, ज्ञातृत्वादि च ज्ञानादौ, स्वातन्त्र्यम् अनन्यमुखप्रेक्षित्त्वम् अविच्छिन्नज्ञानादिशक्तियोगः, अविच्छेदश्च जानामि करोमि इति अस्मदर्थ- विश्रान्तिः इति । अस्य ईश्वरस्य आत्मनः सृष्टेः सृज्यमानस्य अहंविमर्शनोयत्वमेव । सृष्टेः इति वा हेतौ पञ्चमी । अस्य ईश्वरस्य यतः ईश्वरादिसंकल्पेषु अपि अहंपरामर्शनयोग्यस्यैव सृष्टिः । अर्हे कृत्यः । यथा क्रियाकारकसमुच्चयविकल्पादिशक्तयो यथास्वं तिङ् तृतीयादि च वादिप्रयोगा- वसेयपरामर्शपरमार्थः पाकः कर्ता समुच्चयो विकल्पः इत्यादिशब्दैः अभिधीयमानाः सत्त्वभावम् आपादिता अपि, पचति चैत्रेण च वा इत्येवंभूते मूलपरामर्शे विश्राम्यन्ति । अन्यथा तु ताः प्रतीता नैव भवेयुः । तद्वत् अत्रापि । एतदुक्तं भवति—परामर्शो नाम विश्रान्तिस्थानम्, पार्यन्तिकमेव तच्च पारमार्थिकम्, अह- मित्येवंरूपमेव । मध्यविश्रान्तिपदं तु यत् वृक्षमूलस्थानीयं ग्रामगमने तदपेक्षया सृष्टत्वम् उच्यते,— अनेन नीलादेः अपि, इदं नीलम् इति मध्यपरामर्शोऽपि मूलपरामर्शे अहमित्येव विश्रान्तेः आत्म- इति को विरोधः । मयत्वम् उपपादितम् एव । नीलम् इदम् अहं वेद्मि इति, अहं प्रकाशे इति हि इयत्तत्त्वम् । यथोक्तम् ‘इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढस्तु नीलादिविमर्शात् एव अर्थक्रियादिपरितोषा- भि मानी, इति नीलादेः स्वातन्त्र्यनिर्मुक्तत्वम् उक्तम् । आत्मादौ तु तन्मूलपरामर्शविश्रान्तिमन्तरेण ईश्वर हूँ यह परामर्श भी सामर्थ्यशाली ज्ञातृत्व-कर्तृत्व में विश्रान्ति लेता है, और ज्ञातृत्वादि परामर्श ज्ञान में विश्रान्त होता है, स्वातन्त्र्यरूप किसी की भी अपेक्षा न रखनेवाला होता है जिसका अविच्छिन्न ज्ञानादि शक्तियों से सम्बन्ध है, और अविच्छेद 'जानाति'—'करोमि'रूप 'अस्मत्' शब्द के अर्थ में ही विश्रान्त होता है । इस विश्वरूप अपने आत्मा की सृष्टि में सृज्यमानरूप पदार्थों की अहन्ता शब्द से ही विमर्शन के योग्य है । सृष्टि करने के कारण हेतु में पञ्चमी विभक्ति है । क्योंकि इस ईश्वर की ईश्वरादि संकल्पों में भी जबकि अहंपरामर्श के योग्य ही सृष्टि होती है । 'मृष्यतया' इसमें अहन्-योग्यता अर्थ में कृत्यप्रत्यय हुआ है । क्रिया कारक समुच्चय विकल्प शक्तियाँ यथाक्रम तिङ् और तृतीयादि विभक्ति वादी के प्रयोग से जानने योग्य सिद्ध परामर्श [सत्त्वभूत] पाक हो रहा है और कोई कर्ता कर रहा है जो विकल्प शब्दों से कहे गये सत्त्वभाव को कहनेवाला पचाता है अथवा चैत्र से पचाया जाता है इत्यादि मूल परामर्श में विश्रान्त होते हैं । अन्यथा वे शक्तियाँ प्रतीत ही नहीं होंगी । उसी प्रकार यहाँ पर भी है । इससे यह कहा जाता है कि परामर्श को ही विश्रान्ति का स्थान माना जाता है और वह अन्तिम पारमार्थिक तत्त्व है तथा उसका स्वरूप अहम् है । मध्य में विश्राम लेनेवाला जोकि गाँव को जाते समय वृक्ष के मूल स्थान में बैठना-उठना इत्यादि प्रमाता की अपेक्षा से ही बनाया गया कहा जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं होगा । इससे नीलादि परामर्श में भी अहन्तारूप मूल परामर्श में ही विश्रान्त है, इसी कारण आत्ममयत्व कहा है । मैं इसको नील के रूप में जानता हूँ, मैं प्रकाशित होता हूँ यही तो सारतत्त्व है । जिसके लिए कारिका में कहा है—'इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढ प्राणी तो नीलादि के विमर्श से ही अर्थक्रियादि परामर्श से संतुष्ट होकर उसका अभिमानी हो जाता है । इसलिए नीलादि को स्वतन्त्रता में सर्वथा भिन्न ही माना गया है । आत्मा आदि के मूल परामर्श में तो बिना विश्रान्त हुए प्रतीति की परिसमाप्ति मानते हैं और अर्थक्रिया को

११६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१८ प्रतीतिपरिसमाप्तिम् अर्थक्रियां च मूढोऽपि न अभिमन्यत इति तस्य निर्मितौ अपि अनुज्झितस्वा- तन्त्र्यम् उक्तम् ॥ १७ ॥ ननु एवं विश्वपरामर्शानाम् अहम् इत्येव विशुद्धैकपरामर्शविश्रान्तिरेव तत्त्वम् तत् कथम् इदम् उच्यते—ज्ञानस्मृत्यादिका अस्य शक्तय इति, ज्ञानस्य च निर्णयसंशयभेदा नीलादीनां च वैचित्र्यम् ? इति आशङ्कायां परिहारमाह— मायाशक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा । कथिता ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥ १८ ॥ अनुपपन्नम् अवभासनं माया इति उच्यते, ततश्च भिन्नं प्रकाशात् सर्वम् अवभासजातं माया, तत्र च चित्तत्त्वस्यैव स्वातन्त्र्यं मायाशक्तिः, तया भिन्नं यत् संवेद्यं प्रमातृश्च अन्योन्यतश्च, मायाशक्त्या भिन्नेन प्रमातुः अन्योन्यतो वेद्याच्च करणवर्गेण यत् संवेद्यं स एव गोचरो— विश्रान्तिपदं यस्याः तादृशी सती सैव प्रत्यवमर्शात्मा चितिः परावाग्रूपा, ज्ञानम् इति, संकल्प इति, अध्यवसाय इति च उच्यते, आदिग्रहणात् संशयः स्मृतिः इत्यादि । तथाहि—यत् इन्द्रियेण स्फुटग्राहिणा बाह्येन विषयेण स्फुटेन च नियन्त्रितं संवित्तत्त्वं यत् ज्ञानम् । मनसा विषयेण च अस्फुटेन संकल्पः । बुद्ध्या विषयेण च विषयत्वपर्यन्तभाजा अध्यवसायो निश्चयः । मूढ लोग भी नहीं मानते, इसलिए उसके निर्माण में भी स्वातन्त्र्य को नहीं छोड़ता हुआ कहा गया है ॥ १७ ॥ अब शङ्का करते हैं कि विश्व के समस्त परामर्शों का 'अहम्' इस विशुद्ध परामर्श मात्र में ही विश्रान्ति है तो फिर यह कैसे कहते हैं कि इसकी ज्ञानस्मृत्यादि शक्तियाँ हैं तथा ज्ञान के निर्णय और संशय भेद हैं एवं नीलादि पदार्थों में चित्र-वैचित्र्य रहता है ? यह नहीं बन सकता है इस आशंका का परिहार करते हैं— विभु परमेश्वर की माया-शक्ति से विमर्श-शक्ति ही भिन्न-भिन्न संवेद्य के विषय करनेवाली, ज्ञान-संकल्प-अध्यवसायादि नामों से कही गयी है ॥ १८ ॥ जो अवभास ठीक न बैठ सकें उसी को तो माया कहा जाता है, इसलिए प्रकाश से भिन्न सभी अवभास समूह माया है और चिदात्मा की स्वतन्त्रता ही माया-शक्ति है, उस माया-शक्ति से भिन्न जो संवेद्य है और प्रमाता के अन्योऽन्य सम्पर्क से और माया-शक्ति से प्रमाता के भिन्न होने से परस्पर वेद्य से भी और करण-वर्ग से जो ज्ञेय होता है वही उसका विषय है—उस संवेद्य में जिसकी विश्रान्ति होती है वैसी ही परामर्शात्मा चिति-शक्ति है वही परावाणी, ज्ञान, अध्यवसाय और संकल्पादि से कही जाती है। आदि ग्रहण से संशय, स्मृति से भी कही जाती है। क्योंकि बाह्य-इन्द्रियों द्वारा स्पष्टरूप से विषय का बोध होना ही ज्ञान है और मन द्वारा विषय का अस्फुटरूप से बोध होना संकल्प कहलाता है। बुद्धि से विषय का दृढरूप से निश्चय ही अध्यव- १. परमेश्वर विभु ही प्रमाता हैं वे परमेश्वर ही तो माया-शक्ति से संकुचित होकर ग्राहक जैसे हो जाते हैं। उसी प्रकार विमर्श-शक्ति भी माया-शक्ति के द्वारा वेद्य विषय के उपराग से संकुचित हो जाने पर ज्ञान-स्मरण संकल्पादि रूपों में परिणत हो जाती है। वस्तुतः विमर्श-शक्ति से भिन्न दूसरा कुछ भी ज्ञानादि नहीं है।

अ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [११७ विषयस्य च यत् भिन्नत्वं बहिरन्तःकरणानां च तत्प्रकाशाभेदात् अनुपपन्नं चित्तत्त्वेन आभास्यते, इति भेदे यतो विश्रान्तिः, न तु भेदस्य अभेदे ईश्वरसदाशिवादिवत्, ततो ज्ञानसंकल्पादयो भिन्नाः तस्य अप्रध्वस्तस्वस्वभावाभेदस्य संवित्तत्त्वस्य अनुसंधातुः शक्तय इति उक्ताः, संशया- दयश्च भिन्ना नीलादिवैचित्र्यं च इति सर्वम् अखण्डितम् ॥ १८ ॥ ननु प्रत्यवमर्शात्मकत्वं चितिशक्तेः संकल्पस्मरणादिशक्तिषु सविकल्पात्मिकासु भवतु । या तु निर्विकल्परूपा साक्षात्कारणलक्षणा अनुभवशक्तिः, तत्र कथम् । प्रत्यवमर्शो हि अभिलापभेद- योजनामयः, अभिलापविशेषयोजना च संकेतस्मरणम् अपेक्षते । तच्च संस्कारप्रबोधम् । सोऽपि तादृशदृशम्, इति एवं प्रथमसमये कथम् अभिलापयोगः ?, इति परस्य व्यामोहम् अपोह- यितुमाह— साक्षात्कारक्षणेऽप्यस्ति विमर्शः कथमन्थथा । धावनाद्युपपद्येत प्रतिसन्धानवर्जितम् ॥ १९ ॥ साय है। अन्तःकरणों में उस प्रकाश से अभिन्नता होने के कारण भेद नहीं बैठता, इसी कारण भेद का अभेद में जैसे—ईश्वर का सदाशिव में होता है, इसलिए ज्ञान संकल्पादि भिन्न होते हैं, नहीं विनष्ट हुए प्राण पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव में संवित्तत्त्व का अनुसन्धान करनेवाले की शक्तियाँ कही गयी हैं, इसलिए संशय, स्मृति, विकल्पादि और नीलादि भिन्न-भिन्न रूपों में रहने- वाले वैचित्र्य भाव सब के सब परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहते हैं ॥ १८ ॥ अब प्रश्न उठता है कि जो प्रत्यवमर्शात्मकत्व चिदात्मा की शक्ति है वह संकल्प-स्मरणादि के सविकल्पों में भले ही रहे, किन्तु निर्विकल्परूप जो साक्षात्कार करनेवाली अनुभव-शक्ति है उसमें प्रत्यवमर्शात्मकत्व किस तरह से है। क्योंकि प्रत्यवमर्श अभिलाप के भेद की योजना से युक्त होता है अभिलाप विशेष की योजना संकेत स्मरण की अपेक्षा रखती है और वह संकेत स्मरण संस्कार के जगने पर होता है। वह भी वैसी दृष्टि होने पर होता है, इस प्रकार साक्षात्कार के समय में कैसे अभिलाप का योग बैठ सकता है ? यह जो दूसरों को मोह-भ्रम हो रहा है उसे दूर करने के लिए कहते हैं— साक्षात्कार के समय में भी विमर्श रहता ही है, नहीं तो, प्रतिसन्धान से रहित धावन- वाचनादि क्रिया में कैसे परामर्श होता ॥ १९ ॥ १. अशुद्ध प्रमाता । २. पशु, जीव, प्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टकरूप पाश में बद्ध जाने के कारण सीमितरूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही इच्छा करता है। जानता है और करता है पतिप्रमाता असीमितरूप में सब कुछ एक साथ ही इच्छा करता है, जानता है और करता है फिर भी पशुप्रमाता की परमात्मा में ही क्रिया शीलता अवस्थित रहती है। पशुप्रमाता की अवस्थिति अपने सीमित स्वरूप में ही है । चिति- सत्ता पर ही दोनों रूपों में होनेवाली क्रिया शीलता आधार रखती है । ३. प्रत्यक्ष ज्ञान में भी द्रष्टा को दृश्य का सूक्ष्मरूप में प्रत्यवमर्श होता है, वाचन, धावन इत्यादि में शीघ्र क्रिया के द्वारा उन-उन दृश्यमान् को ग्रहण करने की इच्छा और छोड़ने की इच्छा अनुसंधान से ही होगी ।

११८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ इह तावत् चैतन्यस्य आत्मभूतोऽङ्गुलिनिर्देशादिप्रख्योऽभिलापयोगः, अन्यथा बालस्य प्रथमं व्यवहारे दृश्यमाने व्युत्पत्तिरेव न स्यात् । निर्विकल्पविज्ञानपरम्परया हि तं शब्दं शृणोति, तमर्थं पुरः पश्यति, पुनः तद्विविक्तं भूमलं पश्यति इति, घटम् आनय—नय—इति व्यवहारात् कथम् अस्य अयम् अर्थो हृदि परिस्फुरेत्, घट इति, इदमानय इति, इदं नय इति, इदमिति योजनाप्राणो हि अयमर्थः, योजना च विकल्पव्यापारः । अथ बालस्य प्राग्जन्मानुभूतसंकेत- स्मृतेः एवम्, तथापि संकेतकाले स शब्दो विषयत्वेन इदं भावेन अप्रत्यवमृश्यमानत्वात् भेदात् प्रच्युत्य निर्भासमानो विज्ञानशरीरविश्रान्तौकृतो वाचक इति भवति, तत् विज्ञानस्य स्वरूपं चेत् भाति, तत् अभिलापमयमेव इति, यथा विषयस्य सुखरूपत्वाभावेऽपि ज्ञानं सुखात्मकं भाति तथा मा भूत् अभिलापात्मा रूपादिः विषयः, तथापि विज्ञानं तदात्मकं अवभासिष्यते । अत्र तु दर्शने विषयस्यापि विमर्शमयत्वात् अभिलापमयत्वमेव वस्तुतः, स्तैमित्याद्यवस्थापि यदि न परामर्शमयी तर्हि अस्यां विकल्पात्मकप्रमातृव्यापारानुल्लासात् सम्भवः शपथपरमार्थ एव, निश्चित मायाजन्य विमर्श में चैतन्य का स्वरूपभूत अङ्गुलिनिर्देश के समान अभिलाप- योग रहता है, नहीं तो बालक को प्रथम व्यवहारदृष्टि में व्युत्पत्ति [ शक्तिग्रह ] ही नहीं होगी । क्योंकि बालक निर्विकल्प विज्ञान परम्परा से ही शब्द को सुनता हुआ, उस अर्थ को आगे की ओर सामने देखता है, फिर अर्थशून्य भूतल को देखता है, इसके बाद घट लावो और घट ले जावो—इस व्यवहार से बालक को इसका अर्थ हृदय में प्रतिफलित नहीं होगा, घट का ज्ञान और उसका ले आना फिर उसका ले जाना इत्यादि योजना में मिले रहना ही उसका अर्थ है और योजना ही विकल्प का व्यापार कहलाती है। यदि यह कहें कि बालक को पूर्वजन्म की स्मृति से ऐसा होता है—तो भी संकेत काल में विषयरूप से या इदंभाव से प्रत्यवमर्शन नहीं होने के कारण भेद से हटकर भासित होता हुआ विज्ञान शरीर में विश्राम लेकर यह शब्द वाचक होता है वही विज्ञान का स्वरूप है ऐसा यदि कहो, तो वह अभिलाप ही हो गया, [ जैसे माला-चन्दन-वनिता आदि विषयक सुख साधन के सुखरूपता का अभाव रहने पर भी ज्ञान तो सुखरूप से भासता है उसी प्रकार अभिलापभूत रूपादि विषयक न हो तो भी ज्ञान उस रूपत्त्व का भासित होगा ] इस प्रकार शब्द को आरोपित करता है जैसे विषय का सूक्ष्मरूप न होने पर भी ज्ञान सूक्ष्म होता है वैसा अभिलापरूपादि विषय सुखरूप नहीं है तब भी अभिला- पात्मक विज्ञान को तो अवभासित ही करेगा। हमारे स्वतन्त्र शैवाद्वैत दर्शन में तो विषय भी विमर्शमय होने के कारण वस्तुतः अभिलापमय ही होते हैं, सकल विकल्पों के क्षोभ से शून्य रहना आदि अवस्था भी परामर्शमयी नहीं रहती, तो इस अवस्था में विकल्परूप प्रमाता का १. सकल विकल्प के क्षोभ से रहित हो जाना ही स्तिमित कहलाता है । बाह्य ओर आन्तर से प्रसार का रुक जाना स्तैमित्य अर्थात् चांचल्य का अभाव हो जाना है । २. प्रत्यक्ष विषय के साधन में इन्द्रियाँ कल्पना से रहित हो जाती है — संहृत्य सर्वतश्चिन्तां स्तिमितेनान्तरात्मना । स्थितोऽपि चक्षुषा रूपमीक्षते साक्षजा मतिः ॥ पुनर्विकल्पयन्किंचिदासीन्मे कल्पनेदृशी । इति वेत्ति न पूर्वोक्तावस्थायामिन्द्रियाद्गतौ ॥