ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१७ अहंपरामर्शरूपम्, इति निर्मितस्य तद्रूपत्वाभावे कथं स्वातन्त्र्यान्मुक्तत्वम् इति ?, तत् एतत् परिहर्तुमाह— नाहन्तादिपरामर्शभेदादस्याप्यन्यतात्मनः । अहंदृश्यतयैवास्य सृष्टेस्तिङ्वाच्यकर्मवत् ॥ १७ ॥ स्वरूपे भावप्रत्ययः, आदिग्रहणात् आत्मेश्वरादिपरामर्शः, तिङ्ग्रहणं प्रत्ययोपलक्षणम्, कर्मग्रहणं क्रियावाचिसदसत्त्वभूतशक्तिरूपोपलक्षणम् । तत् अयम् अर्थः—अहम् इत्येवंरूपो यः परामर्शः, यच्च ईश्वरः प्रमाता आत्मा शिव इत्यादिः अनन्तप्रकारः परामर्शः, तस्य यद्यपि भेदोऽन्यान्यरूपता, तथापि तद्भेदात् हेतोः अस्य आत्मनो निर्मातृरूपस्य अहंपरामर्शमयस्य निर्मेयरूपस्य च ईश्वरादिपरामर्शास्पदस्य यो भेदः शङ्कितः, स न युक्तः, यत ईश्वर इत्यपि यः परामर्श में अभाव रहने पर कैसे वह स्वातन्त्र्य से युक्त हुआ ? इस शङ्का को दूर करने के लिए अब कहते हैं— अहन्ता और इदन्तादि परामर्श के भेद से इस आत्मा में भेद नहीं होता है। जैसे अहं परामर्श से ही सृष्टि में 'तिङ्' वाच्य का कर्म होता है ॥ १७ ॥ अहं इस अभिन्न प्रकाशरूप अव्यय में भाव प्रत्यय 'तल्' करके अहन्तारूप बनता है वही प्रकाश का अपना निजी लक्षण है, 'आदि' शब्द जो श्लोक में लिया गया है इससे आत्मा ईश्वरादि का परामर्श ग्रहण करना चाहिए, 'तिङ्' शब्द प्रत्यय का उपलक्षण करता है, कर्म के ग्रहण से क्रियावाची सद्रूप और असद्रूप शक्ति का उपलक्षण है। सब का सारांश यह है कि अहं ऐसा जो परामर्श है और जो ईश्वर प्रमाता है एवं आत्मा शिव है इत्यादि अनन्त प्रकार के जितने भी परामर्श हैं और उन अनन्त परामर्श के जितने भी भिन्न-भिन्नरूपों में भेद प्रतीत होते हैं, इन परामर्शों में भेद हेतु से अहंपरामर्शमय निर्माता की अपेक्षा से निर्मेयरूप ईश्वरादि परामर्श के आश्रयभूत परामर्श के जिस भेद की शङ्का की है—वह ठीक नहीं है, क्योंकि मैं 'बोधस्य स्वात्मनिष्ठस्य रचनां प्रति निर्वृत्तिः । तदास्थाप्रविकासो यस्तदौन्मुख्यं प्रचक्षते ॥' इति । तथा लोकव्यवहारोऽपि । 'गोस्तनात्पातः क्षीरे विकासस्तत एव हि । न च न क्षीरमित्येष व्यपदेशोऽस्ति तत्क्षणम् ॥' [ अहं परामर्श ही स्वातन्त्र्य है इदंभाव का परामर्श निर्मित रचना है। निर्मित परामर्श का तो अहं परामर्श में अभाव रहने के कारण परम स्वातन्त्र्य 'इदं' परामर्श कैसे बनेगा ? इसके समाधानमें उत्तर यह है ] कि अकुत्सित [ गर्हितता से रहित ] विषय को हो उन्मुखता मानी है उसे दृष्टान्त देकर स्पष्ट करते हैं। जैसे निस्तरंग जल का अतितरंग में परिणत हो जाने पर जलगत तरंग में सर्वप्रथम सूक्ष्म कल्पना उठती है वही उन्मुखता है, और हाथ की मुट्ठी बाँधने से पूर्व सुसूक्ष्म खिंचाव-नसोंका देखा जाता है उसी प्रकार अपने स्वरूप में स्थित बोधरूप की विश्व रचना के लिए जो सर्व प्रथम विकास प्रवृत्ति का प्रारम्भ होना, वही उन्मुखता कही जाती है । गौ के स्तन से निकला हुआ दूध विकार को ही प्राप्त हो जाता है और उस समय यह दुग्ध है—ऐसा क्या बोध नहीं होता है ? जब परामर्श ऐक्य होता है तब सर्वदा ऐक्य हो ही जाता है।