ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 138, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का-१७ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११५ परामर्शः, स ईशनशीले ज्ञातृत्वकर्तृत्वतत्त्वे विश्राम्यति, ज्ञातृत्वादि च ज्ञानादौ, स्वातन्त्र्यम् अनन्यमुखप्रेक्षित्त्वम् अविच्छिन्नज्ञानादिशक्तियोगः, अविच्छेदश्च जानामि करोमि इति अस्मदर्थ- विश्रान्तिः इति । अस्य ईश्वरस्य आत्मनः सृष्टेः सृज्यमानस्य अहंविमर्शनोयत्वमेव । सृष्टेः इति वा हेतौ पञ्चमी । अस्य ईश्वरस्य यतः ईश्वरादिसंकल्पेषु अपि अहंपरामर्शनयोग्यस्यैव सृष्टिः । अर्हे कृत्यः । यथा क्रियाकारकसमुच्चयविकल्पादिशक्तयो यथास्वं तिङ् तृतीयादि च वादिप्रयोगा- वसेयपरामर्शपरमार्थः पाकः कर्ता समुच्चयो विकल्पः इत्यादिशब्दैः अभिधीयमानाः सत्त्वभावम् आपादिता अपि, पचति चैत्रेण च वा इत्येवंभूते मूलपरामर्शे विश्राम्यन्ति । अन्यथा तु ताः प्रतीता नैव भवेयुः । तद्वत् अत्रापि । एतदुक्तं भवति—परामर्शो नाम विश्रान्तिस्थानम्, पार्यन्तिकमेव तच्च पारमार्थिकम्, अह- मित्येवंरूपमेव । मध्यविश्रान्तिपदं तु यत् वृक्षमूलस्थानीयं ग्रामगमने तदपेक्षया सृष्टत्वम् उच्यते,— अनेन नीलादेः अपि, इदं नीलम् इति मध्यपरामर्शोऽपि मूलपरामर्शे अहमित्येव विश्रान्तेः आत्म- इति को विरोधः । मयत्वम् उपपादितम् एव । नीलम् इदम् अहं वेद्मि इति, अहं प्रकाशे इति हि इयत्तत्त्वम् । यथोक्तम् ‘इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढस्तु नीलादिविमर्शात् एव अर्थक्रियादिपरितोषा- भि मानी, इति नीलादेः स्वातन्त्र्यनिर्मुक्तत्वम् उक्तम् । आत्मादौ तु तन्मूलपरामर्शविश्रान्तिमन्तरेण ईश्वर हूँ यह परामर्श भी सामर्थ्यशाली ज्ञातृत्व-कर्तृत्व में विश्रान्ति लेता है, और ज्ञातृत्वादि परामर्श ज्ञान में विश्रान्त होता है, स्वातन्त्र्यरूप किसी की भी अपेक्षा न रखनेवाला होता है जिसका अविच्छिन्न ज्ञानादि शक्तियों से सम्बन्ध है, और अविच्छेद 'जानाति'—'करोमि'रूप 'अस्मत्' शब्द के अर्थ में ही विश्रान्त होता है । इस विश्वरूप अपने आत्मा की सृष्टि में सृज्यमानरूप पदार्थों की अहन्ता शब्द से ही विमर्शन के योग्य है । सृष्टि करने के कारण हेतु में पञ्चमी विभक्ति है । क्योंकि इस ईश्वर की ईश्वरादि संकल्पों में भी जबकि अहंपरामर्श के योग्य ही सृष्टि होती है । 'मृष्यतया' इसमें अहन्-योग्यता अर्थ में कृत्यप्रत्यय हुआ है । क्रिया कारक समुच्चय विकल्प शक्तियाँ यथाक्रम तिङ् और तृतीयादि विभक्ति वादी के प्रयोग से जानने योग्य सिद्ध परामर्श [सत्त्वभूत] पाक हो रहा है और कोई कर्ता कर रहा है जो विकल्प शब्दों से कहे गये सत्त्वभाव को कहनेवाला पचाता है अथवा चैत्र से पचाया जाता है इत्यादि मूल परामर्श में विश्रान्त होते हैं । अन्यथा वे शक्तियाँ प्रतीत ही नहीं होंगी । उसी प्रकार यहाँ पर भी है । इससे यह कहा जाता है कि परामर्श को ही विश्रान्ति का स्थान माना जाता है और वह अन्तिम पारमार्थिक तत्त्व है तथा उसका स्वरूप अहम् है । मध्य में विश्राम लेनेवाला जोकि गाँव को जाते समय वृक्ष के मूल स्थान में बैठना-उठना इत्यादि प्रमाता की अपेक्षा से ही बनाया गया कहा जाता है, इस प्रकार कोई विरोध नहीं होगा । इससे नीलादि परामर्श में भी अहन्तारूप मूल परामर्श में ही विश्रान्त है, इसी कारण आत्ममयत्व कहा है । मैं इसको नील के रूप में जानता हूँ, मैं प्रकाशित होता हूँ यही तो सारतत्त्व है । जिसके लिए कारिका में कहा है—'इदमित्यस्य' इत्यादि । मूढ प्राणी तो नीलादि के विमर्श से ही अर्थक्रियादि परामर्श से संतुष्ट होकर उसका अभिमानी हो जाता है । इसलिए नीलादि को स्वतन्त्रता में सर्वथा भिन्न ही माना गया है । आत्मा आदि के मूल परामर्श में तो बिना विश्रान्त हुए प्रतीति की परिसमाप्ति मानते हैं और अर्थक्रिया को