ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१८ प्रतीतिपरिसमाप्तिम् अर्थक्रियां च मूढोऽपि न अभिमन्यत इति तस्य निर्मितौ अपि अनुज्झितस्वा- तन्त्र्यम् उक्तम् ॥ १७ ॥ ननु एवं विश्वपरामर्शानाम् अहम् इत्येव विशुद्धैकपरामर्शविश्रान्तिरेव तत्त्वम् तत् कथम् इदम् उच्यते—ज्ञानस्मृत्यादिका अस्य शक्तय इति, ज्ञानस्य च निर्णयसंशयभेदा नीलादीनां च वैचित्र्यम् ? इति आशङ्कायां परिहारमाह— मायाशक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा । कथिता ज्ञानसंकल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥ १८ ॥ अनुपपन्नम् अवभासनं माया इति उच्यते, ततश्च भिन्नं प्रकाशात् सर्वम् अवभासजातं माया, तत्र च चित्तत्त्वस्यैव स्वातन्त्र्यं मायाशक्तिः, तया भिन्नं यत् संवेद्यं प्रमातृश्च अन्योन्यतश्च, मायाशक्त्या भिन्नेन प्रमातुः अन्योन्यतो वेद्याच्च करणवर्गेण यत् संवेद्यं स एव गोचरो— विश्रान्तिपदं यस्याः तादृशी सती सैव प्रत्यवमर्शात्मा चितिः परावाग्रूपा, ज्ञानम् इति, संकल्प इति, अध्यवसाय इति च उच्यते, आदिग्रहणात् संशयः स्मृतिः इत्यादि । तथाहि—यत् इन्द्रियेण स्फुटग्राहिणा बाह्येन विषयेण स्फुटेन च नियन्त्रितं संवित्तत्त्वं यत् ज्ञानम् । मनसा विषयेण च अस्फुटेन संकल्पः । बुद्ध्या विषयेण च विषयत्वपर्यन्तभाजा अध्यवसायो निश्चयः । मूढ लोग भी नहीं मानते, इसलिए उसके निर्माण में भी स्वातन्त्र्य को नहीं छोड़ता हुआ कहा गया है ॥ १७ ॥ अब शङ्का करते हैं कि विश्व के समस्त परामर्शों का 'अहम्' इस विशुद्ध परामर्श मात्र में ही विश्रान्ति है तो फिर यह कैसे कहते हैं कि इसकी ज्ञानस्मृत्यादि शक्तियाँ हैं तथा ज्ञान के निर्णय और संशय भेद हैं एवं नीलादि पदार्थों में चित्र-वैचित्र्य रहता है ? यह नहीं बन सकता है इस आशंका का परिहार करते हैं— विभु परमेश्वर की माया-शक्ति से विमर्श-शक्ति ही भिन्न-भिन्न संवेद्य के विषय करनेवाली, ज्ञान-संकल्प-अध्यवसायादि नामों से कही गयी है ॥ १८ ॥ जो अवभास ठीक न बैठ सकें उसी को तो माया कहा जाता है, इसलिए प्रकाश से भिन्न सभी अवभास समूह माया है और चिदात्मा की स्वतन्त्रता ही माया-शक्ति है, उस माया-शक्ति से भिन्न जो संवेद्य है और प्रमाता के अन्योऽन्य सम्पर्क से और माया-शक्ति से प्रमाता के भिन्न होने से परस्पर वेद्य से भी और करण-वर्ग से जो ज्ञेय होता है वही उसका विषय है—उस संवेद्य में जिसकी विश्रान्ति होती है वैसी ही परामर्शात्मा चिति-शक्ति है वही परावाणी, ज्ञान, अध्यवसाय और संकल्पादि से कही जाती है। आदि ग्रहण से संशय, स्मृति से भी कही जाती है। क्योंकि बाह्य-इन्द्रियों द्वारा स्पष्टरूप से विषय का बोध होना ही ज्ञान है और मन द्वारा विषय का अस्फुटरूप से बोध होना संकल्प कहलाता है। बुद्धि से विषय का दृढरूप से निश्चय ही अध्यव- १. परमेश्वर विभु ही प्रमाता हैं वे परमेश्वर ही तो माया-शक्ति से संकुचित होकर ग्राहक जैसे हो जाते हैं। उसी प्रकार विमर्श-शक्ति भी माया-शक्ति के द्वारा वेद्य विषय के उपराग से संकुचित हो जाने पर ज्ञान-स्मरण संकल्पादि रूपों में परिणत हो जाती है। वस्तुतः विमर्श-शक्ति से भिन्न दूसरा कुछ भी ज्ञानादि नहीं है।