भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [११७ विषयस्य च यत् भिन्नत्वं बहिरन्तःकरणानां च तत्प्रकाशाभेदात् अनुपपन्नं चित्तत्त्वेन आभास्यते, इति भेदे यतो विश्रान्तिः, न तु भेदस्य अभेदे ईश्वरसदाशिवादिवत्, ततो ज्ञानसंकल्पादयो भिन्नाः तस्य अप्रध्वस्तस्वस्वभावाभेदस्य संवित्तत्त्वस्य अनुसंधातुः शक्तय इति उक्ताः, संशया- दयश्च भिन्ना नीलादिवैचित्र्यं च इति सर्वम् अखण्डितम् ॥ १८ ॥ ननु प्रत्यवमर्शात्मकत्वं चितिशक्तेः संकल्पस्मरणादिशक्तिषु सविकल्पात्मिकासु भवतु । या तु निर्विकल्परूपा साक्षात्कारणलक्षणा अनुभवशक्तिः, तत्र कथम् । प्रत्यवमर्शो हि अभिलापभेद- योजनामयः, अभिलापविशेषयोजना च संकेतस्मरणम् अपेक्षते । तच्च संस्कारप्रबोधम् । सोऽपि तादृशदृशम्, इति एवं प्रथमसमये कथम् अभिलापयोगः ?, इति परस्य व्यामोहम् अपोह- यितुमाह— साक्षात्कारक्षणेऽप्यस्ति विमर्शः कथमन्थथा । धावनाद्युपपद्येत प्रतिसन्धानवर्जितम् ॥ १९ ॥ साय है। अन्तःकरणों में उस प्रकाश से अभिन्नता होने के कारण भेद नहीं बैठता, इसी कारण भेद का अभेद में जैसे—ईश्वर का सदाशिव में होता है, इसलिए ज्ञान संकल्पादि भिन्न होते हैं, नहीं विनष्ट हुए प्राण पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव में संवित्तत्त्व का अनुसन्धान करनेवाले की शक्तियाँ कही गयी हैं, इसलिए संशय, स्मृति, विकल्पादि और नीलादि भिन्न-भिन्न रूपों में रहने- वाले वैचित्र्य भाव सब के सब परमेश्वर में अभिन्नरूप से रहते हैं ॥ १८ ॥ अब प्रश्न उठता है कि जो प्रत्यवमर्शात्मकत्व चिदात्मा की शक्ति है वह संकल्प-स्मरणादि के सविकल्पों में भले ही रहे, किन्तु निर्विकल्परूप जो साक्षात्कार करनेवाली अनुभव-शक्ति है उसमें प्रत्यवमर्शात्मकत्व किस तरह से है। क्योंकि प्रत्यवमर्श अभिलाप के भेद की योजना से युक्त होता है अभिलाप विशेष की योजना संकेत स्मरण की अपेक्षा रखती है और वह संकेत स्मरण संस्कार के जगने पर होता है। वह भी वैसी दृष्टि होने पर होता है, इस प्रकार साक्षात्कार के समय में कैसे अभिलाप का योग बैठ सकता है ? यह जो दूसरों को मोह-भ्रम हो रहा है उसे दूर करने के लिए कहते हैं— साक्षात्कार के समय में भी विमर्श रहता ही है, नहीं तो, प्रतिसन्धान से रहित धावन- वाचनादि क्रिया में कैसे परामर्श होता ॥ १९ ॥ १. अशुद्ध प्रमाता । २. पशु, जीव, प्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टकरूप पाश में बद्ध जाने के कारण सीमितरूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही इच्छा करता है। जानता है और करता है पतिप्रमाता असीमितरूप में सब कुछ एक साथ ही इच्छा करता है, जानता है और करता है फिर भी पशुप्रमाता की परमात्मा में ही क्रिया शीलता अवस्थित रहती है। पशुप्रमाता की अवस्थिति अपने सीमित स्वरूप में ही है । चिति- सत्ता पर ही दोनों रूपों में होनेवाली क्रिया शीलता आधार रखती है । ३. प्रत्यक्ष ज्ञान में भी द्रष्टा को दृश्य का सूक्ष्मरूप में प्रत्यवमर्श होता है, वाचन, धावन इत्यादि में शीघ्र क्रिया के द्वारा उन-उन दृश्यमान् को ग्रहण करने की इच्छा और छोड़ने की इच्छा अनुसंधान से ही होगी ।