भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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११८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ इह तावत् चैतन्यस्य आत्मभूतोऽङ्गुलिनिर्देशादिप्रख्योऽभिलापयोगः, अन्यथा बालस्य प्रथमं व्यवहारे दृश्यमाने व्युत्पत्तिरेव न स्यात् । निर्विकल्पविज्ञानपरम्परया हि तं शब्दं शृणोति, तमर्थं पुरः पश्यति, पुनः तद्विविक्तं भूमलं पश्यति इति, घटम् आनय—नय—इति व्यवहारात् कथम् अस्य अयम् अर्थो हृदि परिस्फुरेत्, घट इति, इदमानय इति, इदं नय इति, इदमिति योजनाप्राणो हि अयमर्थः, योजना च विकल्पव्यापारः । अथ बालस्य प्राग्जन्मानुभूतसंकेत- स्मृतेः एवम्, तथापि संकेतकाले स शब्दो विषयत्वेन इदं भावेन अप्रत्यवमृश्यमानत्वात् भेदात् प्रच्युत्य निर्भासमानो विज्ञानशरीरविश्रान्तौकृतो वाचक इति भवति, तत् विज्ञानस्य स्वरूपं चेत् भाति, तत् अभिलापमयमेव इति, यथा विषयस्य सुखरूपत्वाभावेऽपि ज्ञानं सुखात्मकं भाति तथा मा भूत् अभिलापात्मा रूपादिः विषयः, तथापि विज्ञानं तदात्मकं अवभासिष्यते । अत्र तु दर्शने विषयस्यापि विमर्शमयत्वात् अभिलापमयत्वमेव वस्तुतः, स्तैमित्याद्यवस्थापि यदि न परामर्शमयी तर्हि अस्यां विकल्पात्मकप्रमातृव्यापारानुल्लासात् सम्भवः शपथपरमार्थ एव, निश्चित मायाजन्य विमर्श में चैतन्य का स्वरूपभूत अङ्गुलिनिर्देश के समान अभिलाप- योग रहता है, नहीं तो बालक को प्रथम व्यवहारदृष्टि में व्युत्पत्ति [ शक्तिग्रह ] ही नहीं होगी । क्योंकि बालक निर्विकल्प विज्ञान परम्परा से ही शब्द को सुनता हुआ, उस अर्थ को आगे की ओर सामने देखता है, फिर अर्थशून्य भूतल को देखता है, इसके बाद घट लावो और घट ले जावो—इस व्यवहार से बालक को इसका अर्थ हृदय में प्रतिफलित नहीं होगा, घट का ज्ञान और उसका ले आना फिर उसका ले जाना इत्यादि योजना में मिले रहना ही उसका अर्थ है और योजना ही विकल्प का व्यापार कहलाती है। यदि यह कहें कि बालक को पूर्वजन्म की स्मृति से ऐसा होता है—तो भी संकेत काल में विषयरूप से या इदंभाव से प्रत्यवमर्शन नहीं होने के कारण भेद से हटकर भासित होता हुआ विज्ञान शरीर में विश्राम लेकर यह शब्द वाचक होता है वही विज्ञान का स्वरूप है ऐसा यदि कहो, तो वह अभिलाप ही हो गया, [ जैसे माला-चन्दन-वनिता आदि विषयक सुख साधन के सुखरूपता का अभाव रहने पर भी ज्ञान तो सुखरूप से भासता है उसी प्रकार अभिलापभूत रूपादि विषयक न हो तो भी ज्ञान उस रूपत्त्व का भासित होगा ] इस प्रकार शब्द को आरोपित करता है जैसे विषय का सूक्ष्मरूप न होने पर भी ज्ञान सूक्ष्म होता है वैसा अभिलापरूपादि विषय सुखरूप नहीं है तब भी अभिला- पात्मक विज्ञान को तो अवभासित ही करेगा। हमारे स्वतन्त्र शैवाद्वैत दर्शन में तो विषय भी विमर्शमय होने के कारण वस्तुतः अभिलापमय ही होते हैं, सकल विकल्पों के क्षोभ से शून्य रहना आदि अवस्था भी परामर्शमयी नहीं रहती, तो इस अवस्था में विकल्परूप प्रमाता का १. सकल विकल्प के क्षोभ से रहित हो जाना ही स्तिमित कहलाता है । बाह्य ओर आन्तर से प्रसार का रुक जाना स्तैमित्य अर्थात् चांचल्य का अभाव हो जाना है । २. प्रत्यक्ष विषय के साधन में इन्द्रियाँ कल्पना से रहित हो जाती है — संहृत्य सर्वतश्चिन्तां स्तिमितेनान्तरात्मना । स्थितोऽपि चक्षुषा रूपमीक्षते साक्षजा मतिः ॥ पुनर्विकल्पयन्किंचिदासीन्मे कल्पनेदृशी । इति वेत्ति न पूर्वोक्तावस्थायामिन्द्रियाद्गतौ ॥