ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-५, का.-१९] विमर्शिनीटीकोपेता [ ११९ स्मरणं च न स्यात्, रूपविषयाध्यवसायी हि यदि विकल्प उदियात् किमन्यत्, सर्वचिन्तासंहरणेन स्तैमित्यं नाम न स्यात् इति, तत्रापि अस्ति अन्तः परामर्शः सकलेन च शब्दग्रामेण, शब्दनं हि सहन्ते वस्तूनि । तत्र च नियतशब्दयोजनं क्रियते । तथाहि—बालस्य पुरतः पिण्डे सहजो यः परामर्शः, अहम् इत्यविच्छेदेन इदम् इति विच्छेदेन वा तत्पृष्ठे एव गौर इति गौः इति वा शब्द आरोप्यते, सोऽपि अभ्यासात् प्रमातृमयी- भवति, तत्पृष्ठे च अन्यः शुक्ल इति बलीवर्द इति, एवमन्यत् इति संकेततत्त्वम् । तस्मात् अस्ति साक्षात्कारे प्रत्यवमर्शः । अपिशब्दस्य अयमाशयः—इह साक्षात्कारो वस्तुतः 'पश्यामि' इत्येवं- भूतविकल्पनव्यापारपर्यन्त एव । विकल्पो हि प्रत्यक्षस्य व्यापार, इति परोऽपि मन्यते । न च व्यापारः तद्वतो भिन्नो युक्तः, तत्स्वरूपभूतो हि सः । भवतु वा क्षणमात्रस्वभावः साक्षात्कारः तत्रापि अस्ति विमर्शः, अवश्यं चैतत्—अन्यथा इति यदि स न स्यात् एकाभिसंधानेन जवात् गच्छन् त्वरितं, च वर्णान् पठन्, द्रुतं च मन्त्रपुस्तकं वाचयन्, न अभिमतमेव गच्छेत्, उच्चारयेत्, व्यापार न होने से किसी की कल्पना भी नहीं हो सकती है और स्मरण भी नहीं हो सकता है, रूपविषयक ज्ञान ही यदि विकल्परूप से उदित हो तो फिर क्या कहना है, सब प्रकार की चिन्ता का संहार करके शान्त चुप-चाप बैठे रहना भी तो नहीं बनता है; क्योंकि वहाँ पर भी अन्तःकरण में परामर्श रहता ही है और सम्पूर्ण शब्दसमूह से विमर्श करते रहना सभी वस्तु-पदार्थ सह लेते हैं अब उसमें नियत शब्दों की योजना बनाते हैं, इसीको दिखाते हैं—जैसे कि बालक की अभिमुख अवस्थित वस्तु में सहज जो परामर्श होता है 'अहम्' इस अनवच्छिन्न प्रकाशरूप से, 'इदम्' इस परिच्छेद-परिमितरूप से भासता है अथवा उसी के पश्चात् ही 'अहम्' इस रूप में प्रकाशित होता है, गौ 'इदम्' इस रूप में भासता है—ऐसा शब्द का आरोप होता है, वह भी अभ्यास द्वारा प्रमाता से युक्त होकर होता है और उसी के पश्चात् दूसरा शुक्ल है, यह बैल है, इस प्रकार दूसरा ऐसा संकेततत्त्व है। इसलिए साक्षात्कार होने पर प्रत्यवमर्श ज्ञान होता है। 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि यहाँ पर साक्षात्कार परमार्थतः 'पश्यामि' मैं देखता हूँ—ऐसा विकल्प करनेवाले का व्यापार पर्यन्त ही रहता है। क्योंकि विकल्प ही प्रत्यक्ष का व्यापार माना जाता है, ऐसा सौगतादि का मानना है । व्यापार कोई व्यापारवाले से भिन्न नहीं होता और ऐसा मानना भी उचित नहीं है, क्योंकि वह तो उसका स्वरूपभूत होकर रहता है। भले ही क्षणभर रहे, क्षणमात्र स्वभाववाला साक्षात्कार होकर रहे किन्तु उसमें भी विमर्श ज्ञान रहता है और यह आवश्यक भी है—यदि वह उसमें नहीं रहेगा, तो एक अनुसन्धान से वेगपूर्वक गमन करते हुए, त्वरित गति से वर्णों को पढ़ते हुए, शीघ्रता से मन्त्र-पुस्तक को बाँचते हुए, अपने अभीष्ट वस्तु को भी नहीं नित्य-स्तिमित अन्तरात्मा के माध्यम से चारो ओर से चिन्ता को समेट कर स्थिर रहता हुआ भी चक्षु-इन्द्रिय के द्वारा रूप ग्रहण कर लेता है। वही प्रत्यक्ष बुद्धि कही जाती है। मेरी कुछ ऐसी ही कल्पना थी फिर ऐसा विकल्प करता हुआ, जो जानता है उसकी पूर्वोक्त अवस्था में इन्द्रियों की गति नहीं देखी जाती । १. मैं अपने में स्थिर हो गया हूँ। इस स्थिति में संकल्प, विकल्प एवं स्मरण इत्यादि का अपने आप अवरोध हो जाता है।