भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१२० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-१९ वाचयेत् वा । तथाहि—तस्मिन् देशे ज्ञानम् आचिक्रमिषा-आक्रमणम्-आक्रान्तता-ज्ञानं-प्रयोजना- न्तरानुसंधानम्-तित्यक्षा-देशान्तरानुसंधिः, तत्रापि आचिक्रमिषा इत्यादिना संयोजनवियोजनरूपेण परामर्शेन विना अभिमतदेशावाप्तिः कथं भवेत् । एवं त्वरितोद्ग्रहणवाचनादौ मन्तव्यम् । तत्र विशेषतः स्थानकरणाक्रमणादियोगः । अत्र च यतः पश्चाद्भाविस्थूलविकल्पकल्पना न संवेद्यते, तत एव त्वरितत्वम् इति सूक्ष्मेण प्रत्यवमर्शेन संवर्तितशब्दभावनामयेन भाव्यमेव । संवर्तिता हि शब्दभावना प्रसारणेन विवर्त्यमाना—स्थूलो विकल्पः यथा इदमित्यस्य प्रसारणा घटः शुक्ल इत्यादिः, तस्यापि पृथुबुध्नोदराकारः शुक्लत्वजातियुक्तगुणसमवायी इत्यादिः । धावु गतिशुद्धौ इति पाठात् धाविस्त्वरितगतौ स्वशक्तिवशात् वर्तत इति ॥ १९ ॥ भवतु एवं सूक्ष्मो विमर्शः प्रकाशशरीरावेशी, यत्र तु स्थूलत्वेन विकल्परूपता स्फुटा, तत्र शब्दो नीलादिवत् एव पृथक् प्रतिभासते—नीलम् इदम् इति, स कथं प्रकाशस्वरूपात् अपृथग्भूतः प्राप्त कर सकेगा, अथवा उच्चारण एवं बाँच भी नहीं पायेंगे । देखिये—उस देश में ज्ञान है आक्रमण करने की इच्छा का नया आक्रमण, आक्रान्त का ज्ञान होना दूसरे प्रयोजन का अनु- सन्धान करना है, त्याग करने की इच्छा देशान्तर की इच्छा का अनुसन्धान करना है, उसमें भी 'आचिक्रमिषा' इत्यादि वाक्यों से संयोजन-वियोजनरूप परामर्श बिना अभिमत देश की प्राप्ति कैसे होगी। इस प्रकार शीघ्रगति में ग्रहण करने और बाँचने इत्यादि में मानना होगा। यहाँ पर विशेष- रूप से स्थान-मूर्ध, ताल्वादि, करण, आक्रमण आदि का योग रहता है । [ यदि सर्वत्र नीलादि ] ज्ञान में शब्द है तो किञ्चित भी निर्विकल्पक सिद्ध हुआ, वैसा ही क्यों अवतरिका में दिया है ? [ या तु निर्विकल्पक रूपा ] इत्यादि वाक्य से जो यह निर्विकल्परूप है इत्यादि कहा जाता है, वह तो दूसरे का ही ज्ञान है, उसके न रहने पर भी हमारा कुछ भी अनिष्ट होनेवाला नहीं होगा देखिये—इसीको मैं अब भली भाँति जानता हूँ एवं मैं करता हूँ, इसका यही संकुचित स्वरूप है जबकि नियति, काल, राग, अशुद्ध विद्या, कला, माया उन छः कंचुकों से भरा हुआ, प्रकाश स्वभाव उस पुरुष नाम धारी माया प्रमाता का है । 'सब कुछ देखता हूँ इस प्रकार का बुद्धि- इन्द्रिय विशेष व्यापार वर्ग में जो अनुयायी है' मैं जानता हूँ, व्यापाररूप उसमें जो करण सामान्य रूप अशुद्ध विद्यातत्त्व है वह किञ्चित् भी स्वतन्त्र नहीं है अपि तु वह तो परमेश्वर की ही शक्ति है । जब कि उसके पीछे होनेवाली भावी स्थूल विकल्प की कल्पना ज्ञात नहीं होती है, इसलिए त्वरितत्त्व यह सूक्ष्म विमर्श से संवर्तित शब्द भावना से युक्त होना चाहिए । वह संवर्तिता ही शब्दता है जब कि प्रसारण = फैलने से स्थूल-विकल्प बन जाती है, जैसे 'इदम्' इसका फैलाव घट शुक्ल है इत्यादि रूपों में हो जाता है, उस घटादि का भी फैलाव पृथुबुध्नोदर आकार शुक्लत्व जाति से युक्त होकर गुण-समवायरूप हो जाना इत्यादि । यहाँ पर धावु-धातु गति की शक्ति अर्थ में पढ़ी गयी है । इसलिए धावु धातु त्वरित गति में अपनी शक्ति सामर्थ्य से प्रवृत्त होती है ॥ १९ ॥ ठीक है, इस प्रकार सूक्ष्म विमर्श प्रकाश शरीर में आविष्ट होकर रहता है । जहाँ पर स्थूल [अध्यवसाय] रूप से विकल्परूपता प्रस्फुट होती है वहाँ पर शब्द नीलादि पदार्थ की भाँति ही भिन्नरूप में प्रतिभासित होने लगता है—जैसा कि यह नील है, वह प्रकाश स्वरूप से अभिन्नरूप १. मूर्ध, ताल्वादि स्थान और जिह्वाग्रादि भाग करणेन्द्रिय इन दोनों के परस्पर संस्पर्श हो जाने पर ही वर्णों की निष्पत्ति होती है ।