भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-५, का.-२० ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२१ स्यात्, शब्दात्मा च विमर्शः, स च तत्र मायात्मके भेदपदेऽपि प्रकाशापृथग्भूतो भवद्भिः इष्टः, तत् एतत् कथं प्रतिपत्तव्यम् ?, इत्याशङ्कयाह— घटोऽयमित्यध्यवसा नामरूपातिरेकिणी । परेशशक्तिरात्मैव भासते न त्विदन्तया ॥ २० ॥ केन एतत् उक्तम्—घट इति यः स्थूलः शब्दः स प्रकाशजीवितस्वभावो विमर्श इति । सोऽपि हि स्थूलः शब्दोऽर्थवत् पृथग्भूत एव भाति । तौ नामरूपलक्षणौ शब्दार्थौ एकरूपतया ‘सोऽयम्’ इत्येवंरूपत्वेन परामृशन्ती अध्यवसायशक्तिः या, सा परमेश्वरशक्तिः विमर्शरूपा आत्मवत् एव अहमित्यनवच्छिन्नत्वेन भाति, न तु कदाचित् इदन्तया—विच्छिन्नत्वेन भाति, विच्छिन्नत्वेन अवभासे परप्रतिष्ठत्वात् पुनर्विमर्शान्तरेण भाव्यम्, तत्रापि एवम् इति अनवस्था, अतो नीलस्य प्रकाशनमेव न स्यात्—प्रतिष्ठालाभाभावात् । तस्मात् ‘सर्व एव विमर्शः प्रकाशात् अविच्छिन्न एव’ इति। अध्यवसा इति, ‘आतश्चोपसर्गे ( पा० अ० ३-३-१६ ) इत्यङन्तः स्त्रियाम् ॥ २० ॥ में कैसे भासित होगा, और वह शब्द विमर्शंरूप में भासता है तो इसका मायात्मक भेदवाले संसार में भी प्रकाश से अभिन्नरूप में होकर भासना आपको भी अभीष्ट है, इसको कैसे जानना चाहिए ? इस प्रकार आशंका कर उत्तर देते हैं— वही यह घट है ऐसा जो अध्यवसाय [ज्ञान] नाम [घट] एवं रूप [पृथुबुध्नोदर आकार] से व्यतिरिक्त है। वही परमेश्वरकी शक्ति आत्मा के समान ‘अहम्’ इस अनवच्छिन्नरूप से भासती है ‘इदम्’ परिच्छिन्नरूप से नहीं भासती ॥ २० ॥ यह किसने कहा है—जो यह ‘घट’ स्थूल शब्द है वह प्रकाश जीवित स्वभाववाला विमर्श है। वह भी स्थूल शब्द के अर्थ की भाँति भिन्नरूप से ही भासता है उन नाम एवं रूप लक्षणवाले शब्दार्थ को जो एक [सोऽयम्] रूप से परामर्श न करनेवाली अध्यवसाय-शक्ति है, वह विमर्शरूप परमेश्वर की शक्ति आत्मा की जैसी अभेदभावपूर्वक ‘अहम्’ अनवच्छिन्नरूप से भासती है, वह कभी भी ‘इदन्तया’ अर्थात् विच्छिन्नरूप से नहीं भासती है। विच्छिन्नरूप से आभासित होनेपर तो अन्य प्रकाश की अपेक्षा रखनी पड़ती है दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होनेवाला अप्रतिष्ठित कहलाता है, विच्छिन्न स्वतः प्रकाशित न होने के कारण अप्रतिष्ठित है, विमर्शं के बिना होना असम्भव ही है वह भी किसी अन्य से, इस प्रकार अनवस्था हो जायेगी, इसलिए नील का प्रकाशन ही नहीं होगा, क्योंकि प्रतिष्ठान = सभी संवेदन ज्ञानों को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नील में नहीं है। इसी कारण सब विमर्श प्रकाश से अविच्छिन्न ही है। ‘अध्यवसा’ यह प्रयोग ‘आतश्चोपसर्गे’ [३-३-१०६] इस पाणिनीय सूत्र के द्वारा ‘अङ’ स्त्रीलिङ की विवक्षा में ‘टाप्’ होकर निष्पन्न हुआ है ॥ २० ॥ १. अध्यवसायरूप ज्ञान ही भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकाशमान होनेवाले [ घटादि ] नाम एवं रूपादि से व्यतिरिक्त चिति-शक्ति ही आत्मरूप में अभिन्न होकर भासती है। १६