ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-५, का.-२१ ननु एवं सर्वस्यैव ज्ञानकलापस्य अहमित्येव प्रतिष्ठाने वेद्यभूमिसंस्पर्शो नास्ति वेद्यभुवि च देशकालयोगः न तु वेदकांशे देशकालयोगाभावे च यत् इदं ज्ञानानां स्वांशापेक्षया ज्ञानान्तरापेक्षया च सक्रमत्वं लक्ष्यते तत् कथं स्यात्, क्रमाभावे च एकत्वमेव वस्तुतो भवेत्, ततश्च 'ज्ञानस्मृत्यादि- शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' इति यत् उक्तं तत् कथं निर्वहेत् ? इत्याशङ्कां शमयन् पूर्वोक्तमुप- संहरति— केवलं भिन्नसंवेद्यदेशकालानुरोधतः । ज्ञानस्मृत्यवसायादि सक्रमं प्रतिभासते ॥ २१ ॥ सत्यम् एवम्—अक्रममेव संवित्तत्त्वम्, किन्तु स्वशक्तिवशात् भिन्नत्वेन भासितानि यानि वेद्यानि तेषां मूर्तिभेदकृतो यो दूरादूरवैतत्यावैतत्यादिः देशः, क्रियाभेदकृतश्च चिरशीघ्रक्रमादिरूपः कालः, तौ अनुरुध्य—च्छायामात्रेण अवलम्ब्य, ज्ञान-स्मरणायध्यवसायानां स्वांशा इव भान्ति, निरंशानामपि तद्भासमानांशकृतश्च सक्रमत्वावभासः परस्परापेक्षया स्वांशापेक्षया च, यद्यपि अब प्रश्न करते हैं कि सब ज्ञान का यह 'अहम्' परामर्शन ही जीवन है और जब वेद्य- भूमि से उस परामर्श का स्पर्श ही नहीं है एवं देश-काल का योग वेद्यभूमि में रहता है, इस प्रकार वेदक के अंश में देश-काल का योग न रहने से तो ज्ञानों का अपने अंश की अपेक्षा से अथवा अन्य ज्ञानों की अपेक्षा से सक्रमता दीख पड़ती है वह कैसे बैठेगी ? क्रम के अभाव में वस्तुतः एकत्व ही रहेगा। 'ज्ञान स्मृत्यादि शक्तिभिस्तद्वान् परमेश्वरः' अर्थात् ज्ञान, स्मृति आदि शक्तियों से युक्त परमेश्वर कैसे होगा ? इस शंका का समाधान करते हुए पूर्वमें कहे गये का ही उपसंहार करते हैं— केवल भिन्न-भिन्न देश एवं काल के संवेद्य के अनुरोध से ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि क्रम से प्रतिभासित होते हैं ॥ २१ ॥ ठीक ही है, संवित् तत्त्व अक्रम ही रहता है, किन्तु अपनी माया-शक्ति के बल से भिन्न-भिन्न रूपों में भासित होनेवाले जितने भी वेद्य पदार्थ हैं उनके मूर्ति भेदकृत् जो दूर-समीप और संकुचित-विस्तृत-विशाल इत्यादि देश भेद और क्रिया भेद से होनेवाले शीघ्र-विलम्ब इत्यादि जो काल-भेदादि इन्हीं दोनों भेदों को छायामात्र मान लेने पर ज्ञान, स्मृति एवं अध्यवसाय इनके अपने-अपने अंश मालूम होते हैं, निरंशों में भी आभास अंश से सक्रमत्व का अवभास परस्पर १. चिद्रूप की माया-शक्ति के द्वारा घटादि संवेद्य विषय उस-उस देश-कालादि से भिन्न होकर प्रकाशित होते हैं। जिसका अभेद से आक्रान्त होने पर विभिन्न देश कालादिरूप से ज्ञान, स्मृति-शक्ति इत्यादि अवभासित होने लगती है । २. चिति-शक्ति से वेद्य विषय भिन्नरूप में भासते हैं। देश-काल को लेकर उपलक्षण कहा गया है । स्फुट और अस्फुटरूप से सम्बन्ध का ज्ञान, स्मरण, संकल्पादि भेद अन्तरंग कहलाते हैं उसमें भी नील ज्ञान, पीत ज्ञान यह उस से भी अन्तरंगतर है, नील ज्ञान में भी सुख, दुःख, संवेदन इत्यादि का भेद अन्तरंगतर है । यह चिरकालीन ज्ञान एवं त्वरित ज्ञान यह बहिरंग है। यह पूर्व में ज्ञान हुआ, यह बाद में ज्ञान हुआ यह बहिरंगतर है, मच्छर का ज्ञान सूक्ष्म है हाथी का ज्ञान स्थूल होता है, यह बहिरंगतर भेद कहलाता है । अतः प्रधान वस्तु के कारण ज्ञान का भेद हो जाता है ।