ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-६, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२३ कालक्रम एव स्फुटो विज्ञानेषु भाति न देशक्रमः, तथापि विमूढस्य पर्वतसंवेदनं विततमिव बदरसंवेदनं च सूक्ष्ममिव भाति—इति देशक्रमोऽपि दर्शितः, तेन वेद्यगतक्रमस्वीकाराभासात् सक्रमत्वम् आभासमानमपि न अपारमार्थिकम्—आभासमानस्य परमार्थत्वात्, ततश्च युक्तमुक्तम् ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तय’ इति । ‘मायाशक्त्या विभोः’ । इति श्लोकेन स्वरूपवैचित्र्यं ज्ञानानां दर्शितम् । अनेन तु देशकालवैचित्र्यम्—इति विशेषः । इति शिवम् ॥ २१ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम पञ्चममाह्निकम् ।
अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणाख्यं षष्ठमाह्निकम् स्वात्माभेदधनान्भावांस्तदपोहनटङ्कतः । छिन्दन्त्यः स्वेच्छया चित्ररूपकृतं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्मृतिशक्तिर्ज्ञानशक्तिश्च निरूपिता । अथ तदुभयानुग्राहिणी अपोहनशक्तिर्वितत्य श्लोकैकादशकेन ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मा’ इत्यादिना ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ इत्यन्तेन निर्णीयते । तत्र श्लोकेन ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेष’ इति सूच्यते । ततः श्लोकेन । ‘शुद्धेऽहं- प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारासंभव’ उच्यते । ततः ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’ इति श्लोकेन । ततोऽपि अपेक्षा से और अपने अंश की अपेक्षा से होते हैं, यद्यपि कालक्रम ही स्पष्टरूप से विज्ञानों में भासता है, देशक्रम नहीं भासता, फिर भी विमूढ लोगों को पर्वत का संवेदन-ज्ञान विस्तृत = विशाल सा लगता है और बेर-फल का ज्ञान सूक्ष्म-छोटा सा लगता है, इस प्रकार देशक्रम भी बता दिया, इसलिए वेद्यगत क्रम के स्वीकार के अभ्यास से सक्रमत्व होता है, आभासित होने- वाले पदार्थ भी अपारमार्थिक नहीं है किन्तु आभासमान का स्वरूप पारमार्थिक ही है, इसीलिए सत्य ही कहा है कि ‘ज्ञानादयोऽस्य भगवतः शक्तयः’ अर्थात् ज्ञान, स्मृति, अध्यवसायादि भगवान् की ही शक्तियाँ है । ‘मायाशक्त्या विभोः ।’ प्रभु की माया-शक्ति से भेद होता है इस प्रकार श्लोक से ज्ञान, स्मृति, संकल्प, अध्यवसायादि के स्वरूप वैचित्र्य दिखा दिये और इससे देश-काल का वैचित्र्य भी ज्ञात हो जाता है ॥ २१ ॥ पञ्चम आह्निक समाप्त जो अपने आत्मा में अभिन्नरूप से रहनेवाले पदार्थ-भावों को लुप्त होने से रोकते हुए अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा चित्र-विचित्ररूप बनाते हैं, ऐसे शिव की हम स्तुति करते हैं । इस प्रकार स्मृति-शक्ति और ज्ञान-शक्ति का निरूपण कर दिया गया । अब उन दोनों पर अनुग्रह करनेवाली अपोहन-शक्ति का विस्तारपूर्वक ग्यारह श्लोकों से ‘अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रका- शात्मा’ इत्यादि से लेकर ‘सिद्धे सर्वस्य जीवतः’ यहाँ तक निर्णय करते हैं । प्रथम श्लोक से ‘प्रत्यवमर्शो अविकल्पो विशेषः’ प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है यही विशेषता सूचित होती है । उसके पश्चात् ‘शुद्धेऽहं प्रत्यवमर्शेऽपोहनव्यापारसम्भवः’ अर्थात् ‘अहम्’ इस शुद्धप्रत्यवमर्श में व्यापार का होना संभव नहीं है यह कहा जाता है । अनन्तर एक श्लोक से ‘स्वदृष्टावेव तदुपपत्तिः’