भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१२४] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [अ.-१, आ.-६, का.-१ द्वयेन । 'अशुद्धस्याहमित्येवमर्शस्य विकल्परूपता' । ततः श्लोकेन 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' । एवं 'भूतानुसंधानादिरूपमेव परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वम्' इति श्लोकेन । ततः 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थाव- भासस्य सत्तोपसंह्रियते' श्लोकेन । ततो द्वयेन 'तस्यैवार्थावभासस्यानुभवस्मरणादौ वैचित्र्यमु- च्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' इति श्लोकेन । इत्याह्निकस्य तात्पर्यार्थः । अथ ग्रन्थार्थो व्याख्यायते—उक्तमिदं 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं........' इति, तत्र विमर्शोऽभिलापात्मना शब्देन योजित एव, तद्योजनाकृतं च विकल्परूपत्वं शुद्धेऽपि परमेश्वरे प्राप्तं, न चैतदिष्टं—तस्य संसारपदे मायात्मन्युपपत्तेः—इत्याशङ्क्योचाह— अहं प्रत्यवमर्शो यः प्रकाशात्मापि वाग्वपुः । नासौ विकल्पः स ह्युक्तो द्वयाक्षेपी विनिश्चयः ॥ १ ॥ प्रकाशस्य विशुद्धसंविद्रूपस्य देहादिसंस्पर्शर्नाबिलीभूतस्य यः आत्मा जीवितभूतः सारस्व- भावो विच्छेदशून्योऽन्तरभ्युपगमकल्पोऽनन्यमुखप्रेक्षित्त्वस्वात्मविश्रान्तिरूपः 'अहमिति' प्रत्यव- मर्शः असौ विकल्पो न भवति, विकल्पत्वाशङ्कायां बीजं दर्शयति—वाग्वपुरपीति । विषयरूपात् कहेंगे । फिर दो श्लोकों से 'अशुद्धस्याहमित्यवमर्शस्य विकल्परूपता' अपने दर्शन का सिद्धान्त स्थिर करेंगे । तब एक श्लोक से 'अनुसंधानस्यापि विकल्परूपता' एवंभूतानुसंधानरूपमेव परमेश्वरस्य सृष्टृत्वम्' यह कहेंगे कि तरह-तरह के अनुसन्धान करना—यही परमेश्वर की सृष्टि है । उसके बाद 'प्रकृते चिदात्मन्यर्थावभासस्य सत्तोपसंह्रियते' इसी प्रसंग के अन्तर्गत चिदात्मा में अर्थाव- भास की सत्ता का उपसंहार करेंगे । तब दो श्लोकों से 'तस्यैवार्थावभासानुभव स्मरणादौ वैचित्र्य- मुच्यते, तदुक्तिश्च प्रकृतायामीश्वररूपस्वात्मप्रत्यभिज्ञायामुपयुज्यते' उसीका अर्थ अवभास के अनुभव, स्मरण आदि में विचित्रता बतायेंगे और प्रसंग से प्राप्त अपनी ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा में उसकी उक्ति का उपयोग होता है—यह श्लोक से कहेंगे । यही इस आह्निक का अभिप्राय है । अब ग्रन्थ के अर्थ की व्याख्या करते हैं—यह कहा गया है कि 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं.....।' अर्थात् विमर्श को अभिलापरूप शब्द से जोड़ दिया गया है, उस योजना से प्राप्त विकल्परूप शुद्ध परमेश्वर में भी मिलता है किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मायामय संसार में उसकी उपपत्ति बैठती है, इस प्रकार आशङ्का कर उत्तर में कहते हैं— जो अहं प्रत्यवमर्श प्रकाशरूप वाणी का स्वरूप है । वह विकल्प नहीं है, वह तो द्वित्व की अपेक्षा रखनेवाला आत्मसाररूप निश्चय है ॥ १ ॥ जो विशुद्ध संविद्रूप प्रकाश है उसका देहादि संस्पर्श-सम्पर्क से नहीं बिगड़नेवाला जीवन है; आत्मा के सारस्वभाव, विच्छेदशून्य, भीतरी प्राप्ति के समान, किसी अन्य की अपेक्षा न रखने- वाला, अपने में विश्रान्ति लेनेवाला अहं इस रूप का परामर्श है—वह विकल्पित नहीं होता है, अर्थात् अहं प्रत्यवमर्श में विकल्प नहीं होता है; विकल्परूप की शङ्का में बीज का अभाव दिखाते हैं—'वाग्वपुरिति' । क्योंकि श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होनेवाला शब्दरूप विषय से दूसरा ही अन्तः-