ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-६, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२५ श्रोत्रग्राह्यात् शब्दादन्य एव अन्तरवभासमानः संविद्रूपावेशी शब्दनात्माभिलापोवागित्युनेनोक्तः- वक्ति अर्थं स्वाध्यासेन सोऽयमित्यभिसम्बन्धेन, यदि वाग्वपुः-कस्मान्न विकल्पः ? आह-नह्यस्य विकल्पलक्षणमस्ति, तथाहि-विविधा कल्पना विविधत्वेन च शङ्कितस्य कल्पोऽन्यव्यवच्छेदं विकल्पः, विविधत्वं च वह्नाववह्निसंभावनासमारोपनिरासे सति भवत्, द्वयं वह्न्यवह्विरूपमा- क्षिपति, तेन विकल्पेऽवश्यं तच्च निश्चेतव्यम्-अतश्च व्यपोहितव्यं भवति ॥ १ ॥ तथा च- भिन्नयोरवभासो हि स्याद्घटाघटयोर्द्वयोः । प्रकाशस्येव नान्यस्य भेदनस्त्ववभासनम् ॥ २ ॥ घटे हि दृष्टे घटस्थान एवाघटोऽपि योग्यदेशाभिमतस्थानाक्रमणशीलो विज्ञानजनकः स्व- कारणोपनीतः संभाव्यते पटादिस्वभावः, अतो घटाघटयोर्द्वयोरवभासस्य संभावनात् समारोपः सावकाशोभवति, अघटस्य सत्यारोपे निषेधलक्षणोऽपोहनव्यापारः-इति तदनुप्राणिता विकल्प- रूता घट इत्येतस्य निश्चियस्य, 'लिङ् संभावनायाम्' । यस्त्वयं प्रकाशो नाम तस्य स्थाने यः संभाव्यते स तावदप्रकाशरूपो न भवति-तुल्यकक्ष्यस्य हि संभावनं भवति, न च यत्प्रकाशेन कर्तव्यं तदप्रकाशस्य कदाचित् दृष्टं-संभावनारोपणादिबलादेव च अस्याप्रकाशरूपत्वं विघटेट, करण में भासता हुआ, संविद्रूप में बैठा हुआ शब्दनास्वरूप अभिलाप वाणी शब्द से कहा गया है अपने अध्यास से वही यह है-इस सम्बन्ध से यदि वचन = वाणी का स्वरूप है तो क्यों नहीं विकल्प होगा ? उत्तर देते हैं-इसका विकल्परूप नहीं है, क्योंकि अनेकरूप से अनेक प्रकार की कल्पना और शङ्का से युक्त कल्पना मान लेने पर दूसरे से व्यवच्छेद करना विकल्प कहलाता है, और विविधता क्या वस्तु है ? उसे कहते हैं-अग्नि में यह अग्नि नहीं है, इस सन्देह को दूर कर देने पर वह्नि-अवह्निरूप द्वित्व को आक्षेप करना और उस हेतु से विकल्प में द्वित्वरूप का निश्चय करना होगा । इससे क्या जोड़ेंगे और क्या विभक्त करेंगे एवं क्या हटायेंगे और क्या शङ्का करेंगे-यही कहना पड़ेगा । विकल्प में द्वित्व का समर्थन करता है ॥ १ ॥ जब घट और घट से भिन्न इन दो भिन्न पदार्थों का अवभास होता है। तब प्रकाश के जैसा अन्य भेद करनेवाले पदार्थ का अवभासन नहीं होता है ॥ २ ॥ जबकि घट के दर्शन होने पर उसी की जगह घट से भिन्न योग्य देश के अभिमत स्थान को आक्रमण करनेवाला विज्ञानजनक अपने कारण से प्राप्त किया गया पटादि स्वभावक आलोक भी सम्भव रहता है, इसलिए घट और अघट दोनों के अवभास की सम्भावना घट में घटभिन्न के आरोप की सम्भावना उपस्थित हो जाती है, घट से भिन्न का आरोप होने पर निषेधरूप अपोहन व्यापार होता है इस प्रकार अपोहन व्यापार से अनुप्राणित होकर घट की विकल्परूपता का निश्चय हो जाता है, 'स्यात्' इस वाक्य में जो 'लिङ्' लकार किया है वह सम्भावना अर्थ में है । किन्तु जिसको आप प्रकाश करते हैं उसके स्थान पर जिसकी सम्भावना की जाती है, वह अप्रकाश नहीं हो सकता; क्योंकि समान स्वरूपवाले की ही सम्भावना होती है, प्रकाश जिस कार्य को करता है वह अप्रकाश भी करे ऐसा कहीं देखा गया है ? सम्भावना के आरोपण के बल से ही इस अप्रकाश का विघटन हो सकता है, इसलिए प्रकाश के तुल्य अप्रकाशरूप उसी के सदृश