भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१२६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-३ अतः प्रकाशनुल्यस्यान्यस्य। प्रकाशरूपस्य भेदिनस्तत्तुल्यकक्ष्यस्यापोहनात्मकभेदनव्यापारासहिष्णो- रवभासनमेव नास्ति, तदभावे कस्यापोहनम् ? अवभाससंभवेऽपि प्रकाशरूपत्वमेव । न च प्रका- शस्य स्वरूपदेशकालभेदो—येन द्वितीयः प्रकाश कस्मादपोद्यतेति, हीति—यस्मात् एवं, ततो द्वयाभावादपोहासंभवे विकल्परूपत्वाभावात् चिन्मात्रे परामर्शात्मनि अहमिति प्रत्यवमर्श एव, न तु विकल्पः ॥ २ ॥ ननु घटे परिनिष्ठितरूपे दृष्टे तद्दर्शनमुपजीवता विकल्पेन कथमघटस्य निषेधनं क्रियते, न ह्यघटस्य केनचिन्नामापि गृहीतम्, अघटवासनापि घंटे दृष्टे कथंकारं प्रबुध्यताम् ? सत्यम्—एवं शाक्यः पर्यनुयोज्यो, न सु वयम्, यतः — तदतत्प्रतिभाभाजा मात्रैवातद्व्यपोहनात् । तन्निश्चयनमुक्तो हि विकल्पो घट इत्ययम् ॥ ३ ॥ इह प्रमाता नाम प्रमाणादतिरिक्तः प्रमासु स्वतन्त्रः संयोजनवियोजनाद्याधारवशात् कर्ता दर्शितः, तस्य च प्रमातुरन्तः सर्वार्थावभासः, चिन्मात्रशरीरोऽपि तत्सामानाधिकरण्यवृत्तिरपि दर्पणनगरन्यायेनास्ति—इत्यपि उक्तम् । एवं च तत्प्रतिभां घटाभासम्, अतत्प्रतिभां च अघटाभासं प्रमाता भजते—सेवते तावत्, तद्विकल्पदशायां चित्स्वभावोऽसौ घटः चिद्देव विश्वशरीरः पूर्णः, भेद करनेवाला अपोहनरूप भेदन व्यापार को नहीं सहनेवाले का अवभासन नहीं होता है, उसके अभाव में किस का अपोहन होगा ? अवभास की सम्भावना होने पर भी प्रकाशरूपता ही रहती है और प्रकाश के स्वरूप में कोई देश-काल का भेद नहीं रहता है जिससे दूसरा प्रकाश एक से हटाया जा सके, ‘हि’ शब्द का अर्थ है कि जिससे ऐसा हो रहा है इसी कारण द्वित्व के अभाव से अपोहन की असम्भावना में विकल्परूप के अभाव से चिन्मात्र परामर्श में ‘अहम्’ यही परामर्श होता है, विकल्परूप से नहीं होता ॥ २ ॥ अब शङ्का करते हैं कि परिनिष्ठित, संकुचितरूप निर्विकल्प घट दशा के देखने पर उसके उपजीवित विकल्प के दर्शन से घट से भिन्न की निषेधता किस प्रकार करते हैं किसी ने अघट का नाम भी तो नहीं लिया है, घट से भिन्न की वासना के देखने पर कैसे प्रबुद्ध होगी ? ठीक है—इस विषय में बौद्धलोगों से ही पूछना चाहिए; हमसे मत प्रश्न करो, क्योंकि— उसकी प्रतिभा को नहीं प्राप्त करनेवाले, प्रमाता के द्वारा ही उससे भिन्न को ओझल कर देने पर उससे निश्चय छूटा हुआ ‘घटोऽयम्’ ऐसा कहना ही विकल्प है ॥ ३ ॥ यहाँ पर प्रमाण से अतिरिक्त विषयों में जो स्वतन्त्र रहता है उसी को प्रमाता शब्द से कहा जाता है जो कि संयोजन-वियोजनादि के आधारभूत होने से कर्ता भी कहा गया है और उस प्रमाता के भीतर सम्पूर्ण अर्थ का अवभास होता रहता है, चेतन शरीरवाला होता हुआ भी दर्पण में प्रतिबिम्बित होनेवाली नगरी के समान चेतन आत्मा में सभी पदार्थ प्रतिबिम्बित रहते हैं—इस विषय में विचार हो गया है और ऐसी परिस्थिति में उसकी प्रतिभा घटाभास है और जिसमें उसकी प्रतिभा नहीं है उस अघटाभास को प्रमाता प्राप्त करता है अर्थात् घटाभास और घट से भिन्न पटादि के आभास को प्रमाता प्राप्त कर लेता है, आभास की अविकल्प दशा में १. सदृश आदि की वासना ही कारण होती है ।