ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२७ न च तेन केचिद्व्यवहाराः, तत् मायाव्यापारमुल्लासयन्पूर्णमपि खण्डयति भावं, तेनाघटस्यात्मनः पटादेश्चापोहनं क्रियते निषेधनरूपं, तदेव व्यपोहनमाश्रित्य तस्य घटस्य निश्चयनमुच्यते ‘घट एव’ इति—एवार्थस्य संभाव्यमानापरवस्तुनिषेधरूपत्वात्, एष एव परितश्छेदात्तत्क्षणकल्पात् परिच्छेदः, हीति—यत एवं, तस्मात् युक्तं ‘द्वयापेक्षी विकल्प’ इति पूर्वश्लोकोक्ते वस्तुद्वये श्लोकद्वयेन हेतू क्रमेणोक्तौ, यस्मादेवं विकल्पः ततोऽहमिति शुद्धो विमर्शः न विकल्पः—इति श्लोकत्रयेण महा- वाक्यार्थः । शाक्यैरपि प्रमातुरेवायं व्यापार उक्तः ‘एकप्रत्यवमर्शाख्य’ इत्यत्र ‘प्रपत्तेति स्वयमिति’ च वदद्भिः, स त्वेतैः कथं समर्थ्यः—इत्यास्तामेतत् ॥ ३ ॥ नन्वेवमहमित्यपि प्रत्यवमर्शोऽनहंरूपस्य घटादेः प्रतियोगिनोऽपोहनीयस्यापोहे विकल्परूपता कथं न स्यात् ? इत्याशयेनाह— चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः । देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ ४ ॥ प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् । विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ ५ ॥ चित्स्वभाववाले चिदात्मा के जैसा विश्वशरीरूप होता हुआ भी पूर्ण रूप में रहता है और उसके विकल्परूप होने के कारण कोई भी व्यवहार नहीं होते हैं इसी कारण मायाव्यापार को उद्बुद्ध करते हुए विश्वशरीर भी प्रमाता पदार्थ को खण्डित कर देते हैं, अघट का जो स्वरूप पटादि है उसका अपोहन अर्थात् निषेध कर देना, उसी निषेधरूप पट को आश्रय करके घट का ‘घट एव’ शब्द से निश्चयन कहा जाता है। यही अपट वस्तु का निषेधरूप होने से ‘एवं’ अर्थ की सम्भाव्यमानता कही जाती है, चारों तरफ से हटा देने के कारण परिच्छेद कहा जाता है, ‘हि’ शब्द हेतु अर्थ में है, इसलिए पूर्व श्लोक से प्रत्यवमर्श विकल्परूप में कहा गया है ‘द्वयापेक्षी विकल्पः’ दो वस्तुओं की अपेक्षा रखनेवाला विकल्प होता है। दो श्लोकों के क्रम से दो हेतु कहे गये हैं, क्योंकि ऐसा विकल्प है इसलिए अहं यह विमर्श है, विकल्प नहीं है—तीन श्लोकों से महावाक्यार्थ लक्षित होता है। बौद्धों द्वारा भी यही कहा गया है कि यह प्रमाता का ही व्यवहार है ‘एकप्रत्यवमर्शाख्यः’ [ एक प्रत्यवमर्शाख्ये ज्ञाने एकत्र हि स्थितः । प्रपत्ता तदतद्धेतून् भावान् विभजते स्वयम् ॥ आचार्य धर्म कीर्ति का कथन है कि “एक परामर्श संज्ञक ज्ञान में एक जगह ही स्थित हुआ प्रमाता उस हेतु के और उससे भिन्न पदार्थ भावों को स्वयं विभक्त करता है।” ] उसका ये लोग कैसे समर्थन करेंगे इसलिए इसे छोड़ दो, अप्रासङ्गिक है ॥ ३ ॥ अब शंका करते हैं कि अहं इस परामर्श में अनहंरूप घटादि प्रतियोगिरूप अपोहनीय है इसके अपोहन में विकल्परूपता क्यों नहीं होगी ? इस अभिप्राय से कहते हैं— माया-शक्ति के द्वारा चित्तत्त्व को छिपा करके जो भिन्न-भिन्न रूपों से देह, बुद्धि और प्राण में आकाश के समान कल्पित होते हैं ॥ ४ ॥ ऐसा होने पर दूसरों को हटाने के कारण प्रमातारूप से अहं यह विमर्श अन्यप्रति रोगी के अवभास से उत्पन्न हुआ विकल्प ही है ॥ ५ ॥