भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१२८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५ अहंत्यवमर्शो द्विधा—शुद्धो मायोयश्च, तत्र शुद्धो यः संविन्मात्रे विश्वाभिन्ने विश्रवच्छा- याच्छुरितस्वच्छात्मनि वा। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ। तत्र शुद्धेऽहं-प्रत्यवमर्शे प्रतियोगी न कश्चिदपोहितव्यः संभवति—घटादेरपि प्रकाशसारत्वेनाप्रतियोगित्वेनानपोह्यत्वात्, इत्यपोह्यात्वा- भावे कथं तत्र विकल्परूपता। अशुद्धस्तु वेद्यरूपे शरीरादौ अन्यस्माद् देहादेर्घटादेश्च व्यवच्छेदेन भवन् विकल्प एव-इति वाक्यार्थः। अक्षरार्थस्तु—चित्तत्त्वं प्रकाशमात्ररूपं हित्वा सदप्यपहस्तनया अप्रधानीकृत्य भिन्ने देहादावहमेव देहादिः नीलादौ प्रमेये प्रमाता—इत्यभिमानेन 'योऽहं स्थूल' इत्यादिविमर्शः स विकल्प एव, न तु शुद्धं प्रत्यवमर्शमात्रम्। अत्र हेतुः —परो द्वितीयो देहादि- र्घटादिश्च यः प्रतियोगी तुल्यकक्षयोऽन्योन्यपरिहाराच्च विरुद्धस्तस्य योऽवभासः – समारोपणलक्षणः, तस्माद्यतोऽसौ तन्निषेधानुप्रणितोऽहमित्यवमर्शो जातः 'अहं स्थूलो, न कृशो, न घटादिः' इति शुद्धप्रकाशरूपस्य अपहस्तनमेव देहादेर्भेद हेतुः, तदपहस्तने तु परमेश्वरस्य स्वात्मप्रच्छादनेच्छारू- पाभेदाप्रकाशनं भ्रान्तिरूपं प्रति स्वातन्त्र्यरूपाम शक्तिर्हेतुः, चिद्रूपस्य चापहस्तनं देहादेरेव अत्यक्तवेद्यभावस्य भिन्नस्यैव उपपत्तिशून्यतयैव प्रमोतृताभिमानः। अहम् विमर्श दो प्रकार का है—एक तो शुद्ध है दूसरा मायीय है, इसमें शुद्ध विमर्श यह है कि जिस ज्ञानरूप चिन्मात्र में अभिन्न एकरूप से सारा विश्व प्रतिफलित होता है अथवा स्वच्छ सदाशिव चिदात्मा की दशा में झलकता रहता है। अशुद्ध मायीय विमर्श वेद्यरूप शरीरादि में रहता है। जो शुद्ध अहम् विमर्श है उसमें तो कुछ हटाने योग्य नहीं रहता है और घटादि के प्रतियोगी न होने से कोई अपोह्य का विषय भी नहीं रहता, जब अपोह्य ही नहीं रहेगा तो विकल्परूपता कैसे बनेगी ? किन्तु अशुद्ध मायीय वेद्यरूप देहादि में तो परस्पर एक दूसरे से भिन्न होने के कारण विकल्पता बनी ही रहती है। यह तो वाक्यार्थ हुआ अब अक्षरार्थ बतलाते हैं—जो प्रकाश मात्ररूप चित्तत्त्व है उसे छोड़कर प्राणादि पुर्यष्टक में रखता हुआ अपने को अप्रधान बनाकर अपने से भिन्न देह, बुद्धि और प्राणादि में, 'मैं' ही देहादि एवं नीलादि विषय का प्रमाता हूँ इस प्रकार अभिमान करता हुआ, स्थूलरूप में मेरा ही रूप है, इस प्रकार का विमर्श ही विकल्प कहलाता है, शुद्ध परामर्श में ऐसा नहीं होता है। क्यों नहीं है ? इसमें हेतु बताते हैं—दूसरा देहादि एवं घटादि बराबर के प्रतियोगी आपस में एक-दूसरे का परिहार करने से विरुद्ध है उसका जो अवभास समारोपरूप है, उससे जो भिन्न निषेध करनेवाला अहंविमर्श उत्पन्न होता है। जिसका शुद्ध स्वरूप है कि मैं स्थूल हूँ, मैं कृश नहीं हूँ, मैं घटादि भी नहीं हूँ इत्यादि, शुद्ध प्रकाशरूप का हटा देना ही देहादि के भेद में हेतु है, उससे हटा देने में तो अपने स्वरूप को छिपाने की इच्छा होने से अभेद का प्रकाशन नहीं करने देने में भ्रान्ति- वाले पदार्थों के विषय में तो भगवान् की अपनी स्वातन्त्र्यरूप माया-शक्ति ही मुख्य कारण है, चिद्रूप को छिपाना एवं देहादि अत्यक्त वेद्यभाव के भिन्न को उपपत्ति की शून्यतारूप से प्रमातृता का अभिमान करना है। १. देहादि की वासना की अपेक्षा से प्राण श्रेष्ठ होता है, संकल्प-विकल्प करना अन्तःकरण का धर्म है, जिसके अनुग्रह से चित्तत्व की प्राप्ति हो जाती है, उसका प्राण अधिष्ठेय बन जाता है, उसी प्रकार संविततत्त्व अधिष्ठित प्राण के द्वारा बुद्धिरूप पुर्यष्टक के सहारे शरीर अधिष्ठित रहता है। इसलिए चेतना स्वातन्त्र्य-शक्ति ही इसकी अधिष्ठातृ है, इस विषय में कहा भी है—