भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

अ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १२९ तथा च—देहाभिमानभूमिकायां स्थिताश्चार्वाकाः ‘चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' इति कायमेव प्राधान्येनाहुः—स्त्रीबालमूर्खाणां तथाभिमानात् । ततोऽपि विवेकवन्तः पाकजोत्पत्ति- परिणामादिबलादस्थिरं शरीरं मन्वानाः प्राणशक्तिसमधिष्ठानेन च विना विकारशतावशं जैसा कि—चार्वाकादि नास्तिक लोग देहाभिमान भूमिका में रहते हैं। अलग-अलग मदिरा सम्बन्धी द्रव्य जबतक एक दूसरे से नहीं मिलते हैं तबतक उसमें मद-शक्ति नहीं आती है मिलते ही मदिरा में मद-शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार अलग-अलग भूत चैतन्य से रहित हैं वे जब आपस में एक दूसरे से मिल जाते हैं तब स्वाभाविक उसमें हलन-चलन करने की शक्ति आ जाती है, इसलिए चैतन्य की कल्पना केवल भ्रान्ति ही है। 'चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः' यही चार्वाकों का सिद्धान्त है। शरीर को ही प्रधानता देते हैं। स्त्री, बालक और मूर्ख लोगों का भी वैसा ही अभिमान होता है। कुछ वेदान्ती लोग शरीर का उत्पन्न होना, बढ़ना-घटना एवं विनष्ट हो जानेवाले दोषों से शरीर का अस्थिर मानते हुए तथा प्राण-शक्ति के न रहने के प्रकाशरूपो भगवान्प्राणाधिष्ठान उच्यते । प्राण एवाधरो धर्मो हंसश्चेति त्रिवाहनः ॥ भगवान् प्रकाशात्मा ही प्राण का अधिष्ठान है—ऐसा कहा जाता है। अधिष्ठान का अधिष्ठेय प्राण ही आत्मा का धर्म है अर्थात् अधिष्ठान और अधिष्ठेय तथा इन दोनों का जो ज्ञान है वही त्रिवाहन है। अत एव गीता में भी भगवान् ने इसका उल्लेख किया है— शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ जैसे वायु सूक्ष्म गन्ध के परमाणु-रेणुको गन्ध के स्थान से ग्रहण कर ले जाता है, उसी प्रकार शरीर धारियों का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर को पहले त्यागता है, उससे मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके दूसरे नये शरीर में ले जाता है। संविद्रूप ईश्वर प्राण-पुर्यष्टक के अधिष्ठान द्वारा शरीर को धारण किये रखते हैं—यह बात स्पन्दशास्त्र में भी श्री गुरुवर्यने कही है— यतः करणवर्गोऽयं विमूढोऽमूढवत्स्वयम् । .......................................प्रवृत्तिस्थितिसंहृतीः ॥ लभते...............................................। इत्यत्र संहान्तरेण चक्रेणेति............................। जिसके सामर्थ्य बल से ही, अनन्त-शक्ति चक्र के साथ-साथ उस बाह्य जड इन्द्रियों को भी चेतन की जैसी शक्ति सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है जिससे स्वतन्त्र होकर सृष्टि, स्थिति और संहारादि करने में प्रवृत्त होते हैं। इसलिए उस तत्त्व को जानने के लिए योगी को यत्न करना चाहिए। क्योंकि उसकी यह अकृत्रिम स्वभाववाली स्वतन्त्रता रोम-रोम में भरी हुई है। इसलिए देहाभाव के भस्मीभूत हो जानेपर, स्वप्न अवस्था को जैसा निद्रा में डुबे हुए मोह- आवरण की स्थिति रहने पर भी चेतन में अधिष्ठित प्राण को अपनी गोद में रखनेवाले पुर्यष्टक की वैसी स्थिति परलोक में भी रहती है। फिर दूसरे देह के अधिष्ठान से भोगों को भोगने में कोई १७