भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१३० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-४-५ शरीरस्य पश्यन्तो बुभुक्षापिपासायोगयोग्यं प्राणमेवात्मानं केचन श्रुत्यन्तविदो मन्यन्ते । ततोऽपि समधिकविवेकभाजः प्राणस्यापि अनित्यत्वादनुसंधानयोग्यतामपश्यन्तो ज्ञानसुखाद्याश्रयभूतां बुद्धिमेव काणादप्रभृतय आत्मानमाहुः । अपरे तु तस्या अपि योगिदशायां वेद्यभावादपरत्वं मन्यमानाः असंवेद्यपर्वरूपं यन्न किंचिद्रूपं सकलवेद्यराशिविनिर्मुक्तं शून्यत्वान्नाभस्तुल्यं न तु महाभूताकाशस्वभावं प्रमातृतत्त्वं शून्यब्रह्मवादिनः सांख्यप्रभृतय आहुः । तस्मिन्नपि वेद्ये शून्यान्तरं तत्रापि शून्यान्तरम्—इति यावद्द्वैदः तावत्कल्पना न त्रुट्यति, तदर्थमाह ‘कल्पिते’ इति । न चानवस्था परमार्थप्रकाशबलेन यतः सर्वस्य प्रकाशो न तु देहादिवशात्, तथात्वा- कारण असंख्य प्रकार से शरीर का विनाश देखते हुए प्राण को ही बुभुक्षा-पिपासा से सम्बन्धि होने से आत्मा मानते हैं । उससे भी अधिक विचार-विमर्श करनेवाले प्राण को भी अनित्य समझकर अनु- सन्धान की योग्यता न देखते हुए ज्ञान-सुखादि के आश्रयभूत बुद्धि को ही काणादादि लोग आत्मा समझते हैं । दूसरे सांख्य सिद्धान्ती उसको भी योगी दशा में वेद्यरूप न होने के कारण असंवेद्य ग्रन्थिरूप जिसका कि कोई स्वरूप नहीं है; सम्पूर्ण वेद्यराशि से भिन्न होने के कारण महाभूत जो आकाश है उसके बराबर नहीं, बल्कि शून्य ब्रह्म को प्रमाता मानते हैं । उस वेद्य में भी शून्यता एवं उसमें दूसरी शून्यता, इस प्रकार कभी भी समाप्ति नहीं होती है, इसलिए कहा है कि ‘कल्पिते’ कल्पना करने पर इत्यादि । वहाँ अनवस्था भी नहीं होती है; क्योंकि परमार्थ प्रकाश के बल से सभी का प्रकाश होता है वहाँ पर देहादि की कल्पना नहीं होती है, देहादि को प्रमाता मानना दुस्तरता नहीं पड़ती और बहुत प्रकार से देखा भी जाता है कि योगिनी अपने ही शरीररूप गृह में अवस्थित होकर स्वतन्त्ररूप से, प्राण को भेजना और वापस बुला लेनारूप क्रिया से दूसरे शरीर में जाकर वस्तु का ज्ञान प्राप्त कर लेती है, और स्वतन्त्रीकरण में हमने युक्तियों को बता ही दिया है । जिसका उल्लेख शिवसूत्र के माध्यम से हुआ है— ब्रह्मपदे कमलशरीरस्तदुत्थप्राणिरूपेण सर्वत्र विचारी । ब्रह्मपद में जो कमल शरीर है उससे उठकर प्राणी सर्वत्र विचरण करता है सर्वथा देह और प्राण की तो स्थिति भिन्न-भिन्न ही है । इस विषय में मुनि ने कहा है । सहवर्धितयोर्नास्ति सम्बन्धः प्राण काययोः । इति एक साथ में संवर्धित होनेवाले देह और प्राण का कोई सम्बन्ध ही नहीं बैठता है । सम्बन्ध तो उसी का नाम है जो अत्यन्त अवियोग रखता हो । उसी प्रकार कक्ष्या स्तोत्र कहता है— भग्नो भ्रमोऽयं भवता विचित्रां स्वप्ने विदेहादिगतिं प्रदर्श्य । देहे गते भस्ममये परत्र कीदृक्........................ ॥ इति विचित्र देहादि नश्वर वस्तुओं की गति-स्थिति है उसे आपने स्वप्न अवस्था में बताकर मेरे भ्रम को दूर कर दिया, देह के भस्मीभूत हो जाने पर दूसरे में कैसा होगा ।