ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-६, का.-४-५ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३१ भिमानमात्रं—देहादिः प्रमातेति, संकोचमात्ररूपं चित्तत्त्वं शून्यं भूतलं, यथा घटाभावः, संकोचः- अपरवेद्यांशच्छायाच्छुरितं तु चित्तत्त्वमेव बुद्धिप्राणदेहादि इति । अमी एव भूमिकाविशेषा उत्तरोत्तरमारोहतां योगिनां जाग्रदादितया पिण्डस्थादितया चागमेषु भण्यन्ते, अपहस्तनं च व्याख्यास्यते 'कलोद्वलितमेतच्च चित्तत्त्वं कर्तृतामयम् । अचिद्रूपस्य शून्यादेर्मितं गुणतया स्थितम् ।।' इति, तत्स्थितम्—अशुद्धः 'अहम्' इत्यवमर्शो विकल्प एव ।। ४-५ ।। अभिमान मात्र है, संकोचमात्र चिदात्मरूप तो शून्य भूतल है। जैसे घट का अभाव भूतलरूप होता है, दूसरे वेद्य अंश की छाया से मिलता हुआ चित्तत्त्व ही तो बुद्धि, प्राण, देहादि है। यही भूमिका विशेष ऊपर-ऊपर चढनेवाले योगी लोगों के जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्था होने से पिण्ड शरीर में रहने के कारण भी आगमों में कहा गया है, अब अभाव की व्याख्या करते हैं—'चेतन- रूपी कला से उद्बुद्ध चित्तत्त्व कर्तृता से युक्त होकर अचिद्रूपशून्यादि के गुणरूप से परिमित परिच्छिन्नभाव को प्राप्त करके रहता है।' इससे यह सिद्ध हुआ कि अशुद्ध अहंविमर्श विकल्प ही रहता है ॥ ५ ॥ १. शनैःशनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ क्रम-क्रम से अभ्यासयोग करता हुआ उपरामता को प्राप्त करें तथा धैर्य युक्त बुद्धि द्वारा मन को स्वरूप आत्मा में स्थिर करके परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ भी चिन्तन न करे। 'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत् ।' तब तक अभाव को ही देखे जब तक तन्मयता को न प्राप्त होवे और भी 'यद्यत्संवेद्यते किंचिन्न च तद्रूपमिष्यते । जो-जो जानता है उसमें तो थोड़ा सा भी इसका स्वरूप नहीं है। २. आगमशास्त्र में आचार्य अभिनवगुप्त ने जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्तादि अवस्थाओं के उल्लेख किये हैं। इन चारों अवस्थाओं का पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत शब्दों से योगीलोग व्यवहार करते हैं— भूततत्त्वाभिधानानां योंऽशोऽधिष्ठेय उच्यते । पिण्डस्थ इति तं प्राहुः पदस्थमपरं विदुः ॥ मन्त्रास्तत्पतयः सैषारूपस्थमिति कीर्त्यते । रूपातीता पराशक्तिः स व्यापाराप्यनामया ॥ निष्प्रपञ्चो निराभासः शुद्धः स्वात्मन्यवस्थितः । सर्वातीतो शिवो ज्ञेयो यं विदित्वा विमुच्यते ॥ इति पिण्डे मुक्ताः पदेः मुक्ता रूपे मुक्ताः षडानन । रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्ता नात्र संशयः ॥ इति तत्त्वसंग्रहे । पिण्डं कुण्डलिनी शक्तिः पदं हंसः प्रकीर्तितः । रूपं चिद्विन्दुरित्युक्तो रूपातीततः परः शिवः ॥ भूत तत्त्व के अभिधानों में जो अंश अधिष्ठेय कहा जाता है उसे कोई लोग पिण्ड कहते हैं । अन्य को पद शब्द से समझते हैं । मन्त्र, मन्त्रेश्वर और मन्त्र महेश्वर को रूप शब्द से कहा जाता है । जो परा-शक्ति है वह तो विमर्श व्यापार क्रिया का सम्पादन करती हुई भी अनामय संविद्रूप ही रहती है इसलिए परा-शक्ति रूपातीता कही जाती है। अपने आप में अवस्थित रहनेवाले जो शुद्ध, निराभास, निष्प्रपञ्च सब से अतीत शिवरूप ज्ञेय है, उसे जानकर विमुक्त हो जाते हैं ।