भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१३२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-६ द्विविधोऽपि चायम् 'अहं-प्रत्ययो' द्विधा—अनुभवमात्ररूपश्चानुसंधानात्मा च, शिवात्मनि 'अहमिति' सदाशिवात्मनि 'अहमिदमिति' शुद्धो द्विधा। अशुद्धोऽपि 'अहं स्थूल' इति, योऽहं स्थूलोऽभवं, सोऽहं कृशो, बालो, युवा, स्थविरः, स एव 'अहम्' इति च अशुद्धो द्विविधः। तत्र शुद्धे विकल्परूपत्वमप्रतिष्ठमेव इत्युक्तम्, अशुद्धे तु अनुभवरूपे विकल्पत्वमुपपादितम्, अशुद्धेऽपि तु अनुसंधानात्मकतया अभेदस्य प्रस्फुरणात् कश्चिदविकल्पकत्वं शङ्केत तस्य व्यामोहं व्यपोहयितुमाह— कादाचित्कावभासे या पूर्वाभासादियोजना। संस्कारात्कल्पना प्रोक्ता सापि भिन्नावभासिनी ॥ ६ ॥ देह इत्यादि वर्तते, कादाचित्कः कदाचिद्भवोऽनियतदेशकालाकारोऽवभासो यस्य देहादेः स्वलक्षणरूपस्य, तत्र या पूर्वाभासेन बालादि-शरीरावभासेन योजना 'योऽहं बालः' स एवाद्य 'युवा' इत्यनुसंधानम्, आदिग्रहणादुत्तरेण भाविना आभासेन सह योजना 'स्थविरो भवितास्मि' शुद्ध और अशुद्धरूप से यह अहंप्रत्यय दो प्रकार का है—एक अनुभवमात्ररूप से है दूसरा अनुसन्धानरूप से है, अनुभव स्वभाववाला तो शिवरूप में 'अहं' इस प्रकार से रहता है और सदाशिवरूप [ अनुसन्धिरूप ] में 'अहमिदम्' मैं यह हूँ इस रूप से रहता है, इस प्रकार 'अहम्' और 'अहमिदम्' के भेद से दो प्रकार के शुद्ध अहंप्रत्यय हुए। 'अहं स्थूलः' मैं स्थूल हूँ, इस अनुभव स्वभाववाले प्रत्यय में तो अशुद्ध रहता है, जो मैं स्थूल था, वही मैं कृश हो रहा हूँ, मैं बालक हूँ, मैं युवक हूँ और मैं वृद्ध हूँ, वही मैं हूँ, ये ही दो प्रकार के अशुद्ध प्रत्यय होते हैं। शुद्ध अहं में विकल्परूपता अप्रतिष्ठित रहती है, यह हम कह आये हैं, किन्तु अशुद्ध अनुभवरूपवाले 'अहं स्थूलः' इत्यादि में विकल्परूपत्व को हमने सिद्ध कर बता दिया है, अशुद्ध में भी अनुसन्धान करने से अभेदभाव के जग जाने पर कोई अविकल्प की शङ्का कर सकता है, अतः उसके व्यामोह को दूर करने के लिए कहते हैं— जो अशुद्ध अहं की भावना में भी कभी अभेद अवभास हो जाने पर शुद्ध अहं की योजना लगा देना संस्कार से वह कल्पना कही जाती है, उसमें भी भेद रहता ही है ॥ ६ ॥ [ देहादि अनुभव से युक्त ही अहं विमर्श विकल्पमात्र नहीं है, किन्तु अनुसन्धिवाला भी विमर्श होता है, यह श्लोक में दिया गया 'अपि' शब्द द्योतित करता है ] देह इत्यादि यह पूर्वसूत्र की अनुवृत्ति आती है, कभी-कभी होनेवाला अनियत देश-काल के आकारवाला जो देहादि का अपना अनुभव है, उसमें जो पहले होनेवाला बालक आदि शरीर की मिलावट जैसा 'योऽहं बालः' मैं कभी बालक था, वही मैं आज 'युवा' युवावस्था में स्थित हूँ, ऐसा अनुसन्धान करता है और आदि शब्द से आगे होनेवाले आभास के साथ योजना कर लेना। जैसा कि 'स्थविरो भविताऽस्मि' मैं वृद्ध होऊँगा, ये सभी योजनाएँ विकल्परूप हैं, शुद्ध अहं हे षडानन ! जो लोग पिण्ड से, पद से और रूपातीत से मुक्त हैं, वे ही सचमुच मुक्त गिने जाते हैं इसमें सन्देह करने की कोई बात नहीं। तत्त्व संग्रह में भी कहा गया है—पिण्ड को कुण्डलिनी- शक्ति, पद को आत्मा और रूप को चेतन चिद्रूप-शक्ति कहा गया है तथा परम शिव रूपातीत है।