ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति सा योजना सर्वा कल्पना-विकल्प एव, न तु शुद्धः प्रत्यवमर्शः । अत्र देहादेर्विशेषणं हेतुत्वा- शयेन—यतो भिन्नावभासितत्वमेव देहादेस्तदानीमपि अविच्छिन्नं, यदि हि तस्य देहादेः सर्वतः पूर्णत्वम्—अवच्छेदहीनत्वं पश्यन् अनुसंधानम्—'अहमिदम्' इति विदध्यात् तदियं सदाशिवभूः केन विकल्पास्पदत्वेन भण्यते—द्यावता विच्छिन्ने एव सोऽनुसंधिः, भिन्ने हि कथमनुसंधानम् ? इति चेदाह 'संस्कारात्'—प्राक्तनानुभवकृतवासनाप्रबोधजस्मृतिवशात् इति यावत्, प्राणे बलाबल- वशादनुसंधिः, बुद्धौ ज्ञानसुखादितारतम्यात्, शून्ये वैतथ्यावैतथ्ययोगात्, अयमपि विकल्प एव, एवं 'स एवायं घट' इति घटाद्यनुसंधानेऽपि विकल्पत्वं मन्तव्यं, किन्तु एतासु अनुसंधानभूमिषु विद्या- शक्तिराधिक्येन अचिरद्युतिवदुद्दीप्यते इति तासां परमपदपरिशीलनप्रथमकल्पाभ्युपायत्वमभ्युपागमन् गुरवः ॥ ६ ॥
न च देहादीनां पूर्वपूर्वप्रमातृवेद्यता—येन प्रमातृप्रकाशे प्रमेयं न भाति तत्प्रकाशश्च न पूर्वप्रकाशं विना, सोऽपि न प्रमात्रन्तरप्रकाशं विना—इत्यनवस्था स्यात्, अपि तु विशुद्ध-प्रकाश एव विश्वस्य प्रकाश, इति निरूपयन् उक्तयुक्त्या सदैव सृष्ट्यादिशक्तिवियोगोऽपि भगवत उक्तो भवति, इति दर्शयति—
प्रत्यवमर्शरूप नहीं हैं। इसमें देहादि का विशेषण हेतुरूप आशय से कहा है—क्योंकि भिन्नरूप से अवभासित होनेवाले देहादि योजना के काल [ अनुसंधि ] में भी अविच्छिन्न पूर्णभाव से रहता है, यदि उन देहादि में सर्वतः अर्थात् परिपूर्णरूपता से [ चिद्रूपविश्रान्तत्व ] अविच्छेद शून्यत्व को देखते हुए 'अहमिदम्' का अनुसन्धान करना ही सदाशिव भूमि है, इसी कारण इसको विकल्प का आधार कहा जाता है—विच्छिन्न में ही 'योऽहं बालः' ऐसा अनुसन्धान होता है, इस प्रकार भिन्न में कैसे अनुसन्धान होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि—'संस्कारात्' संस्कार से अनु- सन्धान होता है पूर्वजन्म में किये हुए अनुभव के वासना-संस्कार बीज से उत्पन्न होनेवाली स्मृति के कारण अनुसन्धान तब तक ही होता रहेगा, प्राण में तो क्षुधा-पिपासादि के आभास से अनुसन्धान होता है और बुद्धि में ज्ञान सुखादि के तारतम्य से अनुसन्धान होगा, शून्य में मूर्च्छा-समाधि आदि के आभास से अनुसन्धान होता है, यह सब भी विकल्प ही है, इस प्रकार 'स एवायं घटः' घटादि के अनुसन्धान में भी विकल्परूपता माननी चाहिए ! किन्तु इन अनुसन्धान भूमिकाओं में विद्या-शक्ति अधिकतया विद्युत् के समान कुछ देर के लिए चमक उठती है, इन सभी योजनाओं को गुरुवर्यों ने परमपदरूपी भुवन पर चढ़ने के लिए प्रथम सोपान के रूप में माना है ॥ ६ ॥
बालपन, युवापन एवं वृद्धापन आदि में इन पूर्व-पूर्वं प्रमाताओं से देहादि का ज्ञान नहीं होता है जिससे कि प्रमाता का प्रकाश न होने से प्रमेय विषय नहीं भासता है, देहादि प्रमाता का प्रकाश पूर्व प्रमाता के प्रकाश बिना नहीं होता है, वह भी पूर्वतर-पूर्वतम् प्रकाश के बिना नहीं होता है इसीलिए अनवस्था हो जायेगी, अपितु विशुद्ध प्रकाश ही देहादि प्रमाता का प्रकाश है, यह निरूपण करते हुए कही हुई युक्ति के द्वारा सदैव व्यवहारदशा में भी भगवान् की सृष्टि आदि शक्ति से वियोग रहता है यह कहा गया है, इस विषय में कहते हैं—