ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-७ तदेवं व्यवहारेऽपि प्रभुर्देहादिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद्बहिः ॥ ७ ॥ यत् पूर्वं दर्शितं 'देहे बुद्धौ' इत्यादि तत् एवम् उपपद्यते, कथम् ? यदि व्यवहारे मायापदे देहप्राणादिमपि प्रभुरेव प्रकाशपरमार्थ इच्छया—मायाशक्तिरूपया, आविशन्—देहप्राणादि- प्राधान्येन स्वरूपं प्रदर्शयन्, अन्तः—संविन्मात्रे, भान्तम्—अहमित्येवंरूपम् अर्थौघम् इच्छयैव बहिः इदमिति भासयति तत एतदुपपद्यते, अन्यथा तु अनवस्था स्यात्, हेतौ लिङ्। अपि-शब्द एव-शब्दश्च भिन्नक्रमौ, यत् एतावत् उक्तं, तदिति—तस्मात् हेतोः, एवं जातं वक्ष्यमाणरूपम्, किं तत् ? यत् किल प्रभुः परस्परं व्यवहारकाले क्रेयविक्रेयप्रेक्षाव्याख्यादौ चैत्रमैत्रादिसंबन्धिनो देहप्राणादीन् एकतया तावति आभासे आविशन् अन्तर्भान्तमेव अनुज्झित्तन्तः-प्रकाशमेव सन्तं बहिः एकाभासतया भासयति ? इति संभाव्यते—इत्येतज्जातम्, [ इति संभावनायां लिङ् ], तेन तेन प्रमात्रा सह ऐक्यं सृज्यते, अन्येन प्रमात्रा ऐक्यं संह्रियते, घटादिमात्ररूपे स्थितिः क्रियते, इस प्रकार व्यवहार काल में भी ईश्वर देहादि अवस्थाओं में प्रवेश करते हुए अन्तःस्थित अर्थसमूह को ही अपनी इच्छा से बाहर की ओर भासित करते हैं ॥ ७ ॥ जिसको पूर्व में दिखा दिया है 'देहे बुद्धौ' अर्थात् देह, बुद्धि और प्राण इत्यादि प्रमातृरूप में अहं विमर्श किस युक्ति से सिद्ध होगा ? यदि मायोय जगत् के व्यवहार करने में देह, प्राणादि को भी प्रभु ही प्रकाश परमार्थ की इच्छा से अर्थात् जब माया-शक्ति से उसको प्रमाता के रूप में स्वीकार करता हुआ देह, प्राणादि की प्रधानता से अपना स्वरूप दिखाता हुआ अन्तःकरण में अवस्थित संवित् मात्र में भासित होता हुआ 'अहम्' इस परामर्शरूप में अर्थसमूह की इच्छा से बाहर 'इदम्' इस रूप से भासित करता है। इसीसे यह सिद्ध होता है, नहीं तो, प्रमातृगत वेद्यता में आवेश न करने पर अनवस्था दोष से ग्रस्त हो जायेगा। 'भासयेत्' इसमें हेतु के अर्थ में 'लिङ्' लकार है। 'अपि' शब्द और 'एव' शब्द का भिन्न क्रम है, इतना ही अपोहन का स्वरूप कह दिया, तदिति—इसलिए इस हेतु से, 'एव' शब्द का स्वरूप आगे कहेंगे, वह क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि प्रभु परस्पर क्रय-विक्रय, देखना-सुनना, व्याख्या करना आदि व्यवहारकाल में चैत्र-मैत्रादि सम्बन्धियों के एकरूप से उतने ही आभास में प्रवेश कराता हुआ, भीतर भासित होनेवाले को न छोड़ता हुआ बाहर में एकरूप से प्रकाशित होता है अर्थात् क्या बाहर एवं भीतर दोनों एकरूप होकर भासित हुआ करता है ? यह संभव है ऐसा सिद्ध हुआ [ इसलिए संभावना में लिङ् लकार है ] उस- उस प्रमाता के साथ में एकता का सर्जन करता है, दूसरे प्रमाता के साथ एकरूप में बाँध देता है, एवं घटादिरूप में स्थिति कर देता है, परिपूर्ण स्वरूप को बद्ध कर देने से तिरोभाव रख १. सृष्टि में परमेश्वर का यही परमार्थ है—परमेश्वर प्राण शरीरादि में कर्तृरूप से प्रवेश कर बाहरी पदार्थों को पराधीनता को जड सी सम्पादन करते हुए सर्गादि सृष्टि करते हैं, जब देह प्राणादि उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं तब विश्वरूप से सदैव अपने अंगरूप अर्थराशि को प्रकाशित करते हैं, उसमें कोई देशक्रम और कालक्रम भी नहीं है इसी से व्यवहार में 'मायापदे' ऐसा कहा गया है।