भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-६, का.-७] विमर्शिनीटीकोपेता [१३५ पूर्णस्वरूपनिमोलनात् तिरोभाव आधीयते, तावति आभासे ऐक्यावभासनपूर्णत्ववितरणात् अनुग्रहः क्रियते, तेन न केवलं महासृष्टिषु महास्थितिषु महाप्रलयेषु प्रकोपतिरोधानेषु दीक्षाज्ञानाद्यनु- ग्रहेषु भगवतः कृत्यपञ्चकयोगः यावत् सततमेव व्यवहारेऽपि । यदुक्तम् - सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासिने । सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः ॥' इति । 'प्रतिक्षणमविश्रान्तस्त्रैलोक्यं कल्पनाशतैः । कल्पयन्नपि कोऽप्येको निर्विकल्पो जयत्यजः ॥' इत्यादि च । तथा '.......प्राकाम्य- मात्मनि यदा प्रकटीकरोषि । व्यक्तीः...........॥' इति च ॥ ७ ॥ देता है, उतने आभास में ऐक्य अवभासन को परिपूर्णता कर देने के कारण अनुग्रह करता है, इसीसे केवल महासृष्टि में, महास्थिति में, महाप्रलय में, क्रोध के रोक देने में, दीक्षा ज्ञानादिरूप अनुग्रह करने में भगवान् के कृत्य पञ्चक का योग नहीं होता है, ऐसी बात नहीं है अपितु सर्वदा व्यवहार काल में भी होता है। जबकि आचार्य ने इस विषय में कहा है—सर्वदा विनोद के लिए ही मात्र सृष्टि करनेवाले, सदा सुख-आनन्द के लिए ही स्थिति-पालन करनेवाले और सदैव अपने स्वरूप में तीनों लोकों को लय करके परितृप्त हो जानेवाले ऐसे प्रत्यक्षरूप स्वामी को नमस्कार हो । सैकड़ों कल्पनाओं से तीनों लोकों की प्रतिक्षण-प्रतिपल कल्पना करते हुए भी, कोई एक अजन्मा निर्विकल्प की जय हो । तथा '...... प्राकाम्यमात्मनि यदा प्रकटीकरोषि ।' व्यक्तीः.........। [ स्वामी के भीतर ही ये भाव-पदार्थ रहते हैं वह प्रत्यक्ष घटित होता है, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में उनकी इच्छा से ही अन्तर में अवस्थित पदार्थ-राशि बाहर में भासित होती है-ऐसा कहा गया है ] ॥ ७ ॥ १. इस प्रकार स्वामी अपने में रहनेवाले अर्थ समूह का आभास करते हैं—ऐसा जो कहा गया है, उसीको घटाते हैं, सृष्टि काल में और व्यवहार काल में अपनी इच्छा से ही अपने में रहे हुए पदार्थ वर्ग को बाहर प्रकट करते हैं। जिसका विवेचन श्री सोमानन्दपाद ने किया है— कुत्सिते कुत्सितस्य स्यात्कथमुन्मुखतेति चेत् । रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ पञ्चप्रकारकृत्योक्तिश्शिवत्वान्निजकर्मणे । प्रवृत्तस्य निमित्तानामपरेषां क्व मार्गणम् ॥ चेतन वही है जो प्रसरणशील है रूप प्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभास- मान है और विश्व भी विथ्या या गर्हित नहीं है; क्योंकि ऊपर से नीचे अगल-बगल चारों ओर से ठसा-ठस शिवरूप ही भरा पड़ा है, सर्वत्र शिव की सत्ता होने के कारण इसके कुत्सित-गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। गर्हित तो उसी को कहते हैं जो भेद दृष्टि से शिवरूप में देखता है। भगवान् परमेश्वर के सर्ग, स्थिति, प्रलय, अनुग्रह और तिरोधान ये पाँच प्रकार के कृत्य हैं अपने निज तत्त्वादिरूप प्रसरणार्थ ही प्रसर होता है। उसमें दूसरे निमित्त कहाँ ढूँढोगे। किन्तु कोई तो कहते हैं कि 'ईश्वरः स्वातन्त्र्यवास-सर्वकामः' ये तो अपने में पूर्ण हैं फिर इनको सृष्ट्यादि से क्या फल मिलने- वाला है ? 'क्योंकि जो कोई भी कार्य में प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है वह कुछ न कुछ प्रयोजन को लेकर ही प्रवृत्त होता हुआ देखा जाता है।' प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते । अर्थात् मतिमूढ भी उद्देश्य को आगे रखकर ही कार्य में प्रवृत्त होता है। भगवान् में तो यह संभव नहीं होता। लोक अनुग्रहार्थ ही प्रवृत्त होते हैं।