ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-८ इह अन्तरर्थावभासः स्थित एव, तत् किं तत्र कारणान्तरचिन्तया इति प्रकृतं प्रमेयम्, तत्सिद्धये उपपत्तिः उक्ता, तेन विना इच्छारूपः प्रत्यवमर्शो न स्यात् इति, तत्प्रसङ्गात् प्रत्यवमर्श- विकल्पादिस্বরূপम् उपपादितम्, इति शिष्याणां धियं समाधातुं प्रकृतं प्रमेयम् उपपादयन् उपसंहरति— एवं स्मृतौ विकल्पे वाप्यपोह्नपरायणे । ज्ञाने वाप्यन्तराभासः स्थित एवेति निश्चितम् ॥ ८ ॥ प्रकाशात्मा परमेश्वर एव यतो देहादिप्रमातृताभिमानदशायामपि वस्तुतः प्रमाता, एवम् इति अतो हेतोः इदं सिद्धं भवति—स्मरणे अपोहनजीविते च विकल्पे अनुभवज्ञाने च अन्तराभासः प्रकाशविश्रान्तः स्थित एव, नात्र संशयः कश्चित्, यदि हि देहादिरेव परमार्थप्रमाता स्यात् तत् शरीरस्य प्राणस्य धियः शून्यस्य वा अन्तर्घटादि इति न किंचित् एतत्—घटादिपरि- हारेण देहादेः स्थितत्वात् । परमार्थप्रकाशस्तु सर्वसहः इति तत्रान्तर्विश्वम्, इति अनायास- सिद्धमेतत् ॥ ८ ॥ अपने स्वरूप में अर्थ का अवभास स्वसंवित् साक्षिरूप से रहता ही है, उसमें फिर दूसरे बाह्यार्थ वासना इत्यादि कारणों को खोजना व्यर्थ है । इसलिए प्रस्तुत प्रमेयरूप साध्य की सिद्धि के लिये युक्ति दे दी गई हैं, इसी कारण इच्छा के बिना प्रत्यवमर्श नहीं हो सकता है, भीतर अर्थ का अवभास अवश्य ही रहता है, इसका समर्थन के प्रसङ्ग से प्रत्यवमर्श के विकल्पादि स्वरूप को युक्ति द्वारा सिद्ध किया है; इस प्रकार शिष्यों की बुद्धि के समाधानार्थ भीतर अर्थों के अवभासतत्त्व का निगम रीति से उपपादन करते हुए उपसंहार करते हैं— इस तरह स्मृति और विकल्प में अथवा अपोहन प्रधान ज्ञान में या भीतर में भी पदार्थों का अवभास अवस्थित ही होता है—यह तो निश्चित है ॥ ८ ॥ जबकि देह, बुद्धि, प्राणादि प्रमातृगत अभिमान अवस्था में भी वस्तुतः प्रकाशात्मा परमेश्वर ही प्रमाता रहते हैं। इस हेतु से सिद्ध हो जाता है कि [ प्रकाशस्वरूप परमेश्वर ही सब का जीवन है ] स्मरण और अपोहन प्रधान विकल्प में अनुभव ज्ञान में, अन्तर में पदार्थों का अवभास प्रकाशरूप से ही रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं होता है, यदि देहादिरूप की सत्य- प्रमाता होता तो शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्यादि का अन्तःकरण में रहनेवाले घटादि पदार्थ किससे मेल करेगा, क्योंकि घटादि को छोड़कर देहादिरूपों में ही विद्यमान रहता है । परमार्थ प्रकाशरूप परमेश्वर तो सब कुछ रहनेवाले होते हैं इसलिए उनमें सारे विश्व की अन्तर्लीनता हो सकती है, यह बात तो अनायास ही सिद्ध है ॥ ८ ॥ १. उन दोनों का भी स्वरूप वैसा ही होने के कारण । क्योंकि अन्तःस्थित रहनेवाले का ही सर्वथा समर्थन करना होगा—उसके बिना बाहर में इच्छा-विमर्श नहीं हो सकता है और वह शुद्ध प्रकाश प्रमाता में अन्तर्लीनभाव हुए बिना थोड़ा सा भी नहीं घटता है । यद्यपि स्मृति इत्यादि देहादि प्रमाता के विषय हैं तथापि उन परमेश्वर-प्रकाश से ही प्रमातृरूपता होने के कारण उनमें ही तादात्म्यरूप से अवस्थित भाव-पदार्थ रहते हैं ।