भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-६, का.-९ ] विमर्शिनीटीकोपेत [ १३७ ननु अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनं यदि सर्वत्रास्ति कस्तर्हि स्मरणादौ आभासभेदः, न च असौ न संवेद्यते—स्फुटास्फुटतादिप्रस्फुरणस्य अनपह्ववनीयत्वात् ? इत्याशङ्क्याह— किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभासनात्मनि । पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ॥ ९ ॥ अनुभवज्ञानस्य ‘इदं नीलम्’ इति अन्तराभासं बहिराभासयतः सोऽन्तर्भावाभासो नैसर्गिको—निसृष्टेः स्वातन्त्र्यात् आयातो,न तु स्मरणादेरिव अन्यज्ञानकृतवासनादिबलात्, स्मरणे उत्प्रेक्षणे प्रत्यक्षपृष्ठभाविनि अध्यवसाये च योऽन्तर्नीलाद्यवभासो बाह्यतया अवभासयितव्यः नासौ स्वात्मकीयः अपि तु पूर्वानुभवसंस्कारजोऽसौ, तत्र संस्कारो नाम अनुभवस्य कालान्तरेऽपि अब प्रश्न किया जाता है कि यदि अन्तर में अवभासमान पदार्थ-समूह का सर्वत्र बाहर में आभास होता है, तो स्मरणादि में अन्तर के आभास का भेद कैसे होगा ? किन्तु यह [ भेद ] नहीं जाना जा सकता है यह बात नहीं है, अवश्य जाना जाता है—स्फुटरूप से अथवा अस्फुटरूप से इसका स्फुरण अवश्य कुछ न कुछ रहता है । इसको छिपा नहीं सकते हैं ? इस पर आशंका कर कहते हैं— बाहर की तरफ आभासमान होनेवाले ज्ञान में अन्तराभास स्वाभाविक रहता है । वह स्मरणादि में पूर्व के अनुभवरूप से रहता है ॥ ९ ॥ ‘इदं नीलम्’ यह नील है, वह निर्विकल्परूप अनुभवज्ञान का अन्तर में होनेवाला आभास है जोकि बाहर में भासित करता है वह आभास स्वाभाविक होता है, अपने अवभास से स्वतन्त्र होने के कारण आया हुआ रहता है; स्मरणादि के जैसा अन्य ज्ञान से किये गये वासनादि के बल से नहीं होता है, स्मरण, उत्प्रेक्षा, प्रत्यक्ष के अनन्तर अध्यवसाय में होनेवाले जो भीतर नीलादि का अवभास है वह बाह्यरूप से भासित होना चाहिए, वह अपना स्मरणकालीन नहीं है अपितु अनुभवपूर्वक है उसके संस्कार से उत्पन्न हुआ होता है, उसमें संस्कार क्या चीज है ? इसका समाधान करते हैं कि उसका आगे बने रहना यही संस्कार का स्वरूप है अर्थात् कालान्तर में भी उसका बना रहना ही संस्कार कहा जाता है वह जो आता हुआ अनुभव है १. यदि अन्तराभास पदार्थों का बाहर में आभासन ज्ञान, स्मृति और विकल्प में होता है तो कौन स्मरणादि में अन्तराभास का सर्वसाधारण भाव होने के कारण भेद विभाजन करेगा ? २. आभास भेद का स्फुरण ज्ञान में तो स्फुटरूप से रहता है और स्मृति आदि में अस्फुटरूप से रहता है । ३. क्योंकि दूरत्व और समीपत्व को लेकर प्रत्यक्ष के संस्कार से उत्पन्न होनेवाली दोनों स्मृति में भी पूर्व का अनुभूत ही अर्थ अन्तर में अवस्थित होकर संस्कार शब्द का वाच्य होता है इसीको क्षेत्रज्ञ अपनी इच्छा के द्वारा पूर्व काल से अवच्छिन्न करता हुआ मनोयोगपूर्वक देखता है इसमें कुछ अपूर्व सर्जन नहीं करता है । ४. पूर्व अनुभूत आभास का पृथक्-करण करना ही स्मृति का नया व्यापार नहीं है । किन्तु भिन्न किये हुए को ही अन्धकार से वह आवृत्त करने के बराबर है उसमें तो संस्काररूप से अवस्थित उस काल में भी रहता है । प्रतिबोधक अनुसन्धान दशामें आवरण के हट जाने से वही प्रकाशित होता है इसीका नाम अप्रमुषित [ न छोड़ना रूप है ] अत एव अनुभूत विषय का असंप्रमोष होना ही स्मृति है यह कुछ भी अपूर्व वस्तु की सृष्टि नहीं करती है अर्थात् इससे कोई अपूर्व पदार्थ का निर्माण नहीं होता है । १८