ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-६, का.-१० अनुवर्तमानता, अतोऽसावनुवर्तमानोऽनुभवो यतो नीलाद्याभाससंभिन्नः ततः तत्तादात्म्यापन्नं स्मरणाद्यपि तथा निर्भासते, तत एव स्मरणकालासम्भावी आभासः तदनुभवपूर्वककालकलित एव, इति स्वयं स्मरणादेर्निर्विषयत्वं गृहीतग्राहित्वं च उद्घोष्यते । एतदेव अस्फुटत्वम्, इति सिद्धोऽनु- भवस्मरणादौ आभासभेदः, अन्तराभासवर्गस्य बहिराभासनम् अव्यवधानेन स्फुटता, व्यवधानेन तु तात्कालिकत्वाभावात् अस्फुटता इति ॥ ९ ॥ ननु अनुभवज्ञानात् ऐन्द्रियकात् अन्यत् सर्वं ज्ञानं व्यवधानेन बहिराभासनरूपं प्राप्तम् ? इत्याशङ्क्य प्रविभागमाह— स नैसर्गिक एवास्ति विकल्पे स्वैरचारिणि । यथाभिमतसंस्थानाभासनाद्बुद्धिगोचरे ॥१०॥ यः प्रत्यक्षव्यापारम् अनुपजीवन् विक्षेपसारतया मनोराज्यसंकल्पादिविकल्पः स स्वैरं कृत्वा—स्वप्रेरणेन परप्रेरणनैरपेक्ष्येण स्वातन्त्र्येण चरति उदेति व्ययते च, तत्र यो बहिरवभासो नीलादेः अन्तराभासमग्रस्य स नैसर्गिक एव, तथाहि अपरिदृष्टपूर्वमपि श्वेतं दशनशतकलितकर- जिस कारण नीलादि आभास से भिन्न है इसलिए उस नीलादि से तादात्म्यभाव को प्राप्त स्मरणादि भी वैसा ही भासित होता है, इसी से स्मरणकाल में न होनेवाला स्मर्यमाण संस्कार से उत्पन्न आभास उसके पूर्वकालीन अनुभव से ही मिला रहता है, इसीलिए स्मरणादि का निर्विषयत्व और गृहीत-ग्राहित्व को ऊँचे स्वर से घोषित किया जाता है। इसीको अस्फुटत्व अर्थात् मन्दपना कहा जाता है, इसीलिए अनुभव-स्मरणादि में आभास भेद सिद्ध होता है, अन्तर के आभासवर्ग का बाहर में अव्यवधानरूप से स्फुटतापूर्वक भासना है, व्यवधान हो जाने पर तो उसके काल में न रहने के कारण अस्फुटता प्रकट होतो है ॥ ९ ॥ अब शंका करते हैं कि इन्द्रिय से उत्पन्न अनुभवरूप ज्ञान से भिन्न सब ज्ञान व्यवधान के कारण बाहर में अवभासरूप को प्राप्त करता है ? ऐसी आशंका कर स्मरण ज्ञान का और अनुभव ज्ञान का विभाग बताते हैं [ यदि कहो कि अव्यवधान से स्फुटता और व्यवधान से अस्फुटता तथा अनुभव से व्यतिरिक्त सब ज्ञान विकल्पादिरूप अस्फुटता के कारण हो आया हुआ है ? यह कहना सत्य है, किन्तु यह बात ऐसी है कि ‘किन्तु नैसर्गिको ज्ञाने बहिराभास- नात्मनि ।’ इससे ही सिद्ध है । पुनः उत्तरार्ध से बताते हैं ‘पूर्वानुभवरूपस्तु स्थितः स स्मरणादिषु ।’ पूर्वं का अनुभव ही तो स्मरणादि में स्थिर रहता है । ] जो अन्तर का आभास है वह किसी दूसरे की अपेक्षा न रखनेवाला स्वभावसिद्ध स्वैरचारी विकल्प में भी रहता है, जैसे बुद्धि से होनेवाले ज्ञान में अपने अभीष्ट ज्ञान का आभास होता है ॥ १० ॥ जो मनोराज्य संकल्पादि विकल्प है वह प्रत्यक्ष व्यापार का आधार लेकर मन के विक्षेप से दूसरे की प्रेरणा की आकांक्षा न रखता हुआ अपनी स्वतन्त्र प्रेरणा से चलाता है, उदित होता है और समाप्त होता है, उसमें जो बाहर की ओर नीलादि का आभास हो रहा है, वह अन्तर में होनेवाल स्वाभाविक ही आभास है, जैसा कि पूर्व में नहीं देखा हुआ भी असंख्य दाँतों-