ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ०-१, आ०-६, का०-११ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १३९ युगलयुक्तं दन्तिनम् अन्तः प्रमातृभूमौ स्थितं बहिः अन्तःकरणभूमौ स्वच्छधीदर्पणात्मिकायां स विकल्पः तात्कालिकमेव आभासयति ॥ १० ॥ अस्माच्च अन्तराभाससम्भवसमर्थनप्रसङ्गगतात् आभासभेदविचारात् शास्त्रे यत् प्रयोजनं मुख्यतया अभिसंहितं स्वात्मनि ईश्वरप्रत्यभिज्ञानरूपं तदधिकरणसिद्धान्तनीत्या अनायाससिद्धम्, इति दर्शयति— अत एव यथाभीष्टसमुल्लेखावभासनात् । ज्ञानक्रिये स्फुटे एव सिद्धे सर्वस्य जीवतः ॥११॥ यत् इदं यथाभीष्टस्य बहिरसत्त्वात् अननुभूतस्यापि सम्यक् उल्लेखनम्, अवभासनं च विकल्पस्य प्रसङ्गात् दर्शितम् अस्मादेव हेतोः इदमपि सिद्ध्यति—यः कश्चित् कीटो वा ब्रह्मा वाला और दो सूँड से युक्त हाथी को देखता है, इस प्रकार प्रमाता के अन्तर में विद्यमान था वही बाहर की ओर अन्तःकरण भूमि में आकर स्वच्छ बुद्धिरूपो दर्पण में प्रतिबिम्बित होकर विकल्प के रूप में उसी काल पर्यन्त भासित होता है ॥ १० ॥ यह अन्तर के आभास का समर्थन है उसी के प्रसङ्ग से आभासभेद के विचार से शास्त्र में जो मुख्यरूप से प्रयोजन कहा गया है वह अपनी आत्मा में ईश्वर प्रत्यभिज्ञारूप से अधिकरण सिद्धान्त की नीति के द्वारा अनायास ही सिद्ध हो जाता है, इसे बताते हैं— अन्तःस्थित आभास को ही बाहर की ओर निकालते हैं इसलिए सभी जीवों में ज्ञान और क्रिया स्पष्ट सिद्ध हो जाती हैं ॥ ११ ॥ यह अपने अभीष्ट के लिए बाहर में न रहने पर भी नहीं अनुभव हुए का भी सम्यक् उल्लेख करना और अवभासन विकल्प के प्रसंग से दिखाया गया है, इसी हेतु से यह भी सिद्ध होता है कि जो कोई कीट-पतंग, प्राणी अथवा ब्रह्मादि देव जब तक जीवित रहते हैं उनमें अवभासनरूप ज्ञान-शक्ति और उल्लेखनरूप क्रिया-शक्ति स्वाभाविक ही रहती हैं, इसीसे मनोराज्य, १. ईश्वर की पहचान शक्ति के द्वारा आविष्कार करने पर ही होती है और वह शक्ति ज्ञानरूप एवं क्रियारूप ही है । इस प्रकार ज्ञानरूप और क्रियारूप शक्ति से आविष्कार होने पर अपने स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा सिद्ध हो जाती है । जिस अर्थ के सिद्ध हो जाने पर उनके अनुयायी दूसरे अर्थों की भी सिद्धि हो जाती है, इसीको अधिकरण सिद्धान्त कहते हैं। जैसे कि न्याय दर्शनमें बताया है—'दर्शन स्पर्शनाभ्यामेकार्थ ग्रहणादिति ।' नेत्रेन्द्रिय से देखने एवं त्वगिन्द्रिय से स्पर्श करने से इन्द्रियों से भिन्न एक आत्मरूप पदार्थ का ज्ञान न होने के कारण । जिस वस्तु को मैंने आँखों से देखा था, उसी वस्तु को त्वगिन्द्रिय से स्पर्श भी करता हूँ । इस प्रकार जिसका नेत्रेन्द्रिय से ग्रहण होता है, उसी को—त्वगिन्द्रिय से भी ग्रहण होता है और जिसका मैंने त्वचा से स्पर्श किया था उसी को देखता भी हूँ । एक ही पदार्थ के रूप तथा स्पर्श गुणों को ग्रहण करने वाले दोनों ज्ञानों का एक ही उन इन्द्रियों से कर्ता है— जो ऐसा प्रतिसंधान करता है उन दोनों इन्द्रिय जन्य ज्ञानों का अनुसन्धान करनेवाले अथवा शरीरादिकों के समुदाय हैं, इन्द्रिय वर्ग नहीं है । इसलिए जो चक्षु से एवं त्वचा से एक ही पदार्थ को ग्रहण करता है वह इन्द्रियों से व्यतिरिक्त आत्मा है । जिससे अनेक नेत्र, त्वचा आदि इन्द्रियों रूप कारणोंवाला एवं रूपादि अनेक विषयों को देखनेवाला कोई संविद्रूप चेतन है ।