ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१ वा जीवनक्रियाविष्टः तस्य अवभासनरूपा ज्ञानशक्तिः उल्लेखनरूपा च क्रियाशक्तिः नैसर्गिकी, ततः तस्यां भूमौ व्यतिरिक्तेश्वरोपकल्पितपूर्वसिद्धसृष्ट्युपजीवनसम्भावनापि नास्ति, इति स्वमेव ऐश्वर्यं स्फुटं प्रत्यभिज्ञेयं जानाति करोति च—इति ज्ञानक्रियास्वातन्त्र्यलक्षणम् एकवचनेन सर्वस्य जीवजातस्य वस्तुत एकैश्वररूपतां सूचयति । इति शिवम् ॥ ११ ॥ आदितः ॥ ६३ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचितायामीश्वरप्रत्यभिज्ञासूत्रविमर्शिन्यां प्रथमे ज्ञानाधिकारे ज्ञानशक्तिनिरूपणं नाम षष्ठमाह्निकम् ॥ ६ ॥ अथ प्रथमे ज्ञानाधिकारे एकाश्रयनिरूपणाख्यं सप्तममाह्निकम् अनन्तशक्तिरत्नानां यदेकाश्रयसंश्रयात् । विचित्रचन्द्रिकोल्लाससंसिद्धिस्तं स्तुमः शिवम् ॥ एवं स्मृत्यादिशक्तीनां वितत्य स्वरूपमियता दर्शितम्, यत्तु अत्र प्रमातुरपि स्वरूपम् उन्मीलितम् तत्तासामेव शक्तित्वं समर्थयितुम् 'न हि स्वतन्त्रं शक्तिस्वरूपं भवितुमर्हति' इति, अधुना तु तासां शक्तीनाम् एक आश्रयः, स च तच्छक्तिसंयोजनवियोजनादिस्वाच्छन्द्ययोगात् महेश्वरः न तु जडस्वरूपवह्न्यादिवत् दाहकपाचकादिशक्त्याश्रयमात्रम्—इति यत् उभयम् सङ्कल्पादि भूमि में अपने से भिन्न उपर्युक्त ईश्वर द्वारा कल्पित सृष्टि होने की संभावना भी नहीं है, इससे सिद्ध होता है कि अपना ही ऐश्वर्य स्फुटरूप से पहचान करने योग्य है, इसी को जानता है और करता भी है, यही ज्ञान क्रिया की स्वतन्त्रता है 'जीवतः' इसमें जो एकवचन दिया है वह सारे जीव समुदाय की वस्तुतः एक ईश्वररूपता सूचित करता है ॥ ११ ॥ षष्ठ आह्निक समाप्त जो अनन्त शक्तिरूपी रत्नों के एकमात्र आश्रय का स्थान होने के कारण, विचित्र-चित्ररूप से चन्द्रिका के उल्लास की सिद्धि देते हैं, उस शिव का हम स्तवन करते हैं। [ यह सारा का सारा संसार उस परमेश्वर ही शक्ति से अवस्थित है जैसे हिम से अलग शीतलता नहीं रहती और अग्नि से अलग उष्णता नहीं होती, इसी न्याय से, शक्तिमान् से शक्ति कहीं भिन्न उसे छोड़कर नहीं रहती है, धर्मी को धर्म से नहीं पुकारा जाता है। जैसा कि कहा भी गया है शिव शक्ति को रखने के कारण ही शक्त कहा जाता है, इसलिए शिव शक्ति से अभिन्न ही है 'शिवः शक्तस्तथा भावानिच्छया कर्तुमीहते।' शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नम्' यह युक्ति है। वस्तुतस्तु भगवान् शिवरूप ही यह सब है 'यदेकाश्रयेत्यादिना' इसलिए कहा गया है कि स्वतन्त्र- शक्ति नहीं होती है और न तो उसका स्वरूप ही हो सकता है।] इस प्रकार स्मृति आदि शक्तियों के स्वरूप को इतने ग्रन्थांश से विस्तारपूर्वक बता दिया है किन्तु जिस शक्ति निरूपण में प्रमाता का स्वरूप उन्मीलित था, वह उन्हीं शक्तियों का ही शक्तित्वरूप है, इसी के समर्थन के लिए कह रहे हैं—'शक्ति का स्वरूप भिन्न स्वतन्त्र नहीं होता है।' इस समय तो उन शक्तियों के एक मात्र आश्रय शक्तिमान् को ही दिखाना है और वह महेश्वर उन शक्तियों के संयोजन-वियोजन करने में स्वतन्त्र होने से जड स्वरूप वह्नि आदि के