ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-७, का.-१ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४१ उपक्षिप्तम् ‘न चेत् अन्तःकृतानन्तविश्वरूप ॰॰॰।’ इत्यत्र सूत्रे, तत् वितत्य निर्णेतव्यम्। तत्र एक- माश्रयं निर्णेतुम् ‘या चैषा प्रतिभा॰॰॰।’ इत्यादि ‘॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते ।।’ इत्यन्तं चतुर्दशभिः श्लोकैः आह्निकं प्रस्तूयते। तत्र श्लोकेन एक आश्रयः स्वरूपत उपक्षिप्यते। ततोऽपि द्वयेन— व्यवहारः सर्वः सति एकस्मिन् आश्रये युज्यते न असति, इति अन्वयव्यतिरेकात्मा युक्तिः उच्यते। ततो व्यवहारस्वरूपं कार्यकारणभावतः, स्मरणतः, सत्यासत्यप्रविभागतश्च इति संक्षिप्य श्लोकेन श्लोकाष्टकेन च प्रतिपाद्यते। ततः श्लोकेन सर्वोऽर्थो निगम्यते, इति—आह्निकार्थसंक्षेपः। अथ श्लोकार्थो व्याख्यायते यदुक्तम्—‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवत’ इति तत् कथम् ? यावता ज्ञानादिव्यतिरिक्तः कोऽसौ अन्यो ? यस्य ते स्याताम्, काणाददिशा हि दूषितः तदाश्रयः ‘ततो भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰।’ इत्यादिना ? तत् एतत् आशङ्क्य स्वदर्शनदिशा तमेकं स्वरूपत उपक्षिपति— या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ १ ॥ ‘प्रतिभाति घट’ इति यद्यपि विषयोपश्लिष्टमेव प्रतिभानं भाति तथापि न तद्विषयस्य स्वकं वपुः, अपि तु संवेदनमेव तत् तथा चकास्ति ‘मां प्रति भाति’ इति प्रमातृलग्नत्वात् । तथा च वेदः — समान दाहक, पाचक आदि शक्तिभाग का आश्रय नहीं है—अपितु शक्ति और शक्तिमान् इन दोनों को कह दिया। ‘नहीं तो, अपने में अनन्त विश्व को कैसे रख पायेगा।’ इस बात का सूत्र में विस्तारपूर्वक निर्णय करना है। वहाँ पर एक आश्रय का निर्णय करने के लिए—‘या चैषा प्रतिभा ॰॰॰।’ इत्यादि से लेकर ‘॰॰॰॰॰व्यवहारोऽनुभूयते।’ तक चौदह श्लोकों से एक आश्रय रहने पर ही समस्त व्यवहार हो सकता है, एवं न रहने पर नहीं हो सकता; यह अन्वय-व्यतिरेक- भाव द्वारा युक्ति दिखायेंगे। उसके अनन्तर कार्य-कारणभाव से, स्मरण से सत्य और असत्य के विभाग से, संक्षेपीकरण करके एक श्लोक से और आठ श्लोकों से भी प्रतिपादन करेंगे। तब फिर एक श्लोक से समस्त अर्थों का शास्त्रीय पद्धति से व्यवस्थापन करेंगे, इतना ही इस आह्निक का संक्षेप में अर्थ है। अब श्लोक के अर्थ का व्याख्यान करते हैं—जिसके विषय में कहा गया था कि ‘सर्वस्य सिद्धे ज्ञानक्रिये जीवतः, अर्थात् ‘सब जीवों के लिए ज्ञान और क्रिया सिद्ध हैं’ यह कैसे हो सकता है ? जबकि ज्ञानादि से भिन्न दूसरा कौन है ? जिसके वे होंगे, क्योंकि काणादादि के सिद्धान्त से उसका आश्रय दूषित है ‘ततो भिन्नेषु धर्मेषु ॰॰॰॰।’ इत्यादि श्लोक से कहा है ? इसकी आशङ्का करके अपने दर्शन की दृष्टि से उस के आश्रय के स्वरूप का उपदेश करते हैं— उन-उन पदार्थों में क्रम से यह जो घटादि की प्रतिभा मिली हुई है। वह अनन्त अक्रमरूप चिदात्मा महेश्वर ही प्रमाता हैं ॥ १ ॥ ‘घटः प्रतिभाति’ अर्थात् घट का बोध होता है। यद्यपि यह विषय से मिला हुआ आभास झलकता है, तो भी, वह विषय का अपना स्वरूप नहीं है, अपितु इसका ज्ञान ही वैसा भासित होता है, ‘मां प्रति भाति’ मुझे यह भासता है—ऐसा प्रमाता भी कहता है। इस प्रकार प्रमाता में मिला हुआ स्पष्ट मालूम होता है और उसी प्रकार वेद भी कहता है—