ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-१ 'न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥' इति। शत्रा अविरतस्फुरणत्वं, कर्मप्रवचनीयेन तदीयस्वातन्त्र्योपकल्पितनिर्माणक्रियाजनितो वेद्यवेदकभावरूपो लक्षणात्मा सम्बन्धो द्योतितः, केवलं विषयोल्लेखनबलात् बहिः क्रमावभासः समर्थितः, स—सक्रमयौगपद्यादिविचित्ररूपो, यः—पदार्थनां वक्ष्यमाणेश्वरस्वातन्त्र्यरूपदेशकालशक्त्युपकल्पितः, क्रमः—देशकालपरिपाटी, तेन रूषिता—प्रतिबिम्बकल्पतया उपरक्ता या प्रतिभा उक्ता—'केवलं भिन्नसंवेद्य....' इत्यादिना। एषा इति च—सर्वस्य स्वप्रकाशरूपा, परमार्थतश्च अन्तर्मुखत्वेन प्रकाशमात्रपरमार्थतया भेदा- भावात् अक्रमा, सैव महेश्वरः, अविद्यमानोन्तः—परिच्छेदो देशतः कालतः स्वरूपतश्च यस्याः चितः संविदः तदेव रूपं यस्य इति, अत एव बहिर्मुखप्रकाशात्मकविज्ञानस्वभावस्य प्रमाणवर्गस्य योऽन्तः प्रत्याभासम् 'इदम् इदम्' इति अनन्तो विकल्पमयो विमर्शात्मा प्रमासमूहः, तत्र संयोजनवियोजनविश्रमणाद्यनेकप्रकारस्वातन्त्र्यपरिपूर्णः शुद्धः 'अहंप्रत्यवमर्शमयः प्रमाता' स भण्यते, अतश्च बहिर्घटप्रकाशः 'अयं घट' इति अन्तर्विकल्पः स्वीकृतपूर्वरूपः 'अहमिति' तदुभय- उस प्रकाशरूप को न सूर्य प्रकाशित करता है और न तो चन्द्र एवं नक्षत्र गण, न तो विद्युत ही प्रकाशित करती है—यह अग्नि कैसे कर सकेगी ? उस पूर्ण ब्रह्म के प्रकाश से यह सारा का सारा संसार भासित होता है। शतृ प्रत्यय से निरन्तर भासना सूचित होता है, जो कर्मप्रवचनीय 'भान्तं' द्वितीया विभक्ति है, उसके स्वातन्त्र्य से, प्रकल्पित निर्माण क्रिया से उत्पन्न वेद्य-वेद्यकभावरूप सम्बन्ध झलकता है और केवल विषय के उल्लेखन वशात् बाहर में क्रमपूर्वक आभास का समर्थन हुआ है, वह सक्रम एकबार ही होना, विचित्ररूप पदार्थों के लिए कहे जानेवाले ईश्वर के देश-कालरूप शक्ति से उपस्थापित है, देश-काल की परिपाटी ही क्रम कहलाती है, इसलिए मिली हुई प्रति- बिम्बतुल्य प्रतिभा कही गयी है 'केवलं भिन्नसंवेद्य .....' इत्यादि पद से। इस प्रकार 'एषा' शब्द से सब का अपना ही प्रकाशरूप है और परमार्थरूप से अन्तर्मुख होने के कारण यथार्थ प्रकाश भाग से भेदभाव न रहने के कारण वह अक्रमरूप भी है, वही महेश्वर है, जिसका विनाश कभी न होता हो अपरिच्छिन्न निरन्तर रहनेवाले देश-काल के स्वरूप से शून्य संविद्रूप ही वस्तुतः स्वरूप माना गया है, इसलिए वह पदार्थ क्रम भी दो प्रकार का है, एक बाह्यरूप और दूसरा आन्तररूप है, उसमें बाहरो प्रकाशात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाणवर्ग का प्रमाता में प्रत्याभास 'इदम्-इदम्' इसरूप में अनन्त विकल्पमय प्रकाशरूप प्रमासमूह होता है। संयोजन- वियोजन आदि में अक्रमरूप स्वतन्त्र प्रमाता क्रमिकरूप में बाहरी पदार्थ से युक्त रहता है, बाहर में विमर्शात्मक विज्ञान स्वभाववाले प्रमाता में 'इदम्-इदम्' ऐसा प्रत्याभास प्रमाणवर्ग का होता हैं, अन्तर्मुख में विकल्प युक्त विमर्शात्मा का प्रमासमूह क्रमपूर्वक ही होता है और उसमें वह 'अहंप्रत्यवमर्शमय प्रमाता' 'संयोजन-वियोजन के विश्रान्तिरूप आदि अनेक प्रकार के स्वातन्त्र्य से पूर्ण शुद्धप्रमाता ही कहा जाता है और इसलिए बाहर में 'अयं घट:' इस प्रकार जो घट का १. बाह्य और आभ्यन्तररूप से पदार्थ क्रम दो प्रकार के हैं। इदम्, इदम्, यह प्रमाणवर्ग बहिर्मुखी प्रकाश है। प्रभा समूह विमर्शरूप अन्तर्मुखी है और क्रमिक है, संयोजन एवं वियोजन आदि में स्वतन्त्र प्रमाता का अक्रम ही रहता है ओर बाह्य पदार्थवाला तो क्रमिक ही होता है।