ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-७, का.-२ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४३ विश्रान्तिस्थानम्, इति—इयत् पूर्णं प्रकाशस्य स्वरूपम् ॥ १ ॥ अत्रैव उपपत्तिं प्रदर्शयितुमन्वयं तावदाह— तत्तद्विभिन्नसंवित्तिमुखैरेकप्रमातरि । प्रतितिष्ठत्सु भावेषु ज्ञातेयमुपपद्यते ॥ २ ॥ 'संवित्निष्ठा हि विषयव्यवस्थितयः' इति यत् उच्यते तत् न भिन्नरूपप्रमात्मकसंविन्मात्र- विश्रान्त्या सिद्ध्यति, अपि तु तास्ता विभिन्नाः संविदो निश्चयरूपाः प्रमात्मानो याः तानि एव मुखानि द्वाराणि उपाया मार्गाः तैः मुखैः नदीस्रोतः स्थानीयैः यदि अमी भाव नीलसुखादय उह्यमाना एकस्मिन् 'अहमिति' प्रमातृरूपे महासंवित्समुद्रे प्रतितिष्ठन्ति—आभिमुख्येन विश्रान्तिं भजन्ते, तत एषु परस्परं समन्वयरूपं यत् ज्ञातेयं तत् उपपत्त्या घटते, ज्ञातीनां भावः तच्छब्द- प्रवृत्तिनिमित्तं परस्परं जानीयुः इति, कर्म च अन्योन्ययोगक्षेमोद्वहनात्मकं ज्ञातेयम्, तच्च समन्वयाभिप्रायेण इह दर्शितम्—न जडानां स्वतः समन्वयः कदाचिदपि, इति प्रतिपादयितुम् ॥२॥ प्रकाश है—वह क्रमिक ही होता है एवं अन्तर में भी तो पहले स्वीकार किये हुए 'अहम्' का ही क्रमिक बाहर में आभास होता है । बाह्यरूप और आन्तररूप ये दोनों ही प्रमाताओं की विश्रान्ति का स्थान हैं इतना प्रकाश का पूर्णस्वरूप है ॥ १ ॥ 'अत्रैव' अनन्त-शक्तिवाले स्वरूप में जो 'अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः' चिद्रूप महेश्वर प्रमाता है उसी में उपपत्ति बताने के लिए सर्वप्रथम अन्वय कहते हैं— एक ही प्रमाता में उन-उन विभिन्न प्रधान ज्ञानों से प्रतिष्ठित होनेवाले पदार्थ-भावों में यही संवित् ज्ञात होती है ॥ २ ॥ 'सारे के सारे विषयों की स्थिति संवित् में ही रहती है'—जो यह कहा जाता है वह भिन्नरूप प्रमातावाले संविद्रूप मात्र में विश्रान्त होने से नहीं सिद्ध हो सकती, किन्तु उन-उन विभिन्न संविद्रूप का जो निश्चय प्रमाणरूप है उन्हीं को उपाय बनाकर नदी के प्रवाह के समान ये नील-सुखादिभाव यदि बहाये जायें और एक अहम् प्रमातारूप महासागर में बैठा दिये जायें और उसीसे इन नील-सुखादि भावों में परस्पर समन्वयरूप ज्ञान उन-उन उपपत्तियों से घट सकता है, अर्थात् ज्ञातियों के भाव उन-उन शब्द के निमित्त से परस्पर जाने जा सकेंगे और यहाँ पर कर्म अन्योऽन्य क्षेमरूप निबाहना ज्ञातेय है उन्हीं दोनों को समन्वयरूप से बताया गया है। जड- पदार्थों का स्वतः समन्वय कभी भी नहीं हो सकता, इस बात को दिखाने के लिए ही यह प्रयोग किया जाता है ॥ २ ॥ अब शङ्का करते हैं कि सभी समन्वय कार्य-कारणभाव में विश्रान्त होकर समास भी हो जाते हैं, जैसा कि बीज से अङ्कुर और अग्नि से धूमादि भिन्न-भिन्न कार्य-कारणभाव, इस पर शङ्का करके, पूर्व अग्नि और बाद में होनेवाले जो धूमादि का सम्बन्ध है, इन सभी का एक साथ अवभास किसी प्रकार भी देश-काल से भिन्न होनेवाले का एक में आभास नहीं होगा, एक बार १. अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः । यह चिद्रूप प्रतिभा जो भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रमशः प्रकाशित हो रही है, वह अक्रम [ देश कालादि से शून्य ] अनन्त प्रमाता महेश्वर है ।