भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१४४ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-३-४ तथा च व्यतिरेकमुखेन एतदेवाह— देशकालक्रमजुषामर्थानां स्वसमापिनाम् । सकृदाभाससाध्योऽसावन्यथा कः समन्वयः ॥ ३ ॥ अर्थानां जडानां, तज्ज्ञानानां तद्विकल्पानां तन्निश्चयानां च देशक्रमं कालक्रमं च अत्यजतां, स्वसमापिनां—स्वरूपमात्रप्रतिष्ठानां, कः समन्वयः—न कश्चित् इत्यर्थः, यतो हि असौ समन्वयः सकृदाभासेन देशकालाकारमिश्रीकरणात्मना योजनाभासेन साधयितुं शक्यः नान्यथा, न हि पृथक्पृथक् परिक्षीणेषु स्रोतःसु तदुह्यमानाः तृणोलपादयाः समन्वयं कञ्चित् यान्ति इति । अनेकत्वेन देशादिभेद इत्याशयेन सकृच्छब्दः तन्निषेधतात्पर्यण प्रयुक्तः ॥ ३ ॥ तत्र कोऽसौ समन्वयः ? इत्याशङ्क्य, बहुतरव्यापकं कार्यकारणभावं तावत् दर्शयति— प्रत्यक्षानुपलम्भानां तत्तद्भिन्नांशपातिनाम् । कार्यकारणतासिद्धिर्हेतुतैकप्रमातृजा ॥ ४ ॥ इह अग्नौ प्रत्यक्षे धूमं न उपलभते, ततो धूमं प्रत्यक्षेण पश्यति, अग्निं तु यदि न उपलभते धूममपि न उपलभते—इति प्रत्यक्षाभ्याम् अनुपलम्भैश्च इति पञ्चकात् 'कार्यकारणभावो मिलकर भासित होने से एक ही प्रमातावाले हो जायेंगे—तब तो, इनका स्वरूप ही नहीं रहेगा इसी कारण 'तथा च' अर्थात् व्यतिरेकरूप से व्याप्ति कहते हैं— देश, काल और क्रम को रखनेवाले भाव-पदार्थ अपने [ देश-काल ] में मिलकर रहनेवाले, एक प्रमाता में ही विश्रान्त होते हैं। यदि ऐसा न हो तो फिर समन्वय क्या कहलायेगा ? ॥ ३ ॥ नील-सुखादि जड-पदार्थों का, उनके ज्ञानों का, उनके विकल्पों का और उनके निश्चयों का, देशक्रम और कालक्रम नहीं छोड़नेवाले अपने स्वरूप में रहनेवाले, उन पदार्थ-भावों का क्या समन्वय हो सकेगा ? अर्थात् कुछ भी समन्वय नहीं बैठ सकता है। क्योंकि वह समन्वय एक बार आभासित हो जाने से देश, काल और आकारों के आपस में मिल जाने पर योजना के आभास से साध्य बन सकता है, अन्य प्रकार से नहीं हो सकता अर्थात् एक आभास में मिलाये बिना नहीं हो सकता है जैसा कि अलग-अलग जल के प्रवाहों में बहते हुए तृण-उपलादि कोई क्या आपस में समन्वित हो सकते हैं? जैसे वे आपस में समन्वित नहीं होते हैं—वैसे ही ये भी नहीं होते हैं। इसलिए 'सकृत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है; क्योंकि अनेकत्व से देशादि का भेद हो जाता है ॥ ३ ॥ नहीं तो, समन्वय हो नहीं सकता है 'अन्यथा कः समन्वयः !' कौन सा वह समन्वय है ? इस पर आशङ्का कर बहुत प्रकार से व्याप्त कार्य-कारणभाव को ही सर्वप्रथम दिखाते हैं— प्रत्यक्ष से नहीं उपलब्ध होनेवाले; उन-उन भिन्न-भिन्न अंशों में रहनेवाले; कार्य-कारणभाव की सिद्धि के लिए एक ही प्रमाता से उत्पन्न हेतु साधक होगा ॥ ४ ॥ जिस समय अग्नि प्रत्यक्ष होती है, उस समय धूम का प्रत्यक्ष नहीं होता है। उसके बाद धूम को प्रत्यक्ष प्रमाण से देखा जाता है, यदि अग्नि प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होती तो फिर धूम का भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। इस प्रकार धूम और अग्नि इन दोनों के प्रत्यक्ष होने से और न होने से