भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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अ.-१, आ.-७, का.-४ ] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४५ धूमाग्न्योः सिद्धयति' इति यत् उक्तं तत् कथम् ? अग्निप्रत्यक्षेण हि धूमेन किञ्चित् उद्गृहीतम्— अग्निलक्षणे धूमात् भिन्ने अंशे तस्य अवगमहेतुत्वात्, स्वस्वभावरूपे भिन्ने अंशे विश्रान्तत्वाच्च, परविषयानवगाहनात् ज्ञानान्तरस्वरूपानावेशाच्च इति । पातिः ज्ञापनवाची पतिश्च विश्रान्तिवाची प्रयुक्तस्तन्त्रेण । एवं धूमानुपलम्भादौ चतुष्टये वाच्यम् । ततश्च अग्निः, धूम, अग्न्यभावो, धूमा- भावः इति एतानि वस्तूनि यथा पृथक् प्रमातृसंवेद्यानि धूमाग्न्योः कार्यकारणतां न गमयन्ति तथा एकप्रमातृवेद्यान्यपि, विकल्पोऽपि अनुभवातिरिक्तं ज्ञापयन् न प्रमाणमेव । यदा तु प्रत्यक्षानुपलम्भस्रोतःपञ्चकेन तानि पञ्च वस्तूनि एकसंवित्समुद्रविश्रान्तानि कृतानि तदा एकीभूतानि प्रमात्रा स्वतन्त्रतया अन्योन्यसापेक्षाणि न तु घटपटादिवत् भास्यन्ते, स एव एक आभासः कार्यकारणभावावभास इति न किञ्चत् अवद्यम् ॥ ४ ॥ ननु प्रत्यक्षानुपलम्भैः यत् कृतं तत् स्मरणबलात् एकीकरिष्यति, उक्तं तावत् अत्र— स्मृतिरपि अनुभूतातिरिक्तेऽर्थे न व्याप्रियते, सापि च विज्ञानसमन्वयरूपा एकप्रमातृसद्भावं विना कथं स्यात् ? इति दर्शयति— धूम और अग्नि का कार्य-कारणभाव सिद्ध होता है, यह जो पहले कहा है वह कैसे सम्भव होगा ? अग्नि के प्रत्यक्ष से धूम ने कौन सा उपकार कर दिया—अग्नि तो धूम से भिन्न है, अग्नि तो प्रत्यक्षरूप से धूम से भिन्न भी दिखाई देती है और इसकी प्राप्ति का हेतु भी भिन्न ही है एवं अपने- अपने भिन्न अंश में दोनों ही विश्रान्त है, एक-दूसरे के विषय को नहीं पा सकेगा और दूसरे के ज्ञान का स्वरूप भी उसमें नहीं प्रविष्ट होगा । 'तत्तद्भिन्नांशपातिनाम्' इसमें 'ण्यन्त' जो पाति है वह ज्ञानवाची है और पाति केवल विश्रान्तवाची है इसलिए दोनों का स्वतन्त्ररूप से प्रयोग है अर्थात् एक ही से दोनों का अर्थ निकलता है इस ढङ्ग से अग्नि और धूम का एवं बीज और अङ्कुर का कार्य-कारणभाव समझना चाहिए । अग्नि है तो अवश्य धूम है, अन्यथा अग्नि का अभाव है इन सभी वस्तुओं के अलग-अलग प्रमाताओं से ज्ञान होने पर धूम और अग्नि का कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता है उसी प्रकार कार्य-कारणभाव एक प्रमाता से वेद्य होने के कारण विकल्प भी अनुभव से अतिरिक्त जनाता हुआ प्रमाण नहीं बन सकता । जब वेद्य होने पर प्रत्यक्ष से नहीं उपलब्ध होनेवाले पाँचो प्रवाह [ अग्नि-धूम और बीज-अङ्कुर एवं उनके अभाव ] एक संविद्रूपी समुद्र में जाकर एकरूप से भासित होते हैं, तब वे घट-पटादि के समान भिन्न नहीं भासित होते हैं, वही सागर में जाकर एक हुआ आभास कार्य-कारणभाव का अवभास कहलाता है, इस प्रकार इसमें कोई विरोध नहीं है ॥ ४ ॥ अब शंका करते हैं कि प्रत्यक्ष से जिसकी उपलब्धि नहीं हो सकती है उसका स्मरण के बल से एकीकरण हो जायेगा ? इस प्रश्न का तो उत्तर दे दिया है कि अनुभव से अतिरिक्त अर्थ में स्मृति का व्यापार नहीं बन सकता; क्योंकि वह भी तो ज्ञान के समन्वयरूप होती है एक प्रमाता के सद्भाव के बिना कैसे हो सकती है ? उसे दिखाया जाता है— १. इसलिए भास्यमानता ही कार्यता और कारणता है, और वैसा भासना ही कार्य-कारणभाव का अवभास कहलाता है । १९