ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-५ स्मृतौ यैव स्वसंवित्तिः प्रमाणं स्वात्मसंभवे । पूर्वानुभवसद्भावे साधनं सैव नापरम् ॥ ५ ॥ इह अनुभूतो विषयः प्रकाशते स्मृतौ, तत्र विषयस्य सा स्मृतिः न नूतनः प्रकाशः अपि तु अस्य स प्राच्य एव अनुभवप्रकाशः, चानुभवो ज्ञानरूपत्वेन ज्ञेयरूपत्वाभावात् न ज्ञानान्तरसंवेद्यः अपि तु स्वप्रकाशः, स च स्मृतिकाले यदि असन् तत् कथं प्रकाशताम्, भवतु वा असौ तथापि स्मृतिप्रकाशोऽनुभवप्रकाश इति अन्योन्यभिन्नं युगलम् इति न कदाचित् स्मृतिः स्यात्, तस्मात् एतत् एवमुपपद्यते, यदेव स्मृतिस्वसंवेदनम् तदेव अनुभवस्य स्वसंवेदनम्, न तु अपरं स्वसंवेदन- व्यतिरिक्तं प्रत्यक्षम् अनुमानादिकं वा तत्र क्रमते, ततश्च तावत्कालव्यापि अविच्छिन्नमेकं यत् स्वसंवेदनं तदेव 'प्रमातृतत्त्वम्' इति सिद्धम् । अन्यत्र अनुभवितरि स्मर्त्ता अन्यो न उपपद्यते, इति अनया च्छायाया स्मृत्या प्रमातृसिद्धिः पूर्वमुक्ता, इदानीं तु स्वसंवेदनैकीभावेन भङ्ग्यन्तरेण इति विशेषः ॥ ५ ॥ ननु अनुभवातिरिक्तेऽपि अर्थे सन्तु विकल्पाः प्रमाणम्, अप्रामाण्यं हि बाधबलात् भवति, बाधाभावे तत् कथं स्यात् ? इति आशङ्क्य, सोऽपि अयं बाध्यबाधकभावः सत्यासत्यप्रविभाजनाय विश्वेषां व्यवहाराणां जीवितभूतो, न एकेन प्रमातृतत्त्वेन बिना घटत इति वितत्य दर्शयति— स्मृति में अपना संवित्तिज्ञान है—वही अपनी सत्ता में प्रमाणित होता है। पूर्व के अनुभव की सत्ता में भी वही संवित्ति-साधन होती है, दूसरा कोई भी नहीं बन सकता ॥ ५ ॥ अनुभव किये हुए विषय का ही स्मृति में प्रकाश होता है और उसमें विषय की जो स्मृति है उसका कोई नूतन प्रकाश नहीं है किन्तु वही स्मृति का प्रकाश ही है—जिसका पूर्व में अनुभव प्रकाश हुआ था और वह ज्ञानरूप होने से ज्ञेयरूप का उसमें अभाव मिलेगा । इसीलिए वह दूसरे ज्ञान से वेद्य नहीं हो सकता । अपितु स्वयं प्रकाशरूप है और यदि वह अनुभव स्मरण काल में नहीं है तो कैसे प्रकाशित होगा ? यदि मान लो कि उसका प्रकाश है तो भी स्मृतिप्रकाश और अनुभवप्रकाश ये दोनों भिन्न-भिन्न [ संवेदन द्वय ] ज्ञान हैं, इस प्रकार स्मृति कभी भी नहीं हो सकेगी । इसलिए यह सिद्ध होता है कि—जो स्मृति का संवेदन है—वही अनुभव का भी संवेदन है, वहाँ पर कोई दूसरा स्वसंवेदन से अतिरिक्त प्रत्यक्ष या अनुमान नहीं आ सकता और इससे सिद्ध हुआ कि उस काल पर्यन्त रहनेवाला अविच्छिन्न एकसंवेदन ही प्रमातृतत्त्व है । दूसरे अनुभव करनेवाले में दूसरा स्मरण करनेवाला नहीं होता है, इस छायारूपी स्मृति से प्रमाता की सिद्धि का पूर्व में प्रतिपादन किया गया है, उसी को इस समय स्वसंवेदनात्मक एकीभावरूप दूसरे प्रकार से ही कहा जाता है—यही इसकी विशेषता है ॥ ५ ॥ अब शंका करते हैं कि अनुभव से अतिरिक्त कार्य-कारणभाव आदि अर्थ में विकल्प भले ही प्रमाण हो; क्योंकि अप्रामाण्य तो बाध के बल से ही होता है जब बाध नहीं है—तो, अप्रामाण्य कैसे बन सकेगा ? ऐसी आशंका कर, उत्तर देते हैं कि वह बाध्य-बाधकभाव भी जब कि सत्य और असत्य के विभाग करने के लिए सभी व्यवहारों का जीवन है, वह प्रमाता के बिना नहीं घट सकता है—इसी को विस्तारपूर्वक दिखाते हैं—