ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)
Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary
आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअ.-१, आ.-७, का.-६] विमर्शिनीटीकोपेता [ १४७ बाध्यबाधकभावोऽपि स्वात्मनिष्ठाविरोधिनाम् । ज्ञानानामुदियादेकप्रमातृपरिनिष्ठितेः ॥ ६ ॥ ‘बाधाभावे प्रामाण्यम्’ इत्येतदर्थम् अवश्यसमर्थ्यो यो बाधव्यवहारः सोऽपि कथम् इति अपि-शब्दस्यार्थः, इह शुक्त्या तावत् रजतस्य न काचित् बाधा नाम क्रियमाणा दृश्यते, शुक्तिज्ञानेन रजतज्ञानं बाध्यते इत्यपि न युक्तम्—स्वस्मिन् विषये आत्मनि च स्वरूपे द्वयोः ज्ञानयोः परि- निष्ठितयोः विश्रान्तयोः अन्योन्यं विरोधस्य अभावात् । अथ अयमेव विरोधः परस्परपरिहाररूपः र्तार्ह सर्वेषां ज्ञानानां विरोधात् बाध्यबाधकभावस्य परिनिष्ठैव न लभ्या—इति सुतरां विघटेत सत्येतरप्रविभागः । नञ्पि अत्र तन्त्रेण व्याख्येयः । एतदुक्तं भवति—यदि ज्ञानं स्वयं नश्यति तदा किं ज्ञानान्तरेण अस्य कृतं, न हि तेन तत्कालेऽसंभवता तस्य विषयापहारः कर्तुं शक्यः, न रजतम् इत्यपि ज्ञानं स्वं रजताभावं विषयोकुर्वन् न विषयम् अवहरेत् रजतज्ञानस्य । अथापि ज्ञानं ज्ञाना- न्तरेण नाश्यते इत्यपि पक्षः, तत्रापि सर्वेषां ज्ञानानाम् इयमेव सरणिः—इति किंचिदेव बाध्यम् इति कथं स्यात् ? यदा तु रजतज्ञानं शुक्तिज्ञानं च एकत्र स्वसंवेदने विश्राम्यतः तदा एतत् उपपद्यते । तथाहि—एकत्रापि प्रमातृतत्त्वे विश्राम्यतां ज्ञानानां नैकप्रकारैव विश्रान्तिः अपि तु विचित्रतयैव सा संवेद्यते, तथाहि—नोलम् इति उत्पलम् इति ज्ञाने प्रमातरि विश्राम्यन्ती परस्पर- बाध्य-बाधकभाव भो एकमात्र प्रमाता में परिनिष्ठित होने से अपने में रहनेवाले अविरोधी ज्ञानों का उदय होता है ॥ ६ ॥ ‘बाध्यभावे प्रामाण्यम्’ बाध का नहीं रहना यह अवश्य समर्थन करनेयोग्य बाध व्यवहार है—वह भी कैसे होगा, यह ‘अपि’ शब्द का अर्थ है, पहले शुक्तिका से रजत का कोई बाध किया जाता हो—ऐसा नहीं देखने में आता है, शुक्तिज्ञान से रजतज्ञान बाधित होता हो यह भी बात नहीं है; क्योंकि अपने विषय में तथा आत्मा और अपने स्वरूप में ये दोनों ज्ञान परिनिष्ठित रहने के कारण विश्रान्त रहते हैं, इन दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है। यदि अब कहो कि यह विरोध परस्पर परिहाररूप है—तब तो, सभी ज्ञानों के विरोध से बाध्य-बाधकभाव को सत्ता हो नहीं मिलेगी; क्योंकि मिथ्या बुद्धि ही सत्य बुद्धि का तिरस्कार कर देगी। यहाँ ‘नञ्’ शब्द का भी तन्त्र से व्याख्यान करना होगा अर्थात् यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान अपने से विनष्ट हो जाता है—तो, दूसरा ज्ञान उसका क्या कर सकता हैं; क्योंकि वह दूसरा ज्ञान तो उस समय नहीं है। अतः उसके विषय [ रजत ] का अपहार कर सकें, रजतज्ञान रजत के अभावज्ञान को विषय नहीं कर सकता है और रजतज्ञान के विषय को भी अपहरण नहीं कर सकता। यदि मान लो कि एक ज्ञान दूसरे ज्ञान से विनष्ट किया जाता है, यह पक्ष है—तो, वहाँ पर भी ज्ञानों का यही बाध्य-बाधकभाव प्रकार है, यही एक मार्ग सभी ज्ञानों का है। तब फिर कुछ ज्ञान ही बाधित होता है—यह कैसे बनेगा ? जब कि एक ही संवेदन में रजतज्ञान और शुक्तिज्ञान विश्राम लेते हैं—तब तो, किञ्चित् बाधित हो सकता है, जैसे एक ही प्रमाता में विश्राम लेनेवाले ज्ञानों के एक प्रकार से विश्रान्ति सब स्थलों में नहीं होती है किन्तु विचित्ररूप से ही उनका ज्ञान होता है, जैसा कि यह नील है और यह उत्पल है—ये दोनों ज्ञान प्रमाता में विश्राम लेते हुए परस्पर