भारतकोश
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - उत्पलदेव प्रणीत प्रत्यभिज्ञा महाभाष्य सटीक)

Ishvara Pratyabhijna Vimarshini of Abhinavagupta with Commentary

आचार्य उत्पलदेव / अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished343 पृष्ठ

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१४८ ] ईश्वरप्रत्यभिज्ञा [ अ.-१, आ.-७, का.-६ रोपरागाभासेन विश्राम्यतः । घट इति पट इति परस्परानाश्लेषेण शुक्तिका इति न रजतम् इति वा ज्ञानं रजतम् इति ज्ञानस्य उन्मूलन तदीयविमर्शात्मकप्रमारूपव्यापारानुवर्तनविध्वंसं कुर्वत् प्रमातरि प्रतिष्ठां भजते । एवं कार्यकारणभावादौ विश्रान्तिवैचित्र्यं प्रमेयासंभवि प्रमात्रा स्वात- न्त्र्येण निर्मितं तत एव अस्य प्रमास्वतन्त्रतादायि वाच्यम् । एवमेकत्र प्रमातरि पूर्वज्ञानस्य परिवर्जनेन यतो निश्चिता स्थितिः, अतो बाध्यबाधकव्यवहार उपपन्नः, नीलादिवत् किल तानपि व्यवहारान् स एव परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात् आभासयति तत् तेऽपि सत्या एवेति ॥ ६ ॥ विशेषण और विशेष्यभाव से विश्रान्त हो जाते हैं। यह घट है और यह पट है—यह ज्ञान परस्पर पृथक् ही होता है; यह शुक्ति है, रजत नहीं है यह ज्ञान रजतज्ञान का उन्मूलन करता हुआ, उसके विमर्शरूप प्रमाव्यापार को भी विध्वंस करता हुआ प्रमाता में स्थिर होकर रहता है । इसी ढंग से कार्य-कारणभाव आदि में भी विश्रान्ति की विचित्रता, प्रमेय की असंभवता, प्रमाता की स्वतन्त्रता से निर्मित होता है, इसीलिए यह ज्ञान प्रमा को स्वातन्त्र्य देनेवाला कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि एक प्रमाता में रजतज्ञान को हटाकर शुक्तिज्ञान की निश्चित स्थिति हो जाती है, अतः बाध्य-बाधक व्यवहार भी सिद्ध हो जाता है, नीलादि पदार्थों के समान उन रजत द्विचन्द्रादि के व्यवहार को परमेश्वर अपनी स्वतन्त्रता से भासित करते हैं; इसलिए वे असत्य होते हुए भी सत्य ही भासित होते हैं ॥ ६ ॥ १. जो ये असत्यरूप से कहे गये रजत, द्विचन्द्रादि के व्यवहार आभासित हो रहे हैं वे सभी परमेश्वर चिद्रूप की स्वातन्त्र्य-शक्ति से ही प्रतिभासित होते हैं और वे सभी सत्य ही हैं । इसलिए सत्यरूप ही कहे हुए हैं उनमें मिथ्यात्व थोड़ा भी नहीं होगा— या सैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूषिता । अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः ॥ यह जो संविद्रूप प्रतिभा-शक्ति भिन्न-भिन्न पदार्थों में क्रम से अनुरंजित है वह क्रम से शून्य [ देश-कालादि के स्पर्श से रहित ] अनन्त चिद्रूप प्रमाता महेश्वर ही है । और इस विषय में पूर्व गुरुजनों के द्वारा भी कहा गया है । तस्मादनेकभावाभिः शक्तिभिस्तदभेदतः । एक एव स्थितः शक्तः शिव एव तथा तथा ॥ तथा यत्र सदित्येवं प्रतीतिस्तदसत्कथम् । यत्सत्तत्परमार्थो हि परमार्थस्ततः शिवः ॥ सर्वभावेषु चिद्व्यक्तेः स्थितैव परमार्थतः । मिथ्याज्ञानविकल्पानां सत्त्वं चिद्व्यक्ति व्यक्तिता ॥ विद्यते तत्तदत्रापि शिवत्वं केन वार्यते । इति चेदेषु सत्यत्वं स्थितमेव चिदुद्गमात् ॥ तथा शिवोदयादेव भेदो मिथ्यादिकः कथम् । व्यवहाराय सत्यत्वं न च वा व्यावहारिकम् ॥ इत्यादि अनेक स्वभाव वाली शक्तियों के द्वारा व्यवहार करते हुए भी उस-उस शक्ति के अभेदभाव से शक्तिमान् होने के कारण उस-उस प्रकार से शिवत्व की स्थिति रहने से एक शिव ही सर्वत्र रहता है ।